सितम्बर २०२३के सब रचना
उड़त मन जल जगघेरापार
पवन अगन भुँइया जल नभतल,
घेरा ले चल पार।
चंद्रचंदैनी रबि नछत्तर,
नहक जगतबिस्तार।।
उड़त मन चल जगघेरापार।।१।।
नरक सरग सुख ठगजगभाँवर,
जीव खा जाही हार।
असलनकल के बिपतसकल ले,
उबरे भज सरकार।।२।।
शोभामोहन
१/
उसल के मइके ले चोला।
जे अँगना माड़थे डोला।।
उही डेहरी में आखिर साँस
तक रहिथे खटत बेटी।।
मया मइके के धर ओली।
चलथे जब बइठे के डोली।।
दूनो कुल के धरे मरजाद ला
रहिथे बटत बेटी।।
कभू कइना कभू देबी,
कभू दासी कभू सेबी।।
जलाये जोत कुल भुँइया,
तरी रहिथे पटत बेटी।।
सदा सुनता सुमत सेती।
मया करथे कुलक खेती।।
तभे तो गाँव घर परिवार,
सब रहिथें रटत बेटी।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७/०९/२०२३
२/
अंतबेर बिदिया का करही।
नामधरे मन पार उतरही।।
जगअरझे ला बेरा छरही।
टारे ले नइ अलहन टरही।
फेर जनमही सरही मरही।।
कभू नहीं दुखदालिद हरही।
पाप गँजाही सरभर खरही।।
करनीफल सब भोगे परही।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७/०९/२३
३/
लकड़ी के घुन्ना सब जग पतिया थे ना रे सुआ हो।
मन घुन्ना कोने पतियाय ना रे सुआ हो।
करसापानी अँउटे जग देखि पाये ना रे सुआ हो।
खून अँउटे कोने देखि पाय ना रे सुआ हो।
पानी परे ढेला घुरे जग देखि पाय ना रे सुआ हो।
चोला घुरे कोने देखि पाय ना रे सुआ हो।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७ /०९ /२०२३
४/
सँवरेंगी चंचलचिरैया रे,
नइ जानै कोनो तोर भाग ।
पिंयरपिंयर पहिरे पिंउरी,
पिंयर होवत तोर हाथ ।।
माथमउर दुलरु झलमल,
लटकत लर लहरात।
लहरबटोरलुगरी अँचरा,
गाँठबँधे पिया मुसकात।।
खाँधजनेउ कटार धरे,
ऊँचऊँच मूड़ी तनियात।
सुकुवाउगे पँगपँगातीबेर,
बिदा माँगे आवत बरात।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७ /०९ /२०२३
५/
झाफरझुंझकुर ददाबखरी,
कि बीचबीच अमुवा के झाड़।
गजबघोलारे रुखछँइहा में,
चारोखुँट भाँड़ीभीती आड़।।
गुनत बइठे ददा निचटझँवाये,
बेटी बिदा गुन कठुवात।
कोराखेले जाँघीबइठे बिटिया के,
बिहतरामड़वा छवात।।
धिड़कतबाजा चढ़त हरदी अउ,
छतिया पथरा लदकात।
हँसत पहुना जुरियाय सबो,
दाई आँखी ओरी चुचुवात।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७ /०९ /२०२३
६/
का देखि मछरी तुलमुल करथे,
का देखि भँवरा लुभाय हो।।
का देखे दुलरु चले ससुरारे,
का देखि गइस मोहाय हो।
जल देखि मछरी तुलमुल करथे।
फूल देखि भँवरा लोभाय हो।
सारीसखि देखे दुलरु चले ससुरारे,
सुंदरी ला जावत बिहाय हो।।
का माँगे सारीसखि का माँगे सरहज,
का माँगे सुंदरी सिंगार हो।
का माँगे बहिनीमाई डहरछेकौनी,
का माँगे माँ ओली पसार हो।
सोन माँगे सारीसखी चाँदी माँगे सरहज,
सुंदरी हा सेंदुर सोहाग हो।
नेग माँगे बहिनी माई डहरछेंकौनी,
मया माँगे माँ ओली पसार हो।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७ /०९ /२०२३
७/
कइसे बिदा दौ दुलारी
रोवत सीता के महतारी,
कइसे बिदा दौ दुलारी।
कोन सुआपड़की चारा चराही,
कोने हर लिपही ओसारी।
कइसे बिदा दौ दुलारी।
कोन चँउकपूर करसा सजाही,
कोन छरा देही दुवारी।
कइसे बिदा दौ दुलारी।
कोने छाँट छाँट के साग सिल्होही,
गिंचर गिंजर बखरीबारी।
कइसे बिदा दौ दुलारी।
कोन देवधामी बर हार बनाही,
सुन्ना होही महल अटारी।
कइसे बिदा दौ दुलारी।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७ /०९ /२०२३
दोहा
८/
अद्धर बिगन अधार के, कोन करै किरवार।
छछले बर रुख खोजथे, मन के नार बिंयार।।
जरै नौकरी चाकरी, जरै कुटुम परिवार।
अउ ये जम्मो जग जरै, जब जीव जरत हमार।।
ओलीभर पइसा धरे, मन नइ साध जगान।
धनधोगानी जोर के, झन रच खरही मान।
तोर नाम के काम हे, तोर धाम ले काम।
तोर बिगन बिरथा हवै, प्रान चेतना चाम।।
तोर बिगन का जीत अउ, तोर बिगन का हार।
तोर बिगन का सुखसजन, तोर बिगन संसार।।
गाँव गाँव नदिया फिरत, खोजत सागर बाट।
ठाँव ठाँव अंतस फिरत, उतरे बर हरिघाट।।
टेड़ेंगबेड़ेंग नदिया फिरत, एकदिन समुन्दर समाय।
त इसे कतको जीव फिरै, जा प्रभु सर्न थिराय।।
टिप-टिप ले भर तेल ला, कइना दीप जलाय।
पाके प्रियतम ला अपन, लहरलहर लहराया।।
तेलभरे दियना जला, जब करथे रतजाग।
तप कइना करथे कठिन,तब लहराथे भाग।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७/०९/२०२३
९/
सर्वगामी सवैया
गौरी न गौरा न बाँटी न भौंरा, तरी छाँव औंरा खवाई न जाने।
देवीचढ़ौना मनौतीमड़ौना अढ़ोनाबढ़ोना चढ़ाई न जानै।
धौंरा न सौंरा अमेरालमेरा पठेराफुला पाट पाई न जानै।
खोली धँधाये छँदाये तिमाला नहीं गाँव कोती जवाई न जानै।
खोंखी थकासी रोवासी छकासी बिटासी बियासी कराई न जाने।
भारा तियारा अजारा पसेरी परोसा हजाई पजाई न जानै।
सवारी मुवारी दुवारी छेवारी उन्हारी सियारी
मड़ाई न जानै।
खोली धँधाये छँदाये तिमाला नहीं गाँव कोती जवाई न जानै।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०८/०९/२०२३
१०/
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