Thursday, 14 September 2023

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

तुम प्रात: गोधुली के वंदन ,सुरभित केसर संदल के वन। 
छवि व्योम सदृश तन मृदु कंचन, मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम हो परिणय के पुष्प पत्र,तुम सुहागिनी के अंग वस्त्र। 
तुम निश्चत विजय अमोघअस्त्र,तुम शास्त्र सार विग्यान सत्र।। 
मैं नयनों से बिखरी कजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम कार्तिक सरिता दीपदान,तुम पार्थिव शंकर के समान। 
तुम सदा धर्मधूरी विधान, तुम संस्कृति के अमर प्राण।। 
मैं नववधु अलकों की गजरा,

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।


तुम विभावसु अर्चित षुभफल प्रांगण-प्रांगण षुभ तुलसीदल
हृदकोश अपरिमित परम अतल मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा
मैं तृशित मृगा ,,,,,,,,,,,,,,,,

तुम अर्थित आवाहित आगम अवग्राही राही पथ परम
तुम पंथअवेल अपारअगम मैं ष्वासों की पथ हॅंू अधरा
मैं तृशित मृगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

तुम हो अनुनादित मधुरनाद,  शांतिदायक हर्ताविशाद
विष्वंभर के पावन प्रसाद मैं नववधु अलकों की गजरा
मैं तृशित मृगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

तुम प्राची गोधुलि के वंदन सुरभित केसर संदल के वन। 
स्मरण योग्य प्रतिपल प्रतिक्षण मैं नैनों से बिखरी कजरा
मैं तृशित मृगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सुख उदित करें षुभ युगल चरण ना वृथा जन्म न तो वृथा मरण
मन व्योम वृहद तन मृदु कंचन मैं मरूथल मिथ्या मृग लहरा
मैं तृशित मृगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

वो तो है सुवासित षुभ सुगंध भाशित भाशा तन भाव बंध। 
प्रेमिल प्रलाप के महानंद मैं मैं तू कर बढती झगडा।। 
मैं तृशित मृगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,


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