दोहा भजन
१
पाँच जिनिस के पुतरी, झन ले ककरो हाय।
बइगा गुनिया बइद मन, समझ न पाहीं बाय।
२
पानी भर चूल्हा चढ़ा, माटी हरिया ताँव।
बउर समझ के रे सगा, नहीं ठेंसरा सहि पाँव।
३
पानी उपके फोटका, ये मनखे के जात।
मालिक रचत उझार के, तभो न मरम जनात।।
4
चोला गिंजरत हाट में, अउ सुन्ना मनबाट।
पीरा सब के भाग में, बाँट सकस तौ बांँट।।
५
माटी में मिलथे सबो, माटीउपजे जात।
मूड़ी हाँड़ी बांँट के, फेर करत सौ बात।।
६
बाहिर ले ले गुज गुज अउ, भीतर कोती टाँठ।
टाँठ जनावत भीतरी, भइगे जीव उचाट।।
७
दुख सुख मन में उदगरै, न इ हे घटे उपाय।
राम भजन के गाय ले, दुख नही चिटिक जनाय।।
८
सबो बिसाये ज्ञान हर, पैसा फकत कमाय।
फेर सवाँगे ज्ञान तो, भव ले पार लगाय।।
९
आँखी वाले देखथे, सुघ्घर सब संसार।
अउ अंधरा पावै नहीं, सुघ्घरपन के पार।
१०
बद्दी दै ओखी लगा, बोलतसाठ रिसाय।
वो हेरौठा बन जियै, जगसुख चिटिक न पाय।।
११
बड़भागी वो जेन ला, गलती अपन जनाय।
दोस टरै ओकर सबो, मन परछिन हो जाय।।
१२
चुमचुम ले जग ला भुला, रामभजन मन लान।
माटी के चोला हरै, हो जाही कल्यान।
१३
धन धोगानी कतिक हे, तेकर ले नइ काम।
जेन रामगुन गात हे, उही जात प्रभुधाम।।
१४
धन-धन होगे जीव हर, जपत राम के नाँव।
सुख बरसात चारो डहर, जिहाँ मढ़ाथौं पाँव।।
१५
दुखिया वो संसार में, जेन जपै नहीं नाम।
जेकर अंतस राम वो, चोला श्रीहरि धाम।।
१६
जेन जिनिस ला हाट ले, लाने हवस बिसाय।
जिनिस बजरहा हर कभू, सुख नइ देये पाय।।
१७
गुनै फेर उरथी करें, ओला जान सुजान।
उरथी कर मन में तुनै, मूरख उही महान।।
१८
जीत बिचारे छोड़ के, सक समरथ ला जान।
घर जाए के साध मर, सुमिरन कर भगवान ।।
१९
थिरा पहा रेंगत पहा, जिनगी आखिर तोर।
रेंगत हे आठों पहर, भँवरी ओकर गोड़।।
२०
गोठ बात निसगी रहे, निसगी रहे गुनान।
जिये खाय अतके जिनिस, निसगी हावे जान
२१
बउरे हस जे चीज ला, बिगन चुकाये मोल।
कर्जा चढ़गे जान ले, मुफत मिलिस झन बोल।।
२२
जे दिन होही तोर बर, डर ले बड़का टेक।
कोनो विपदा गोड़ ला, फेर न पाही छेंक।।
२३
होय भोरहा मान ले, माफी मिलही माँग।
फेर भोरहा ला अपन, खूँटी में जन टांँग।।
२४
अधकचरा गोठकार के, खीख लगै सब बात।
गोठसाज के गोठ सुन, अनचिन्हार लपटात।।
२५
आरुग हाँसी हर हरै, मनखे के सिंगार।
मुखमंडल आनंद झरै, नसनस टरै बिकार।।
२६
राम रचे सब जीव रे, मीनमेक झन हेर।
चौरासी घुमरन करत, भुगते परही फेर।।
२७
माटी के चोला बने, माटी मिलही जान।
चारी सीताराम के, कर ले रे मनुसान।।
२८
