Tuesday, 26 March 2024

बहुरिया

बहुरिया (घनाक्षरी) 

भिनसरहा ले उठ घर ला बहार झार पोछ लीप छरा छींच डारथे बहुरिया।
घर अँगना सँवार ओढ़ना काँच पखार झटकुन नहा खोर डारथे बहुरिया ।
चुक ले पहिर ओढ़ अउ मुड़ कान कोर माँग में सेंदुर रेख पारथे बहुरिया।
चरचर ले सुघर एड़ी भर के माहुर लिख दुनो गोड़ ला सिंगारथे बहुरिया।
दई देवता सुमर सरधा भरे घुमर कुलदेबी आरती उतारथे बहुरिया।
घुटका घाले सुघर, चूरी पैजन बजात रँधनी के खोली ला सँभारथे बहुरिया।
दनन दनन राँध भात साग रोटी पीठा बाँट पोरस के किरवारथे बहुरिया।
सास में दाई ससुर में ददा के रूप देख उही अनुसार बेवहारथे बहुरिया।
ननद ला गिंया गड़ी देवर ला भाई कस जान के
मया के मधु झारथे बहुरिया।।
पति के पिरित में समाय सब सुख बीजा पाँव पर चरन पखारथे बहुरिया।
तुलसी के चौरा में संझा के बेरिया सुघर रिगबिग दियना ला बारथे बहुरिया।
देवता कुरिया दीया राखके अँजोरा पाट, माथ टेक देव ला पुकारथे बहुरिया।
बेटवा तो एके कुल तारथे सँभारथे अउ दुनो कुल बोहथे अउ तारथे बहुरिया।।
शोभामोहन भारत के रतन तिरिया ला सरधा ले धोकर जोहारथे बहुरिया। 

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...