Friday, 26 April 2024

बादर ला परघाही कोन।

रुखराई जंगल काटत हौ, बादर ला परघाही कोन।
झड़ी लड़ी रझ रझ जलबुँदिया, नेवता पार बलाही कोन।।

आगी उगलत सुरुजदेव के, तांडव ताप नवाही कोन।
सागर नदिया नरवा ढ़ोड़गी, जीव के प्यास बुताही कोन।।

ममहाती एहंँवाती करके, भुँइया ला सुघराही कोन।
बिजबोनी टुकनी ला धरके, धान छिंचे बर जाही कोन।।

भुँइया के पटपटहा पागी, हरियर रंग रंगाही कोन।
घानीमूनी खेले कूदे, लइकन ला उकसाही कोन।

चुरुवा भर पानी बर तरसत, चुरगुन जीव जुड़ाही कोन।
दाना पानी जीव जगत बर, बादर के बिन लाही कोन। ।

शोभामोहन श्रीवास्तव 

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