तिरिया ला तिरिन बरोबर सरेखे ( मनहरण घनाक्षरी)
1/
तिरिया ला तिरिन बरोबर सरेखैं नहीं,
तिरियाच बर सब नेम ला बनाय ओ ।
बपरी बना के फेर पुतरी असन नाच,
चारोजुग हावय परमान नचाय ओ ।
घर ला रपोटे अउ एब ला तोपे तहीं,
जब जेन मवका पाय तब लतियाय ओ ।
जब-जब देखहीं लहूट केे मनखे मन,
पग-पग कर तही जग ला रेंगाय ओ ।
2/
जब ले जनम धरे, तब ले करम करे,
बाॅंचे खोंचे खाय जांगर टूटत कमाय ओ ।
गरूआ असन दाई-ददा जेन खूंटाबाॅंधे,
देखबे सदा उहीच खूंटा में बंधाय ओ ।
सपना सरोय सब, तपना सहत जग,
आँखी के किनारी मेंर पीरा बटियाय ओ।
घर के न घाट के, पथरा कस बाट के,
लोटियागोबरी कर जिनगी पहाय ओ ।
3/
रतनारानी ला देख माया परे तुलसी ला,
राम में रमाय मन डहर देखाय ओ ।
फेर गुनहगार ल कहाॅं गुनजस लागे,
ढोर अडहा संग साॅंहूत जोरे हाय ओ ।
कहाॅं उतीस बूडतीस जात मानूख के,
बिधाता हा तिरिया ला धारनी बनाय रे ।
भल-अनभल संग होये कभू गिने नहीं,
करमईतीन हा करम करे जाय रे ।
4/
घपटे हावय अंधियारी जिनगी में फेर,
स्ंाझा डेरउठी बन दीवा बर जाय रे ।
दुख ला लुका अपन अंतस के कुंदरा में,
पानी डार-डार सब सुख ला जगाय रे ।
मार अउ गारी खात, अपन गति गनात,
सब ला संॅवास बस आॅंसू चूचवाय रे ।
उरकत सब आस, भसकत बिसवाॅंस,
मया के एकक ठन ठीहा खोधियाय रे ।
5/
नर-गर पहिरे जेवर बेली कस लागे,
अहमईती ला जेन ठेंगवा देखाय रे ।
रूप रंग गुन के बखान नीक लागे नहीं,
रखवारी बर जब भाई-बाप आय रे ।
मनखे ला रकसा बनत नहीं बेरा लागे,
झीमझाम में कहॅंू अकेल्ला सपडाय रे ।
तेखर ले बने अबियाय रहि जातेंव गोई,
मोर बर चारोमूडा बड बकवाय रे ।
6/
अनभल मोर संग जग हा करत फेर,
सबके मूॅंह ला देखेंव तोबरा ठेंसाय रे ।
मोर कोनो दोस नहीं तभो दोसदारी मोला,
घर-बन मिलके हेरवठा बनाय रे ।
चारोखूंट देख अनियाव जीव डरगे हे,
जीव भर छूटय नहीं साॅंसा आय जाय रे ।
मन के कलपना ला मोर कोनो सूने नहीं,
ना तो ये जगत मोर गोठ पतियाय रे ।
7/
मन तन के रहूॅं नहीं सुनव बोलीठोली,
पढ गुनके अब तो नहीं सही जाय रे ।
देखईया देखय हमरो गुनकोठी भरे,
देखे नहीं सके तेकर आॅंखी फूटी जाय रे ।
पढ लिख लव गोई, लाहो लेव हव गोई,
पढे गुन हर कभू बिरथा न जाय रे ।
एक दिन रही भूंईया भर तुंहरेच,
गुन देखके तुंहर मोला ममहाय रे ।
8/
थरहा असन बेटी जात बड फूरमानू,
पर घर रहि रोप फर फूल जाय रे ।
माॅंग भर एडी भर माहूर लगाई कर,
दूई कूल डीह डोगरिया हरियाय रे ।
बेटी कस जसही खोजे ले कहॅंू मिले नहीं
बीजा कस सर रूख बन लहराय रे ।
कहाॅं जाही रूख कहाॅ जाही फूलपान हर,
बीजहा सरंॅव नहीं कहॅंू अडियाय रे ।
9/
बुध ला अपन चूल्हा में डार रीत बर,
चरझनिया के बीच मूडी ढंकवाय रे ।
सातगोड रेग सतभंउरी गींजर फेर,
सातो किरिया पुरोये जिनगी बसाय रे ।
एक अनचिन्ह अनगंईहा अंगुरी धर,
गाॅंठजोरे सोहगीन बन चले जाय रे ।
बेटी कस कोन हे तजथे अउ भूंईया में,
अपन ला छांड पर ला जे अपनाय रे ।
10/
अनवट बिछिया पाजेब पहिरे चलय,
नीक लागय रेंगना हा घूंघरू बजाय रे ।
करधन पॅंहूची छाहित लछमी असन,
गर कारीपोत में सोहाग सिरजाय रे ।
ककनी बनूरिया कारीचूरी पटा पहिर,
नकफूल चन्दा व सूरूज चमकाय रे ।
बेटी कस करथे सिंगार एक भूंईया हा,
