शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Monday, 23 September 2024
लौकिक वर्णिक छन्द समुन्दर (छत्तीसगढ़ी)
लौकिक वर्णिक छन्द समुन्दर (छत्तीसगढ़ी)
१/छन्द-अनुष्टुप्
लालालाला ललालला, लालालाला ललालला
२२२२ १२२२, २२२२ १२१२
महामाई दयालू तैं, देबी आस लगाय हौं।
दाई दरस दे मोला, डेहरी तोर आय हौं।।
२/छन्द-लोला
सोये भाग जगाथे मोरे कालीमाई।
रद्दाभक्ति दिखाथे मोरे कालीमाई।।
रक्सा ताप नवाथे मोरे कालीमाई।
चोखा शस्त्र भँवाथे मोरे कालीमाई।।
३/छन्द छप्पय
लल ललल ललल लल, ललल लल ललल ललल लल। (चार आवृत्ति) दो दो पंक्ति में समतुक
भगत जपत जग तरत, सरन पर जप कर अनथक।
जनम मरन भय टरत, चरन धर तज सब बकझक।।
अभय मगन वह चरत, बरत जग अलग थलग रह।
करत समरपन बदन, सदन तज अघट प्रकट थह।।
तज करम भरम यह, रह अमन, अछत बचत वह जन अमर।
भर हरख अतल उर, अधर धर अहत बहत रघबर समर ।।
४/छन्द-सार
(ग. ल. )वर्णिक छन्द)
लाल लाल लाल लाल, लाल लाल लाल लाल
सत्त नाम एक राम, भेद ला भुला मितान।
जीव में सबो उहीच, छोड़ मंत्र आन-तान।।
आन पंथ आन ग्रंथ, आन ठान आन ज्ञान।
राम नाम लाभ बाट, आन बाट जान हान।।
५/छन्द - ससी
(ल. ग. ग. यगण वर्णिक छन्द)
ललाला ललाला, ललाला ललाला।
अरे! नंदलाला, छुड़ा फंदझाला।
बना गीत गावौं, मनावौं रिझावौं।।
कभू सोरिया तो,हरे ताप आ तो।
तहीं जीव तोसा, तुहीं ले भरोसा।।
६/छन्द - प्रिया
(ग. ल. ग. अथवा रगण)वर्णिक छन्द)
लाल लालालला, लाललाला लला।
गौंतरी के सगा,
राम के नाम गा।
भाग उन्डे जगा,
जीव चोला लगा।।गौंतरी के सगा!!!
राम के नाम गा।
लोभ लोभाय तैं,
पाप भोसाय तैं।।
हाय! जाबे कहाँ,
मोह-काया जिहा!! गौंतरी के सगा!!!
राम के नाम गा।
लालसा ला भगा,
काल लेही नँगा।गौंतरी के सगा,
राम के नाम गा।
छोड़ दे मोह ला।
छोड़ दे द्रोह ला।।
नाम गंगा नहा,
अश्रु धारा बहा।।गौंतरी के सगा,
राम के नाम गा।
देह के का धरे,
सोच रद्दा तरे।
भागमानी कहा,
श्रेष्ठ ज्ञानी कहा।गौंतरी के सगा,
राम के नाम गा।
आय सब्बो मरे,
चेत जा रे अरे।।
ये तमाशा पगा,
हानि होही अगा।।गौंतरी के सगा,
राम के नाम गा।
भाग तोरे जगा,
जीव चोला लगा।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
७/छन्द - रमण
(ल. ल. ग. अथवा सगण)वर्णिक छन्द)
बिपदा टरगे, तिरिया तरगे।
कहिनी सुन लौ, रहिनी सुन लौ।
बग ले सुघरी, सबले सुथरी।
रिखि गौतम के, कुटिया रम के।।
सतही तिरिया, अति जे पिरिया।
छल इन्द्र करे, जब देख परे।
तब श्राप दिए, मन रोस लिए।।
बनगे पथरा, रहिगे अधरा।
जग के रउवा, छूवत पँउवा।
धुर जे झरगे, जिउरा परगे।
बिपदा टरगे, तिरिया तरगे।।
