ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका
ऽ ऽ । ऽ । । । ऽ । । ऽ । ऽ ऽ
लाला ललाल ललला, ललला ललाला
१
बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे ।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।
२
चुन्दरी उड़ात पुरवा, सुघरी लजागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजा गे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।
३
झाँकै झटाक झरखा,
नयना दसे हे।
जाके बिदेस बिसरा,
रसिया बसे हे।
ठट्ठा करे सखि सबो,
नइ वो हँसे हे।
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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