हार मान के बइठ झन, अउ कर उदिम सजोर।
देउत खड़े दुवार में, मुँहरन करे अंँजोर।।
२९
बेरा रूप बिगाड़ दै, तेकर पहिली जाग।
रामबाट में चलत जा, पल्टी खाही भाग।।
३०
बलकर मनखे गढ़ डरै, अगम गाँव बर बाट।
घुसघुसहा डरडर चलै, चातर चिन्हवा छाँट।।
३१
मनखे के होती कतिक, कागद हवय बतात।
बिन कागद परमान के, कहूँ नहीं पतियात।।
३२
चोला माटी गिरत ले, कोन हरस तैं खोज।
रेंगे कर दूचार पग, भीतर कोती रोज।।
३३
बज्र बिपत के बेरिया, ये जीव बिगन अधार।
सुख आथे तब मिल जथे, कतको झन लगवार।।
३४
बने बने में बन जथें, कतको झन लगवार।
ठाढ़ बिपत में जेन हो, उही असल संगवार।।
३५
बघवा जइसे उदिम कर, तन मन सक बढ़वार।
शुभबेरा बरकस उदिम, लाही जीत दुवार।।
३६
पाँच जिनिस के देह हे, पाँच जिनिस के खेल।
पाँच जिनिस में मिल जही, करत करत रंगरेल।।
३७
दँतनिपोर मन ठाढ़ हो, ताकै नदिया पार।
पार लगे साधू सुजन, कुदै बीच मंँझधार।।
३८
हहो हहो सब बात में, करथे वो नइ मीत।
गिनहा ला गिनहा कहै, उही जोग परतीत।।
३९
कुछु अइसे लिख दे कलम, पढ़ के जग रस पाय।
रामरमा नसनस बसै, जीव बिसुद्ध हो जाय।।
४०
आलस छोड़ गुनान कर, कर परभल पुनदान।
रामरमा के भजन कर, छुटही जगत गठान।।
४१
अइसे कृपाकटाक्ष हो, हृदय बसै रघुबीर।
आस फाँस फाटा टरै, जब जीव छुटै शरीर।।
४२
बने कहस गिनहा कहस, बेरा मिले पहान।
काकर खर्चा करत हन, सब देखत भगवान ।।
४३
हाँसी निंदा लाज डर, ये चारो ठन रोग।
हाय सवाँगे संग नहीं, होवन दै संजोग।।
४४
ए मुँह ले वो मुँह करत, चरबत्ता के गाँव।
बोलन दे ये गाँव ला, तैं चल प्रभुवर ठाँव।।
४५
जाने ले बुधबल बढ़ै, सुख उपजै मन खेत।
सब असार ला छोड़ दे, राम नाम बस लेत।।
४६
गिर के फेर उठत जबे, अउ हो जाबे ठाढ़।
राम रूप मन में बसा, करबे मया प्रगाढ़।।
४७
माँग कुछु देवत कुछु, ये निर्दयी संसार।
सब तज मन भरतार भज, लगही डोंगा पार।।
४८
मंगन माँगत मर जथे, कोनो नहीं छकाय।
जेन माँगे हरि दिहै, ये जग हे निरुपाय।।
४९
पाई पाई जोड़थस, फेर लगथस कंगाल।
हरि सुमिरन में मन लगा, होबे मालामाल।।
५०
झूठ लबारी ये जगत, झूठ नता परिवार।
जगत हेरौठा मोर मन, रहत राम के भार।।
५१
मन कहिथे हरि भजन कर, जग छुतही कहै हाय।
कइसे छोड़ौ सात दिन, तिरिया जनम धराय।।
५२
लबरा ये संसार हे, राजा प्रजा लबार।
सत ड़ोंगी बइठार के, प्रभु लगा दे पार।।
५३
तोर मोर अब माँझ में, कुछु झन आवै आड़।
अइसे अब मोर भीतरी, तोर मया हो गाढ़।।
५४
आँखीओलम हो झने, मैं हो जहूँ अनाथ।
जन्म मरन बोचकाय झन, अइसे बँधना बाँध।।