शोभामोहन
7/छन्द - पंचाल
(ग. ग. ल. अथवा तगण)वर्णिक छन्द)
लाला लला लाल, लाला लला लाल
गोपाल जी मोर, पैंया परौं तोर।
हे मोर गोहार, बेड़ा लगा पार।।
काँही कहै लोग, हे साध संजोग।
तैं हा बना काम, लेहू सदा नाम।।
८/छन्द- म्रिगेंद्र
(ल. ग. ल. अथवा जगण)वर्णिक छन्द)
मनावत राव, भुलाय प्रभाव।
इहें कर राज, लला सिरताज।
करे बनवास, न जा गुनरास।
सबो सुख धाम, गुनागर राम।।
तहीं जिउ प्रान, तहीं कुल मान।
तहीं सनतान, तहीं भगवान।।
९/छन्द मंद
(ग. ल. ल. अथवा भगण)वर्णिक छन्द)
राम भजो मन, भाव मया सन।
शुद्ध करे तन, शुद्ध करे मन।।
पार लगावन, भाग जगावन।
पाप नसावन, सुघ्घर पावन।।
१०/छंद जीर्णा
(जीर्णा) (म. ग. )वर्णिक छन्द)
वो तो हे राजा लाला, कोई वोला छेंकै काला।।
कोनो बोलै जादू वाला, कोनो बोलै भोलाभाला।।
गैया वाला वो तो ग्वाला, बेंझाथे देखाथे चाला।।
कान्हा बंशीवाला गोई, जाने वोला जानू कोई।।
११/छंद कमल (ल. ल. ल. अथवा नगण)वर्णिक छन्द)
ललल ललल ललल ललल, ललल ललल
चरन कमल गुरुबर धर, जगत तरन।
सजन भजन तज झन मन, रहन सरन ।।
जगत बरत भभक भभक, बिगन अगन।
अटक चटक झन मन कर, सजन लगन।।
१२/छन्द धानी
(र. ल. )वर्णिक छन्द)
लाल लाल लाल लाल, लाल लाल लाल लाल।
विश्व सिन्धु में अपार, राम डोंगिया अधार।।
लाभ ला बने बिचार, देह छोड़ जीव तार।।
हे बिचित्र संग साथ, छोड़थे मँझार हाथ।
राम एक तोर मीत, ओकरे पगा पिरीत।।
१३/छन्द निगल्लिका
(ज. ग)वर्णिक छन्द)
लला लला लला लला, लला लला लला लला।
अपार भेद तोर हे, रुँधाय चेत मोर हे।
तरौं नहीं बिना दया, जुड़ौ नहीं बिना मया।।
झपात तीन पाँच हौं, भुँजात ताप आँच हौं।
सुपंथ ला भुलात हौं, शरीर ला ढुलात हौं।।
अबेर मोर सोर ले, अनाथ हौं अगोर ले।।
१४/छन्द समोहा (म. ग. ग. )वर्णिक छन्द)
लालालाला ला, लालालाला ला
ये आवाजाही, भौंरी देवाही ।।
तैं हाँ भोसाबे, धारे बोहाबे।।
जेने हा भेजे, तेने हा लेजे।
पारे हो जाबे, रामे ला गाबे।।
बेरा ला जोहे, माया ला बोहे।
बेंझाये चोला, भौंरे रे गोला।।
काँही ना पाबे, दुच्छा तैं जाबे।
पारे हो जाबे, रामे ला गाबे।।
छंद चऊरस (ल. ल. ल. ल. ग. ग) (वर्णिक छन्द)
लललल लाला, लललल लाला।
जय जय रामा, जय सुखधामा।
जय धनुधारी, अजिर बिहारी।।
दशरथ बेटा, सुलुँग सपेटा।
रिखि रखवारा, सुर मुनि प्यारा।।
रबिकुल भानू, सबजग जानू।
निबल सहारा, जग करतारा।।
भवभयहारी, अतिसुखकारी।
असुरमरैया, अभयकरैया।
मलमल धोती, गर मनि मोती।
रिगबिग माला, करत उजाला।।
सजवन साजे, हृदय बिराजे।
लछमन भाई, जगसुखदाई।।
रिखि तिय तारे, सिय भरतारे।।
दूहौ
