मैं फकत अपने धुन अउ ठाट में रहौं।।
बन में रहौं घर में रहौं ते हाट में रहौं।
फकत अपने धुन में अउ ठाट में रहौं।।
गिर के उठ ठाढ़ होके रेंग दँउड़ के,
अब कामधाम बंद कर उचाट में रहौं।
आँच खाँव पाँच खाँव नाच नाच गाँव,
अन्नपूरना रँधनी चुल्हापाट में रहौं।।
झीमझाम छटके नभचँदैंनी दल के दल,
मैं मोर मन के पैडगरी बाट में रहौं।।
बेर जुरत गीत उतरथे अगास ले,
नस नस ला झनझनावत उवाट में रहौं।।
आखर टघल टघल लिखथे गीत बिगारी,
तारा-कूची देके मैं कपाट में रहौं।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
२६/०९/२०२४
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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