एकरे सेती दूनो के रासमेल खाय रे ।
11/
डोला चढ देखय लहूट के मयारू सब,
डोलहा थिराय न अॅंसूवन थिराय रे ।
रेंगें के धरम ससुरार कोती चल कहे,
मया के मरम भींजे भींजे रहि जाय रे ।
परछन कर ससुरारी नता फेरी देवें,
अंगरी धर के नवा डहर देखाय रे ।
बेटी कस कोन जयजोहार अउ करे गोई,
भाग के डेरउठी धूर मस्तक लगाय रे ।
12/
गमकत गजरा पहिर के सोहाग बर,
सुखरतिहा पिया के सेजरी सजाय रे ।
पग पग रेंगय गोसंईया के अनुकूल,
पानी कस मिल जिनगानी बन जाय रे ।
पिया के मूरतिया बसा हियमंदिरवा में,
पथरा ला टोर के मया ला पझराय रे ।
तोर कस पिरीत खोजे ले कहॅू मिले नहीं,
तोर मया पाके सब जग बईहाय रे ।
13/
तोर एक मुचकी मे मर जाथे बने-बने,
सून्ना जग ओकर जे तोला बिसराय रे ।
गढे हे गढईया मोहनकारी तोर चोला,
जोेग भूल जोगिया तोर बर सधाय रे ।
बीन तोर ककरो पहाय नहीं जिनगानी,
मया के सरूप सब तोरे में समाय रे ।
तोर कस मोहनी खोजे ले कहॅंू मिले नहीं,
सब अरझे तोर में बिन अरझाय रे ।
14/
तंही मयाखेत अउ तंहीच करथस खेती,
तोर बिन धनहा परिया पर जार रे ।
तोर बिन दीखे अदियावन मनखे हर,
सुख के सेवाद सब तोरे ले जनाय रे ।
मरथस तंय हर तभो नहीं मरय मया,
सुख के मडवना सबो तोरेच मडाय रे ।
खोजे न मिलय तोर कस बनिहार कहॅंू,
बिन बनी पाये घलो हाॅंसे मुस्काय रे ।
15/
भाखा में उराठी घोर जब जब रीस करे,
बडे-बडे राजपाठ गिस छरियाय रे ।
घूटकेस बीख गम कोनो ला होईस नहीं,
बडे बडे झगरा ला तंही घरियाय रे ।
मया के मतवना बल, पग पग चल चल,
बडे बडे टेडगा ला तहीं सोझियाय रे ।
तोर कस ताप के नवईया नहीं जग मे हे,
बडे बडे गरबी ला तंहीच नवाय रे ।
16/
तोर नीकता के सोर उडत हावय गोई,
अपन ला छाॅड सबो तोर सूती खाय रे ।
बाराबानी गोठ जग कतकोन गोठियावय,
एकबोलनीन तोला सबो पतियाय रे ।
लंदीफंदी चारोखूंट हावय चलन चाल,
सतबोली के तहींच चलन चलाय रे ।
सतबाठ धरके सहत दुख लाख तंय,
सत में जानस हावय संकर समाय रे ।
17/
हिरदे के उघरा कपाट झन करे कर,
चारोखूंट दानो अउ रक्सा ढिलाय रे ।
कतको ला लील डारे हावय एक रकरकी,
बाठ अउ दूबट्टा अलहन भरे ताय रे ।
मया में मयाच नहीं मिले बने जान लेबे,
मया आड जन आने साध सिपचाय रे ।
सोच के समझ के मडाबे तंय एकक पग,
मीतवा बलाय चाहे हितवा चलाय रे ।
18/
जीये बर परही जबर बनके रे तोला,
डरछोड लाज तज अईसे दिन आय रे ।
डर डर रहिबे जीयन नहीं देही गोई,
लाज के मरईया इहाॅं लाज ला गंवाय रे ।
मूडी गडियाये ले जबरवाली होही गडी,
मान ले सिखोना रेंग मूडी ला उठाय रे ।
अंगबोली ले अपन अईसे संदेस दे तंय,
अपन अस मूॅंह कर बईरी रहि जाय रे ।
20/
ठग-जग गिंजरत भसकोले चारोमूडा,
बने ताड लेबे झन आॅंखी भरमाय रे ।
सावचेत रहिबे उघार आॅंखी कान बने,
अलकरहा धरे हे मनखे ला बाय रे ।
बडका बडवना सून बा तमे तंय झन आबे,
सीरजम मनखे बडोना न बताय रे ।
मनखे चिन्हें में कहॅू चूक झन होय कभ,
आगू पाछू गुन लेबे बात फोरियाय रे ।
21/
गुनिया असन ताड लेथे तोर आॅंखी हर,
सुख-दुख सिलना उधेड तंही पाय रे ।
आरूगहाॅसी के रंग घोर के तंय मनखे के,
परिया जिनगी सतरंग लहराय रे ।
मरहा मरे परे परेटहा सुख के साध,
उम्हिया के जिनगी के लहर लगाय रे ।