यगण संखनारी उभय, दोय तगण मंथांण। दुजगण प्रियगण मिळ दहू, मदनक छंद प्रमांण ।। ३६
छंद संखनारी तथा विराज (य. य.) ( वर्णिक छन्द)
संखनारी छन्द (वर्णिक छन्द)
ललाला ललाला ललाला ललाला।
बड़े राम रामा, बड़े श्याम श्यामा।
अरे चेत बामा, बसे मुक्तिधामा।।
भजे जी लगाबे, तभे सुःख पाबे।।
नहीं तो झँवाबे, नहीं आँच पाबे।
महासुःख पाबे, बने तैं थिराबे।।
सबो हा भुलाही, तभे वो जनाही।
न माया नचाही, ये काया कँचाही।।
न बेरा गँवा रे, चले सोझ जा रे।
उही हे सहाई, उही बाप दाई।
भजे में भलाई, अरे मोर भाई।।
गुरू ले मिलाही, बनौकी बनाही।
छंद मंथांरगी (त. त. )( वर्णिक छन्द)
यमाताराजभानसलगा
लालाल लालाल,
लालाल लालाल।।
सीता रमा सोय, कीजै समं कोय। भाखौ परीभ्रंम्म, राघौ महारंभ ।।३८
लललल लल लललल लल ।
लललल लल लललल लल।।
सहदत सत, दसरथ सुत। रिवकुळमण, रघुबर भण।।३९
दूहौ
दोय जगण यक चरण में, सौ मालती सुभाय। कीरत जिण में 'किसन' किव, रट रट स्री रघुराय ।।४०
छंद मालती (ज. ज. )( वर्णिक छन्द)
ललाल ललाल, ललाल ललाल।
ललाल ललाल, ललाल ललाल।।
वडौ धन वेस, म खोय मुढेस। चवां चित चेत, पुणौ मत प्रेत ।। भरणां धन भाग, रघुब्बर राग ।।४१
अथ सप्त वरण छंद जात उस्णिक
दूहौ
रगण जगण पय अंत गुरु, समांनिका कह सोय। दुजबर भगण पयेण जिण, छंद सबासन होय ।।४२
छंद समांनिका (र. ज. ग. )( वर्णिक छन्द)
लाललाल लालला, लाललाल लालला।
लाललाल लालला, लाललाल लालला।।
छोड़छाँड़ देह ला। काम कोह गेह ला।।
लोभ ला भगाव रे। राम नाम गाव रे।।
जीव धन्य धन्य हे। भक्त जे अनन्य हे।।
लाभ ला भँजाव रे। राम नाम गाव रे।।
साँझ हो बिहान हो। ओकरेच ध्यान हो।।
आतमा सजाव रे। राम नाम गाव रे।।
राम नाम गाव रे। मुक्तिधाम जाव रे।।
चित्त सोझियाव रे । भूल राँवराँव रे।।
जानकी गुसान रे। विश्व में महान रे।।
छंद सबासन( वर्णिक छन्द)
(४ ल. भ. अथवा न. ज. ल. )
ललल ललालल, ललल ललालल।
ललल ललालल, ललल ललालल।।
खर खळ खंडण, महपत मंडण ।
रसण वडापण, रघुवर जंपण ।।४४
दूहौ
दुजबर जगण पयेण जिण, सौ करहची सुणंत। सात गुरू पय जास मध, सीखा छंद सुमंत।।
४५
छंद करहची( वर्णिक छन्द)
(४ ल. ज. अथवा न. स. ल. )
ललल लल लाल, ललल लल लाल।
ललल ललल लाल, ललल लल लाल।।
लसत चख लाज, सुकर धनु साज।
सझण सगरांम, रसण भज रांम ।।४६
छंद सिखा( वर्णिक छन्द)
(७ ग. अथवा म. म. ग. )
सौ राघौ जांणै, ठांणै सौ राघौ ठांणै। जीवाड़े राघौ जैनूं, तौ मारै केहौ तेनूं।।।।४७
अथ अस्टाखिर छंद वरणण, जात
अनुस्टप
दूहौ
आठ गुरू पद छंद जिण, विद्युन्माळा अक्ख । गुरु लघु क्रम अठ वरण पद, सौ मल्लिक विसक्ख ।।४८
रघुवरजसप्रकास [6]...
