Friday, 5 May 2023

ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका

ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका

ऽ   ऽ । ऽ ।   । ।   ऽ ।   । ऽ ।   ऽ ऽ
लाला ललाल ललला, ललला ललाला

बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे ।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।

चुन्दरी उड़ात पुरवा, सुघरी लजागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजा गे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।

झाँकै झटाक झरखा,
नयना दसे हे।
जाके बिदेस बिसरा, 
रसिया बसे हे।
ठट्ठा करे सखि सबो,
नइ वो हँसे हे।

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