मोर बदन कुम्हलात गो छत्तीसगढ़ी बिहावगीत (पारंपरिक)
डंगडंग ले बेदी रचवाये मोर राजा ददा।
झेंझरहा मड़वा छवाये अमुवा के डरिया,
मोर बदन कुम्हलात गो।
कहिबे तौ बेटी मैं हर छत्तर तनाई दौं।
कहि तो सुरुज करौं लोप ओ।
काबर ददा तैं कहि तो छत्तर तनइबे।
कोरा में रख ले ना तोप गो।।
हरदी के रंग मोर अंग ला रंगत अउ,
मउर गड़त मोर माथ गो।
अँचरा देथस दाई छँइहा करन फेर।
अगन बरत तन मोर ओ।
रंगबिरंगी करसा साजे हे सुवासिन।
दियना जलाये भर तेल ओ।
माँग भरागे रगरग ले फुफू मोर सेंदुर सुधार ओ।
रचनाकार- शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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