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छंद विद्युन्माला (८ ग. अथवा म. म. ग. ग)(वर्णिक छन्द)
राघौ राजा सीता रांणी, वेदां में धाता वाखांणी।
सौ गावै जोई है साचौ, कीटांनूं गावै सौ काचौ ।।४९
छंद मल्लिका (र. ज. ग. ल. )(वर्णिक छन्द)
आच आब जेम आय, जोव तांस छीज जाय। कोय अंत नाय कांम, रे अबूझ गाय रांम ।।५०
छंद प्रमांणी तथा अरध नाराज तथा तुंग (ज. र. ल. ग. )(वर्णिक छन्द)
दूहौ
लघु गुरु क्रम वरण अठ, छंद प्रमांणी कथ्थ। दोय नगण फिर करण दे, सौ कह तुंग समथ्य ।।५१
छंद प्रमांणी(वर्णिक छन्द)
नमौ नरेस राघवं, दराज पाय दाघवं। उपंत स्यांम अंगयं, सनीर अव्र ढंगयं ।। दकूळ पीत लोभयं, सुरूप बीज सोभयं । निखंग पीठ रज्जयं, सुचाप पांणि सज्जयं ।। मुखारविंद मोहनं, सुमंद हास सोहनं। जु बांम अंग जांनकी, सु सोभना समांन की।। वसंत ध्यांन मंजयं, हदे तवै ज क्रीत तासयं, जनंम धन्य जासयं ।।५२
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94%
यश। तासयं-उसका । जासयं-जिसका।
- 127 -
छंद त्वंग तथा तुंग (न. न. ग. ग. )(वर्णिक छन्द)
दस सिर खळ दाहं, सुचित सुजन चाहं। जप जप रघुराजं, सु भुज समर लाजं ।। ५३
दूहौ
दुजबर जगण सु अंत गुरु, कमळ छंदस कहांण।
भगण करण फिर सगण भिळ, मांन क्रीड़सु वखांण ।।५४
छंद कमल (४ ल ज ग. )(वर्णिक छन्द)
रिव सुनिभ राजही, सुकर धनु साजही।
सुकव धर सीस जौ, अवधपुर ईस जौ।।५५
छंद मांनक्रीड़ा (भ. ग. ग. स. )(वर्णिक छन्द)
स्यांम भजै तांम सुखी, दांम भजै और दुखी। सीतपती गाव सदा, राख जिकौ ध्यांन रिदा।।
५६
दूहौ
च्यार तुकां लघु पंचमौ, खट आठम गुरु आंण। दूजी चौथी सातमौ, लघु अनुस्टुप जांण ।।५७
५४. दुजबर-चार लघु मात्रा का नाम। कहांण-कहा गया। करण-दो दीर्घ मात्रा का नाम।
५५. रिव-सूर्य। सुनिभ-समान, आभा, प्रभा। राजही-
arton ਤੇਤਾ ਹੈ। ਜਾਰਤੀ rtan ਤੇਤਾ ਹੈ। 2700
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16:04
वारता
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जींके चार ही तुकां पंचमौं अखिर लघु आवै, अरु छठौ आठमौ गुरु आवै, दूजै, चौथे, सातमौ लघु आवै, च्यार ही तुकां सौ अनुस्टुप छंद छै। पैलो तीजौ अछिर कौ गुरु लघु कौ नेम ही नहीं, गुरु आवै भावै लघु, पंचमौ अखिर च्यार ही तुकां लघु, छठौ च्यार ही तुकां गुरु। दूजी चौथी तुक रा सातमौ अखिर लघु आवै सौ अनुस्टुप कै छै।
छंद अनुष्टुप
राघव जपतौ प्रांणी, मूढ आळस मां करै। आव दरब आळपं, चेता अंध सचेत रे ।।५८
अथ ब्रहती जात नव-अखिर छंद वरणण
दूहौ
महालिछमी पद मही, तीन रगण दरसंत। दुजबर करणह सगण दखि, सारंगिका लसंत ।।५९
छंद महालक्षिमी (र. र. र. )(वर्णिक छन्द)
रांम राजै रसा रूप रे, नेतबंधी वणै नूप रे। सीत वाळौ पती साच रे, रे मना जेणहूं राच रे।।६०
छंद सारंगिका
(४ ल. ग. ग. स. अथवा न. य. स. )(वर्णिक छन्द)
रघुबर भीली कर रे, बिलकुल सीताबर रे। रुचि करकंधू फळ रे, जमि हसि पीधौ जळ रे।।६१
