धुन-रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
बिरह-मिलन के वो गीत गाके, हिया इंदोहिल मतात गुँइया।।
गयेंव मैं पनिया सँभर-पकर के, खड़े रहेंव पार में अकेली।
मया घुरे धुन पवन सपरिहा, गिरा देइस खाँध ले खंधेली।।
उदुपहा दिखगे वो बिलवा टूरा, लजा के आगेंव भगात गुँइया।।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
लजात देखेंव थोकिन कनेखी, दरस करेंव रूप के धोगानी।
नवा सुरुज कस छबि के साम्हू, सहस पुरन्दर भरत हे पानी।।
नचाये भौं मुच्च ले मुचक के, बिरह अगन सिपचात गुँइया।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
गजब के धुन वो गजब के सुर वो, अजब-गजब बाँस के बँसुरिया।
बिल्होर तन- मन सरस-परस कर, अमात हे धुन हिया के कुरिया।।
बजैया के का करौं बड़ोना, खंगत हे भाखा बतात गुँइया ।।
खड़े हे खड़े हो डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
बही बना दिस मया सना दिस, झिंकात तलफत तिरात हे तन।
सरगसुधा धार में लहर में, नहाय बर लुकपुकात हे मन।।
हृदय के धड़कन उचक उचक चल, सहम कदम लड़बड़ात गुँइया ।।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
मिला के आँखी बरत हौं बिरहा, दिखात सपना उड़नपरी मन।
गड़ी सपड़बे कहूँ तैं उरभट, कभू हिरक के निहारबे झन।।
जबर वोकर जदुवहा नयन तो, करेजा कतरै मिलात गुँइया।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
कभू उवत हे कभू बुड़त हे, मया पिरित लटपटाय साँसा।
कभू घटत हे कभू बढ़त हे, जियत अमियरस पिये के आसा।।
मगज भुवन ला दंदोर डारिस, कसक-मसक बड़ पिरात गुँइया।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
कहाँ जमुन जल कमल हा फुलथे ?, तभो ले मोरे मति हा हरगे।
मया के मड़वा में मन भँवर के, उपई करिस भुगते ला परगे।।
फकत नयन मुहरन झूलत अब, मिले ला जीव चटपटात गुँइया ।।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।
भरे गगन में जतेक चंदैनी, ततेक बिहाये हरि बरे हें।
मया फदक पंखुरी कुसम कस, कुँवर चरन मग झरे परे हें ।।
कहूँ भोसावै तैं झन भोसाबे, अपन समझ हौं बतात गुँइया ।।
खड़े हे डंगडंग ले घाटजमुना, बिधुन बँसुरिया बजात गुँइया।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
भादो अंधियारी पाख डोकरी नवमी क्रोधी संवत्सर विक्रम संवत २०८१
भारत छत्तीसगढ़ दुर्ग महुदा।
तद्नुसार २६/९/२०२४
No comments:
Post a Comment