५५
तोरे सक ले सक हवय, मोर मन में तोर राज।
तोर मर्जी ले होत हे, अब तो जम्मो काज।।
५६
तीनलोक चौदह भुवन, सबमें तोरे राज।
सबला नाच नचास तैं, अंतस ठाँव बिराज।।
५७
का मोहनी डारे हवस, जब्बर हवँव तिरात।
हाथ थकत नइ गुन लिखत, अउ मस नहीं सिरात।।
५८
तोर हाथ जीव सुँतरी, तोरे हाथ परान।
एक तहीं सिरतो पिया, तोर करौ गुनगान।।
५९
मन हर ठानै ठान जब, देह करै संजोग।
मन के मइल मँजाय तब, मिटै जनम के रोग।।
६०
मैं मूरख भटकन परौं, तहूँ मोला भटकाय।
अब ये घुनहा काठ ला, झन धरवाबे बाय।।
६१
झन भुलाँव हरि नाम ला, झन भुलाँव धुन ध्यान।
झन भुलाँव घर गाँव ला, कर किरपा भगवान।।
६२
नानमून माँगौं नहीं, जबर हवय मोर आस।
तैं दानी सबले बड़े, देबे हे विश्वास।।
६३
तोर चरन के धरन हर, मन में भरत हुलास।
जनम जनम करबे पिया, ये हिरदे रहिवास।।
६४
अब कोनो गरियाय ते, कोनो हर सहराय।
नइ देखौं जग डहर ला, नाम जपत दिन जाय।।
६५
मोरे बर उल्टा बहै, सबदिन जगत बयार।
अब रेंगे नइ जात हे, अँगरी धर भरतार।।
६६
गाँव गली डीह डोंगरी, नाम मोर बदनाम।
पापपुन्न ये जीव के, तैं जानत हस राम।।
६७
सरपटहा जग रेंगथे, धीरलगहा मोर चाल।
टुटगे हे सब आसरा, रखबे पिया खियाल।।
६८
करत लोटिया गोबरी, जिनगी दियेंव पहाय।
थके बिराजे साँझकन, तोर डेहरी आय।।
६९
रोनहूत होये कंठ के, भरभरात सब गीत।
जग ले हारेंव का भइस, पायेंव तोर पिरीत।।
७०
गिरेंव उठेंव रेंगेव थकेंव, नइ समझेंव जगचाल।
अब टोरे बर आ प्रभु, तहीं मेकराजाल।।
७१
हँसबे तौ जग हाँसही, रोबे तब नइ रोय।
झन छूटे हरिलगन अब, कतको जगत धिरोय।।
७२
घुसघुसहा सब रेंगथें, देखे सूने हाट।
नाव अँजोरी रेंगथौं, अँखमुंदा हरिबाट।।
७३
समरथ नइ रहिगे पिया, अउ झेले के झेल।
जीव परेवा हेर तन, पाँच जिनिस कर मेल।।
७४
फूटत कंठ ले गीत अउ, पाय उठत मन साध।
घटघट बसिया तोर बर, उमड़त मया अगाध।।
७५
हाँसी में हाँसौं नहीं, रोवौं नहीं रोवाय।
साँस साँस में जब पिया, मोला तहीं जनाय।।
७६
चौरासी के फेर मे, अनगिन चलत उजोग।
तोर सिवा कोनो नहीं, करै जीव बर सोग।
७७
जेती जब रेंगौं पिया, भितिया जगत उठाय।
हपट गिर मड़ियात हौ, कोरा तोर लुकाय।।
७८
भितिया माया मोह के, तैं रहिथस ओ पार।
सबो छाँड़ के आत हौं, होत देख मुंधियार।।
७९
तोर दया ले सतडहर, बहकिस अंतस धार।
नाम दियना जले हे, टरगे सब अंँधियार।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
१७/०५/२०२३
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