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छंदामृत / 27
आधार छन्द : वागीश्वरी सवैया (वर्णिक 23 वर्ण)
मोद (वर्णिक 22 वर्ण)
पिंगल सूत्र : भ 5 म सग
गालल गालल गालल गालल गालल गागागा ललगा गा 211 211 211 211 211 222 112 2
आँगन में बस फूल खिले यह कोशिश होगी नित्य हमारी। डाल दवा बढ़ती फसलों पर, कीट मिटा देंगे फलहारी। प्रीति लिए खुश्बू सँग आँगन जा महके ये कोशिश होगी, द्वेष भरी हर गागर को निज आँगन से जा दूर किया है। जीवन को हमने अपने अब एक सुहाना मोड़ दिया है।
आधार छन्द : मदिरा सवैया (वर्णिक 22 वर्ण)
पिंगल सूत्र : भ 7 ग
गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गा 211 211 211 211 211 211 211 2
मंदारमाला सवैया (वर्णिक 22 वर्ण)
पिंगल सूत्र : त 7 ग
गागाल गागाल गागाल गागाल गागाल गागाल गागाल गा
मीठी नहीं बात तीखी सही किंतु मेरी कही बात होगी खरी। क्यों हो गयी आज शिक्षा सभी शिक्षकों के लिए मात्र है नौकरी। हो क्यों गयी आज शिक्षा बिकाऊ रही हिन्द में जो महादान है। आसान होता नहीं ज्ञान देना न लेना इसे कर्म आसान है।
आधार छन्द : दुर्मिल सवैया (वर्णिक 24 वर्ण)
पिंगल सूत्र : स 8
ललगा ललगा ललगा ललगा ललगा ललगा ललगा ललगा
यह प्राण मिले खुद ईश्वर से जिस पे अधिकार सदा उनका। हर सांस अमानत हैं उनकी जिनके बिन है तन ये तुनका। यह कर्ज भला उतरा किससे नित नाम सदा उनका जपना। अभिमान करूँ किस पे कहिए जब पास नहीं कुछ है अपना।
: हंसी (वर्णिक 22 वर्ण)चार पंक्तियाँ दो दो समतुक।
पिंगल सूत्र : म 2 त नसग
गागागा गागागा गागा, ल ललल ललल ललल ललगा गा 222 222 22, 1 111 111 111 112 2
जो जो होना है सो होगा, नजर समय पर रख ढलता जा।
जो भी होगा अच्छा होगा, डगर डगर बिन डर चलता जा।
धर्म (वर्णिक 21 वर्ण)
पिंगल सूत्र : भस नजनभन
गाल ललल गाल ललल, गाल ललल, गाल ललल गा
21 111 21 111, 21 111, 21 111 2
लालललल लालललल, लालललल लालललल ला।
देह कमल नेह प्रबल, प्रेम-अगन, चित्त मगन हो। भव्य चमन मस्त पवन, और सजन, संग मिलन हो।
: नरेंद्र (वर्णिक 21 वर्ण)
पिंगल सूत्र : भर न 2 ज 2 य
गालल गालगा ललल ललल ल, गाल लगाल लगागा 211 212 111 111 1, 21 121 122
लालल लाल लाल लल लल लल, लालल लालल लाला।
खाकर बार-बार पग-पग पर, ठोकर क्यों घबराता । मानव घाव, चोट सह-सहकर, ही निज मंजिल पाता।
लालल लाला, ललाला ललला
ललला लालल लालल ललला।
लालला लालाललाला, लालला लाला लला।
१/
भुजङ्गसंगताच्छन्दः(९।१७२ पिङ्गल)
सजरैर्भुजङ्गसंगता(छन्दःकौस्तुभ)
तमले सुताउँदै थियो
अब सूर्य सामु निस्कियो
उठ मित्र काममा जुटौँ
सुप्रभात कामना गरौँ ।।
भुजङ्गसंगता छन्द
२/
कुसुमिता नरौ रो यदा (९।१५२ पिङ्गल)
तम हटी गयो प्रात भो
उठ सखे छिटो वेर भो
सकल मित्रका निम्तिमा
शुभ प्रभातको कामना ।।
कुसुमिता छन्द
३/
रूपामालीच्छन्दः(९।१)
आयो प्रातर्वेला प्राचीमा
बोकी आशा सारा हामीमा
जागौँ झट्टै साथी बोलाऔँ
संसारै राम्रो गर्ने थालौँ ।।
रूपामाली छन्द।यसलाई रूपामाला वा
