सुर्रत हे दिन रात शहरिया!!!
रुख लदाये छान्ही छपरी।
घाम जाड़ दुख तापत बपरी।।
कोठ बोहाये आँसू रेला,
सुर्रत हे दिन रात शहरिया।।
बिरवा अँइठे तुलसी चौंरा।
गाँव गुड़ी के चौंरा गौरा।।
डारी टूटत फर लदकाये,
आमा हवय बलात शहरिया।।
तलफत तोर जनम जुग जोंही।
अउ कतका दिन गाही रोही।।अँगना पेंड़ फूल के घरुहा,
तोर बिगन अइलात शहरिया।।
धर सुरता लमडोरवा डोरी।
आँसू ढारत ओरी ओरी।।
जेकर गाँठी जुरे तोर संग,
वोकर जीव करलात शहरिया।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव
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