तेजपुंज के दरसन करा, हर ले देह बिकार।
अंतर मेट समेट अउ, अपन बना भरतार।।
आये तैं हरि भजन बर, मूड़ी फेंटा बाँध।
फेर जगत जंजाल ला, काबर बोहे खाँध।।
सुख संगम बर रामजल, तँउरत साधू समाज।
जगतगति ब्यापत नहीं, भव के माँझ बिराज।।
गुरुबर ज्ञान अँजोर हे, गुरुबर जग सिरमौर।
गुरुबर परम दयाल हे, चित्त रहत गुरु ठौर।।
दुख दालिद मिटगे सबो, पावत कृपा अपार।
गुरुनाम डोंगा बइठ, जीव बोहावत धार।।
गुरु हाथ मूड़ के उपर, माथा गुरुबर गोड़।
गुरु के ठाँव बसत हृदय, सब पै पाखा छोड़।।
गुरुबर बिन सदेंह के, हो न सकै उपचार।
गुरुबर मुख बोहात हे, सहसो गंगा धार।।
जीव जगत रच के हरि, बाँधे माया फाँस।
माया मुक्त गुरु करै, जेकर मन बिसवाँस ।।
गुरु बनाय सब शिष्य के, जम्मो बिगड़े काज।
पार करै भव सिन्धु ला, बइठा नाम जिहाज।।
धोबी के फटकार ले, सफ्फा कपड़ा होय।
तइसे गुरु के ताड़ना, मन ला काँचै धोय।।
मन हाथी मतवार गति, नरकाकुंड भोसान।
धरे तुतारी छेकथे, गुरुबर जबर गोसान।।
गुरु अढ़ोना में चलौं, बाहिर धरौं न पाँव।
जाये बर दुरिहा अबड़, सहस सुरुज के गाँव।।
बिरहा में बिरहिन जरै, सरी दिन सरी रात।
बिरहा जागे जीव बस, एक पिया पतियात।।
बिरहा आगी रमकगे, धधकत आठो अंग।
मन जुग जुग जोहीं जुगल, खोजत प्रीतम संग।।
शोभामोहन के उपर, किरपा कर घनश्याम ।
अहोरात मुख में बसै, फकत एक तोर नाम।।
कुछु सिंगार सुहाय नइ, बिगन पिया के संग।
का रमहूँ जग रंग में, चढ़े पिया के रंग।।
मोर बिरह आगी रमक, जब बरही बंगबंग।
घीव रितोहूँ लेसहू, करम काठ बजरंग।।
आगी सिपचत चित्त अउ, कुहरत आठो अंग।
तभे सिताही जब पिया, भाँवर लेबे संग।
हरि रीता आतम जिंकर, सुन्ना मंदिर जान।
वोकर दरस अशुभ सदा, झन हिलमिल मनुसान।।
सबो बेद मथके कहैं, बड़हर संत सुजान।
नाम रूप रतिया हृदय, दरसन कर भगवान।।
तिरिया मूड़ी माँझ जस, गगरी रखै संभार।
तइसे जतन सँवार मन, जाये बर ओ पार ।।
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