Saturday, 9 September 2023

मेरी रेस्पिन परियोजना के साथ यात्रा पर संस्मरण।

मेरी रेस्पिन परियोजना के साथ यात्रा पर संस्मरण।


रेस्पिन परियोजना के साथ जुड़कर मैं स्वयं को भाग्यशाली समझती हूँ, क्योंकि यह छत्तीसगढ़ी बोली भाषा के समग्र उत्थान, एकरूपता, परिष्कार और विश्वव्यापी बनाने की एक अति महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षी परियोजना है। इस परियोजना के माध्यम से हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा विश्वपटल में प्रतिष्ठित होकर भावीपीढ़ी का मार्गदर्शन करेगी, और परप्रांतियों के लिए छत्तीसगढ़ी पढ़ना लिखना को सुगम बनायेगी, जिसका दूरगामी परिणाम हम सब छत्तीसगढ़िया आत्माओं के लिए अत्यंत सुखद होगा। अब मैं रेस्पिन परियोजना से जुड़े अपने अनुभव को आप सबके समक्ष साझा करना चाहती हूँ।

बात नवम्बर दो हजार बाइस की है तब मुझे जितेन्द्र वर्मा खैरझिटिया छंदगुरुजी के माध्यम से रेस्पिन परियोजना के विषय में जानकारी मिली, तब मैं इस भाषायी उत्थान के परियोजना में जुड़ने के लिए अपनी इच्छा जतायी थी। तीसरे ही दिन मुझे शोध सहायक डाॅ. हितेश तिवारी भाई का फोन आया। वैसे तो हम लोग एक दूसरे से कभी मिले नहीं थे, भाई हितेश जी एक प्रतिष्ठित भाषाविज्ञानी और छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम स्वर्णपदक प्राप्त विभूति हैं, और मैं भी भाषाविज्ञान की विद्यार्थी और शोधार्थी हूँ इस नाते हम दोनो का प्रिय विषय भाषाविज्ञान है अतः भाषा से संबंधित लम्बी चर्चा हुई, तब मैं पहली बार हुए बातचीत में ही डाॅ हितेश तिवारी भाई के ज्ञान, कौशल और छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए अगाध प्रेम को देखकर अभिभूत हो गयी। उनसे मुझे रेस्पिन परियोजना के विषय में विस्तार से जानकारी भी प्राप्त हुई, तत्पश्चात मुझे दस वाक्य छत्तीसगढ़ी में बनाने और कुछ दिशा-निर्देश भी दिया गया। मैने छत्तीसगढ़ी वाक्य बनाकर भेजा और मेरा रेस्पिन परियोजना में सेवा देने हेतु चयन भी हो गया। पहले ही दिन से ही मेरा उत्साह अत्यधिक था, क्योंकि मैं पिछले अट्ठारह वर्षों से छत्तीसगढ़ी शब्दों, मुहावरों, लोकोक्तियों, और शब्दरचना पर शोधकार्य निरंतर कर रही हूँ । ऎसे में रेस्पिन परियोजना के लिए कार्य करते हुए मुझे और भी ढेर सारी नयी नयी जानकारियाँ मिली, जिसके लिए मैं रेस्पिन परियोजना के सभी सम्मानित सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ। मैने इस परियोजना को सदैव अपना कार्य और अपनी भाषा का कार्य जानकर सदैव ही प्राथमिकता में रखा, और निष्ठापूर्वक कार्य करने का सतत् प्रयास किया। डाॅ हितेश तिवारी भैया का आवश्यकतानुसार पूरा सहयोग और निरंतर मार्गदर्शन मिला, जिससे यह कार्य मेरे लिए सुगम हो सका। कुछ समय कार्य करने के बाद मुझे लगा, कि यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण है, जो छत्तीसगढ़ी भाषा की दशा और दिशा सुनिश्चित करने वाला है, इसलिए अधिकाधिक योगदान के लिए मैने अपना एक समूह बनाया, जिसमें उमा सिन्हा, देविका सिन्हा और वंदना ठाकुर जैसे नवयुवतियों के साथ मिलकर पूरी तन्मयता से कार्य किया। मेरे समूह के सहयोगियों नें भी मेरा भरपूर साथ दिया, जिसके लिए उनको भी धन्यवाद देना चाहती हूँ।
छत्तीसगढ़ी वाक्य बनाने में हमें बहुत आंनद आया और प्रतिदिन कुछ न कुछ नया सीखने को मिला। मैं मूलतः साहित्य कार्य में संलग्न रहती हूँ लेकिन इस परियोजना से मेरा ऐसा जुड़ाव हुआ, और मैं वाक्य रचना कार्य में इतना अधिक डूब गयी, कि मेरा लेखन कार्य लगभग दम महीने पूरा बंद ही हो गया था।  मेरे पतिदेवता श्री मोहन श्रीवास्तव जी का भी मुझे भरपूर सहयोग मिला तभी मैं इस कार्य में तन मन से संलग्न रह सकी, लेकिन वे कभी कभी मुझे कहते थे, तुमने आजकल पढ़ना लिखना बिल्कुल बंद कर दिया है, तो मैं कहती यह कार्य मेरी दृष्टि में कविताकारी से और अधिक महत्वपूर्ण है।
रेस्पिन परियोजना के शोध सहयोगी भाई डाॅ हितेश तिवारी जी एक चुम्बकीय व्यक्तित्व के स्वामी हैं उन्होने मेरा सदैव साथ दिया और सहयोग किया, घंटो फोन पर बात करके मुझसे कार्य से संबंधित चर्चा करते थे और मेरा उत्साहवर्धन भी किया करते, उनकी बातें एकदम जादू भरी होती हैं, उनका वाककौशल और कार्यकौशल मेरे लिए बहुत प्रेरणादायी और ऊर्जादायक होता है। दो महीने पहले मेरी आँखों में कुछ समस्या के चलते मैं आगे कार्य नहीं कर पाऊँगी कहकर क्षमायाचना की, लेकिन मेरा मन कहता था, कि मैं जैसे ही अपने निजी समस्या से निर्वृत हो जाऊँगी, पुनः कार्य करूँगी। मेरे कुछ दिनो तक रेस्पिन परियोजना के कार्य से बाहर रहने पर भी डाॅ हितेश तिवारी भाई से बीचबीच में बातचीत होती रही, डाॅ हितेश तिवारी जी एक निष्ठावान, ऊर्जावान, और साहसी नवयुवक हैं उनके साथ मिलकर कार्य करने का अनुभव अत्यधिक सुखद है जिसे शब्दों में बाँधना असंभव है। मुझे सदैव रेस्पिन परियोजना के साथ मिलकर भाषायी कार्य करना बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि मैं हृदय से जुड़ी हूँ, अब मैं पुनः अपने सामर्थ्य अनुसार योगदान देने के लिए तत्पर हूँ।

रेस्पिन परियोजना छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए अमरता प्रदान करने वाला क्रांतिकारी पहल है। मैं आगे रेस्पिन परियोजना में हिन्दी के महत्वपूर्ण विषयों के आलेख आदि का छत्तीसगढ़ी अनुवाद करने की इच्छुक हूँ। यदि अवसर मिलता है तो अहोभाग्य समझूँगी।

धन्यवाद रेस्पिन परियोजना
धन्यवाद डाॅ हितेश तिवारी भैया
जय छत्तीसगढ़
जय छत्तीसगढ़ी
जय छत्तीसगढ़ महतारी
२०८०/भाद्रपद कृष्णपक्ष दशमी तिथि
अंग्रेजी कलेंडर ०८/०९/२०२३

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...