रुखराई जंगल काटत हौ, बादर ला परघाही कोन।
झड़ी लड़ी रझ रझ जलबुँदिया, नेवता पार बलाही कोन।।
आगी उगलत सुरुजदेव के, तांडव ताप नवाही कोन।
सागर नदिया नरवा ढ़ोड़गी, जीव के प्यास बुताही कोन।।
ममहाती एहंँवाती करके, भुँइया ला सुघराही कोन।
बिजबोनी टुकनी ला धरके, धान छिंचे बर जाही कोन।।
भुँइया के पटपटहा पागी, हरियर रंग रंगाही कोन।
घानीमूनी खेले कूदे, लइकन ला उकसाही कोन।
चुरुवा भर पानी बर तरसत, चुरगुन जीव जुड़ाही कोन।
दाना पानी जीव जगत बर, बादर के बिन लाही कोन। ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...
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