Tuesday, 26 March 2024

दोहा भजन

सगा सगाने गाँव में, अपन आप झन भूल ।
येती वोती देख झन, सब ए सेम्हर फूल।

खेलत खावत दिन कटत, सुतत सुतत अउ रात।
हीरा माटी में मिलत, कुछु कहि तौ कँझात।।

दही लेवना असन मन, पथरा होगे देख ।
पर ला बद्दी देत हे, कोन मेटही लेख।।

सुख के नगरी हे कहाँ, खोजत जग दिन रात।
मन थिराय बिन फेर तो, बनै नहीं कुछु बात।।

जीयत जागत तक हवै, ये संसारी  प्रीत।
सुतत साठ समसान में, लेगत गाहीं गीत।।

बिन पानी के बुड़त हे, घाट बँधाये नाव।
कइसे होबे पार अउ, जाबे तैं घर गाँव।।

माया मतलावत हिया, धर धर सुंदर नाम।
जग ठकुराइन देख तो, मिलन न देवत राम।।

चिंतामणि चिंता हरे, खोजत आगे द्वार।
भलमानुस अब तो अपन, फरिका चिटिक उघार।।

कोन सुनै काला कहौं, बिरहा दुखः अपार।
एक डहर साजन गली, एक डहर संसार।।

हीरा मूठा भर उठा, कूहा ला झन जोड़।
कुछु नइ जाही संग में, दू गज तीखा छोड़।।


फकत पिया के रूप ला, देखौ नैन उघार।
का देखौ अउ आन ला, का देखौं संसार।।

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