Friday, 16 February 2024

ए बुलबुल घर वापस आओ

ए बुलबुल घर वापस आओ।

निर्भय उड़ो गगन मंडल में।
चहक फुदककर दाने खाओ।
ए बुलबुल घर वापस आओ।

इस सरयू जमुना के तट से
जनम जनम का नाता तेरा।
पुरखों की पहचान भुलाकर,
तुम किसके घर डाली डेरा।

यही समय है सही समय है,
अब मत बिल्कुल देर लगाओ।
ए बुलबुल घर वापस आओ।

तुम कागो की संगत करके,
भले बोलती कागों जैसे।
सात पीढ़ियां पहले पूर्वज,
थे दहाड़ते बागों जैसे।।

रविकुल की गोत्रज हो तुम भी
अंश वंश का पता लगाओ,
ए बुलबुल घर वापस आओ।।

सात सुरों में लोकगीत के,
सब सतरंगी गाने भूली।
रीति नीति संस्कृति सभ्यता,
छोड़ चली बनने मामूली।।

यहीं तुम्हारा मेरा घर है,
दूर देश मत दौड़ लगाओ।
ए बुलबुल घर वापस आओ।।

इस धरती में तेरे पूर्वज,
पले बढ़े खाये खेले हैं।
और शिकारी के शिकार बन,
अकथ दुखों के दिन झेले हैं।।

अब आगे सुख के पलछिन है,
व्यथा कथा की बात भुलाओ।
ए बुलबुल घर वापस आओ।।

जीवन उत्सव विद्रोही के,
चंगुल में तुम भी व्याकुल हो।
तम्ही अयोध्या पूजित पाहुन,
तुम भी संबंधित गोकुल हो।।

लोट लोट पावन धरती पर,
छाया बैठो रघुपति गाओ।।
ए बुलबुल घर वापस आओ।।

वो बहेलिया मरा पड़ा हैं,
जिसने तुमको जाल फँसाया।
निज इच्छा से जिसने तुमको,
झूठ सजाया जूठ हँसाया।।
तुम अपना अस्तित्व खोजने,
निर्मम रेगिस्तान न जाओ।
ए बुलबुल घर वापस आओ।।

उत्सव पर्वों के रंगों से,
जीवन को रंगीन बनाओ।
दुख को भाग्य समझ जीवन को,
नहीं क्रूर संगीन बनाओ।।
अभी अभी जो पर निकले हैं 
जल्लादों से मत कतराओ।।
ए बुलबुल घर वापस आओ।।



शोभामोहन श्रीवास्तव
बसंत पंचमी विक्रम संवत २०८०
माघ मास 

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