अधर उड़त डंगचगहा मन।
कलजुग के कलकल में मनगम,
बँसुरी फूँकत कोन किसन।
आरो पाके मया बया के,
अउ डोलन लागत मोर मन।।
पबरित गोड़ छुवे बर तरसत,
फूल गँवइहा जगत तरन। ।
भुँइया में नइ गोड़ मड़ावत,
अधर उड़त डंगचगहा मन।
राजबाट हर बाँह धरत अउ,
पैडगरी झींकत धड़कन ।।
होके निचट अकेल्ला छेल्ला, जीव करत निसदिन सुमिरन ।।
कन कन के जब तैं गोसैया,
हवस लुकाये कोन मेरन।।
तन ड़ोगर दर्रा सँगसी ले,
बुलकत पातर दग्ग किरन।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
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