कर्पूर छन्द पनि भनिन्छ।
४/
वीरलक्ष्मी या महालक्ष्मी छन्द (९।१४७ पिङ्गल,२।७७ प्रा पि)
लालला लालला लालला ।
जाग जाओ अरे हिन्दुओं।
युग्म होते चलो बिन्दुओं।।
जाग जाओ अरे हिन्दुओं।
सूर्य ज्वाला बनो इन्दुओं।
जाग जाओ अरे हिन्दुओं।
धैर्य के शील के सिन्धुओं।
जाग जाओ अरे हिन्दुओं।।
दाँव में सभ्यता आर्य है ।
आज चुप्पी न स्वीकार्य है।।
प्रश्न अस्तित्व का आज है ।
बेटियों की लुटी लाज है।।
युद्ध को सज्य होके खड़े।
भेदने लक्ष्य को वो बड़े।।
क्या दुकाने बचेंगी भला।
क्या मकाने बचेंगी भला।।
काट देंगे तुम्हारा गला।
खत्म हो जायगा मामला।।
ना गिनो व्यर्थ लाचारियाँ।।
क्या बचेंगी भला नारियाँ।
राक्षसी भीड़ तैयार हैं ।
एक ही बीच दीवार है।।
हाथ में तेज औजार है।
अग्नि के खेल से प्यार है।।
हो गया देश बर्बाद जो।
फायदा क्या जगे बाद जो।।
हिन्दुओं के लिए मौन हैं।
ठीक से देख लो कौन हैं।।
देश में दुष्ट गद्दार है।
दुश्मनों से जुड़े तार है।।
बावले कुर्सियों के लिए ।
देशद्रोही बने भेड़िए ।।
देश जो चाहते काटना ।
हिन्दुओं को मिटा बाटना ।।
जातियों में हमे बाँटते।
ये मलाई तभी चाँटते ।।
अन्यथा दूर वो जीत से ।
देख लो वंश की रीत से।।
मारते भी हमे ही यहाँ।
और हिंसक हमे ही कहा।।
और पूछें उन्हें जात जो।
खा गये प्रश्न से मात वो।।
जात पूछें तो गाली लगे।
हिन्दुओं को हमेशा ठगे।।
जात फर्जी पता नाम भी ।
लिप्त धोखाधड़ी काम भी।।
दोगलों से बचो हिन्दुओं।
युग्म होते चलो बिन्दुओं।।
मूर्खता में नहीं भान है।।
दाँव में देश है प्रान है ।
रक्तप्यासे बने लोग हैं ।
ये पुराना बड़ा रोग है।।
सभ्यता को बचाने उठो।
शोर भारी मचाने जुटो।।
सामने है विपत्ति बड़ी ।
मृत्यु है द्वार पे आ खड़ी ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
विम्व छन्दः (९।९६पिङ्गल, २।८५ प्राकृत पिङ्गल)
ललल लल लाल लाला।।
उतियइल नंदलाला।
अबड़ तिरछंड चाला।।
उधम बड़ ये मचाथे।
टुरन मन ला लुहाथे।।
बिरिज भर सोर गोई।
ललन बड़ चोर गोई।।
पटक मरकी गिराथे।
गटक दहिया पराथे।।
गजब छलिया छबीला।
करत ब्रज रासलीला।।
गुन गजब हे जरे वो।
बिकट उतलंग करे वो।।
महल चल तो बताबो।
जबर झगरा मताबो।।
दरस कर चैन पाबो।
ह्दय छबि ला बसाबो। ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
११/०९/२०२४
स्निग्धा स्याद्भममा यत्र हराननयुगैर्यतिः(९।७ पिङ्गल)
जाग न साथी हेरौँ पूर्व
रात धपाई आए सूर्य
उन्नति गर्ने बाटो लागौँ
होस् सुप्रभातं वाणी बोलौँ ।।
७/
स्निग्धा छन्द
हंसरुतं म्नौ गौ (६।७ पिङ्गल)
जागौँ है तम हरायो
प्राचीमा रवि उदायो
केही कार्यतिर लागौँ
साथीमा शुभप्रभातम् ।।
हंसरुत छन्द
८/
वसुलमचलमिति (८।२५६ पिङ्गल)
प्रिय उदित छ रवि
नभ झलमल अघि
झटपट उठ सब
शुभ दिन भन अब ।।
९/
सुचन्द्राभा य्रौ ग्लौ (८।१४६ पिङ्गल)
अँध्याराको गयो राज
हिजो भागी भयो आज
उठौँ झट्टै गरौँ काम
शुभं पारौँ मिठो घाम।।
सुचन्द्राभा छन्द
१०/
सुविलासा सरौ ग्लौ हि (८।१३२ पिङ्गल)
