बसंत पर रचना दूरदर्शन के लिए
बर दे बर दे, सरसतिया बर दे।
भेद रहै झन, बुध हो अइसन,
मन रीता कर दे, सरसतिया बर दे ।
बर दे बर दे सरसतिया बर दे।।
काया के बंधन झन बाँचै,
जग जीता कर दे सरसतिया बर दे।।
बर दे बर दे सरसतिया बर दे।।
आस रहै झन प्यास रहै झन,
सुभीत्ता कर दे, सरसतिया बर दे।
बर दे बर दे सरसतिया बर दे।।
साधन देह सुफल हो जावै,
मन गीता भर दे, सरसतिया बर दे।
बर दे बर दे सरसतिया बर दे।।
घनाक्षरी
अँजोरी हा दिनकर जगर मगर कर,
अपन किरन जग भर छरियाय हो।
फूले फूल चरचर, महर महर कर,
अपन गमक चारोखुँट बगराय हो।
भँवरा डहँक कर, मधुरस भर भर,
जगत ला बाँट अउ जीव ला जुड़ाय हो।
काबर मनुख मन, छोड़ के अक्खड़पन,
प्रकृति के सीखा बने धरै नहीं हाय हो।।
मुक्तक
मन बसंती तन बसंती, और है जीवन बसंती।
हो गया है आज देखो, सृष्टि का कण कण बसंती।।
आम्रमंजरी डाल झूले, बेलों में नव सुमन फूले।।
चटख रंग छायी प्रकृति में, हो रही धड़कन बसंती।।
गीत (सरसी सार छन्द)
(धुन- *अपना प्यारा गाँव)
छाया है मधुमास धरा पर,कोयल गाये गीत।
बगिया में भौंरो का डेरा, सबके मन में प्रीत।।
तरु पलाश की डाली देखो, लाल चटख इतराएं।
बेला जूँही गेंदा चम्पा, सबके जी ललचाए।।
धानी चूनर ओढ़े धरती, लगती बड़ी सजीली।
सरसों के मादक फूलों से, होकर रंग रंगीली।।
पवन सुगंधित मंद मंद बह, लेता मन को जीत।
आया है मधुमास धरा पर, कोयल गाये गीत।।१।।
आम बौर रसराज रंगीले,टप टप रस टपकाते ।
पुष्प लताएँ भ्रमर दलों को, अपनी ओर लुभाते ।।
गेहूं बाली झूम झूम कर, इठलाये इतराये।
बुलबुल चहक चहक डाली पर, राग बसंती गाये।।
मस्त मयूरा नाचे छमछम, देख देख जग रीत।
आया है मधुमास धरा पर,कोयल गाये गीत।।२।।
व्योम धरा को ताके झाँके,मन ही मन हर्षाये।
सूर्य रश्मियों का वर्षण कर, अपना प्रेम लुटाये।।
खग के जोड़े बैठ विटप पर, चूं चूं चोंच लड़ाये।
मनसिज व्याप रहा सब जग भर, प्रियतम नेह बढ़ाये।।
ढूंढ रहे हैं सबके नैना, अपने अपने मीत।
आया है मधुमास धरा पर,कोयल गाये गीत।।३।।
आया है मधुमास धरा पर ,कोयल गाये गीत।
बगिया में भौंरा का डेरा, सबके मन में प्रीत।।
शोभा मोहन श्रीवास्तव, अमलेश्वर
आया वसंत आया वसंत।
सारे जग में छाया वसंत।।
रस गगरी ले आया बसंत।
पतझर के दिन का हुआ अंत।
सज्जित आल्हादित दिग दिगंत।।
आया वसंत आया वसंत।
सारे जग में छाया वसंत।।
प्रकृति का कण कण प्राणवंत।।
आया वसंत आया वसंत।
सारे जग में छाया वसंत।।
खुशियाँ वसंत की है अनंत
आया वसंत आया वसंत।
सारे जग में छाया वसंत।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
संस्कृत राम स्तुति
शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...
-
गौरी गौरा गीत जागौ जागौ गौरी गौरा, जगमग जगमग रात हो। जागौ जागौ गौरी गौरा, रिगबिग करसा हाथ हो। जागौ जागौ गौरी गौरा, आज देवारी के रात हो। ...
-
सैनिक के गोसइन के बिरहा पिंउरी धोवाये गवन कराये चलदेस तभो हें हस लगथे, निकले होबे छोड़त मन। पिंउरी धोवाये गवन कराये, रूप झुलत उही नैन सजन...
-
बइठे तरिया पार भवानी २/कर सजवन सिंगार भवानी । १/ कर सजवन सिंगार भवानी । बइठे तरिया पार भवानी ।। मुण्ड माल गर डार भवानी। सजे तोर दरबार भवान...
No comments:
Post a Comment