उठ पूर्वी दिशाबाट
रवि आए नयाँ ठाँट
दिन राम्रो गरे काम
सुप्रभातं रहोस् नाम ।।
सुविलासा छन्द
११/
नभलगा गजगतिः (८।१२० पिङ्गल)
तम गयो नभ खुल्यो
उठ छिटो दिन फि-यो
सब मिली अघि बढौँ
शुभ प्रभात नचुकौँ ।।
गजगति छन्द
१२/
कमलच्छन्द (८।९६ पिङ्गल, प्राकृत पिङ्गल २।७५)
तिमिर पर गैसके
रवि उदित भैसके
प्रिय अब बिहान भो
मधुर सुप्रभात भो ।।
कमल छन्द
१३/
रो यलौ गुरुः स्याल्लता (८।७५ पिङ्गल)
प्रात भो लुके चन्द्रमा
रङ्ग झल्कियो पूर्वमा
भन्दछन् चरा जाग है
सुप्रभात भो हेर है ।।
लता छन्द
१४/
पद्धरि छंद ,अरिल्ल छंद , अड़िल्ल छंद
चार चरण, सम मात्रिक छंद,
यति १० – ६ पर या ८ – ८ पर , चरणांत जगण
मधु वाणी से भी हो मलाल |
करना होगा तब यह ख़याल ||
समझों यह नर है हृदय दीन |
अपनेपन से है रस विहीन ||
#अरिल्ल छंद –
चार चरण, सम मात्रिक छंद,
चरणान्त में भगण 211 या यगण 122
अ-चरणांत २११
१५/
लोभ कपट रहता जब आकर |
दुखिया भी दिखता सब पाकर ||
अहसान न माने वह लेकर |
पछताता रहता सब खोकर ||
१६/
पद्धरि छंद
चार चरण, सम मात्रिक छंद,
यति १० – ६ पर या ८ – ८ पर , चरणांत जगण
पद्मावती मात्रिक छंद(१०,८,१४ अंत दो गुरु)
लाला लालाला, लाला लाला, लाला लाला लल लाला।
शब्दों की गागर, रूप नया धर भरती उजास अरुणाई।
अधरों के शतदल,मोहक पलपल, करते रहते पहुनाई।।
नैनों का काजल,पलकों का दल,करते भावों से दंगा।
चपला - सा चंचल,तन है विह्वल, मन में लहराती गंगा।।
२/
(शैल सुता वर्णिक छंद)
[ चार लघु+ छह भगण+गुरु ]
{११११,२११,२११,२११,२११,२११,२११,२}
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प्रियतम प्रीति पुकारत आरत आधि अकिंचन प्राण भरे।
अविकलता पथ में प्रतिपूरित आतुरता परित्याग करे।।
३/
( शैल वर्णिक छंद )
[ यगण,यगण,यगण,जगण ]
{१२२,१२२,१२२,१२१}
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तुम्हारे लिए ही सजा है वितान।
चलो साधना का निभाएँ विधान।।
नहीं चींटियाँ छोड़ती हैं प्रयास।
सदा हार में जीत का ही कयास।।
हमें भी सिखातीं रहें सावधान।
चलो साधना का निभाएँ विधान।।
४/
( पीयूष निर्झर मा. छंद )
{२१ मात्रिक,१४/७ पर यति }
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संगमरमर की सतह पर,क्यों फिसलना।
बर्फ की सातत्यता है, फिर पिघलना।।
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मृगमरीची रूप सौष्ठव, चन्द दिन का।
यह बिखरता टूटता ज्यों,शुष्क तिनका।।
सौंदर्य की लावण्यता पर,मत मचलना।
बर्फ की सातत्यता है, फिर पिघलना।।
५/ ( राग वर्णिक छंद )
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स्वार्थ सार्थवाह सा सुसुप्त सारथी।
प्रेरणा पलाश पुष्प प्रार्थना वृथी।।
शुद्ध शांति स्याह-स्याह सोहती सखे।
लक्ष्य लालिमा ललाम लोभ क्यों लखे।।
लोभ दम्भ द्वेष में सवार स्वार्थी।
प्रेरणा पलाश पुष्प प्रार्थना वृथी।
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