भले झन माने गुन, फेर तंही तुन-तुन,
लाग-नता लाज-बात सब गंठियाय रे ।
22/
करू-कसा टोर्रठ नता के हितवारी कर,
आगू पाछू गुन के तंहीच गुर नाय रे ।
अजम सकय न कोनो रीत ला मया के तोर,
अदिरीस फेर तोर उदीम जनाय रे ।
बिनछोर सपना उडात मूडाछाड नर,
बाॅंहधर लान तंहीच भूंईया मडाय रे ।
ताप मे बेरा के हंें झंवाय तोर अंतस हा,
रोज बिहाने सुरूज ला जल चढाय रे ।
23/
गाॅंव के पता न तोर ठाॅंव के ठिकाना कहॅू,
मयापाती सबो तोर नाव के भेजाय रे ।
ब्यारा बारी भर्री खार, खेत न तो घर-द्वार,
सबो तोर फेर नइ नाव हे लिखाय रे ।
सब नता सब लाग, बंधावय तोरे पाग,
जग झिनभंगुरा बनत भर ताय रे ।
कोनो सुनत हे तोर मया घोरे कलकूत,
कोनो आसरा धरे अधर ओधियाय रे ।
24/
बिपतघरी तंय बीरता के बीजबोनी करे,
हार खाये मनखे ला तंहीच जियाय रे ।
जीत के सवांगे होती बना डारे डंडा तयं,
मनखे गरब तहीं धजा फहराय रे ।
तन के अपन तॅंय सरोय सब गीत गारी,
जग-भल करत उदीम ओरियाय रे ।
पर के करत किरवार मारे मन तंही,
कोनो पतियाय चाहे झन पतियाय रे ।
25/
हिरदे मरमठाॅंव छू के मया बरसईया ।
दुख में झंवाय ला मया में नहवाय रे ।
भावपिया ला तउल , होती अपन पउल,
जेन रंग पिया भाय उही रंग जाय रे ।
गोठ में अपनपन घोर के चिभोर डरे,
एकमई करे सब तंही अगुवाय रे ।
सरग के साध धरे आॅंखी ला अंताज डरे,
असक के ठेंगा बन तहीं पछूवाय रे ।
26/
जावत पिया ला परदेस देख बिरहीन,
बरसत आॅंसू जीव तोर दहकाय रे ।
मन के बियाकूल गुनान गंठरी में बाॅंध,
मन न बोधाय फेर घर चिकनाय रे ।
सेजरी में फूल के बोवाय काॅंटा गड-गड,
मति-गति चेत-बुध सब ला हराय रे ।
दुनिया के गनित गुनान कर घुना खात,
जीभिया पिया के नाव अहोरात गाय रे ।
27/
छेंक राखे आॅंखीरूॅंधना में मनबसिया ला,
मूहरन झूल-झूल आसरा बंधाय रे ।
तिरिया के मोल हा तिरिन में कहाॅं हे गडी,
सुख तो पिया के संग गाॅंठ हे जोराय रे ।
तन ला चरावै नता-गोतादल रॅंउदत ,
मन के हन्सा ला कोन चारा चरवाय रे ।
जगबंधना के ढंग, मनबोधना के संग,
छईहा बन रेंगें दुख हर न जनाय रे ।
28/
रेंगत-रेंगत कोन मूडा जात जिनगानी,
जाने नहीं खूटाॅं बाॅंधे दंउरी फंदाय रे ।
रेंगत हे दिनरात, पीरा दुख सिहरात,
कहॅंू अभरै न वह बाठ रेंगे हाय रे ।
ढेला कस घुर जाय, मनेमन चुर जाय,
अगम के गोठ कोन जाने जनवाय रे ।
आसजोरे लागनता, बउरे अपन सता,
संग धरे सब सुख सुभीता सधाय रे ।
29/
दाई-ददा फूलभार, पाल-पोंस के तियार,
करके पथरा छाती लगन धराय रे ।
एक-एक भांवर ले, जुग जोडीजांवर ले,
छूट जाय माय मइके बिधना लिखाय रे ।
फाटे बाप-दाई छाती, चलो कहय बराती,
मुरदा निकाले कस रोदना रोवय रे ।
मया व दुलार धरे, होती ला निसार करे,
पग डारै ससुरे जगत सिरजाय रे ।
30/
पीरा के उपर हाॅंस, हेरत बेरा के फाॅंस,
रासगुनमेली कर सुख सोरियाय रे ।
सास-ननदी के गारी, बनाये कान केे बारी,
आॅसू भर आॅंखीओरिया ले टपकाय रे ।
मईके के उटका ला, जहर के घुटका ला,
पीयत पीरा ला मुॅंह सीले रहि जाय रे ।
31/
मनूस बनाके ओडहर दे बरमदेव,
भेजिस भूईया नर ला बूता बताय रे ।
सीरजे पोंसे के संग, रंग जाबे जगरंग,
करबे जा मनखे जेन तोला सुहाय रे ।
सुन्ना बाठ रेंगे बर, तिरिया ला संग कर,
बात कही गगरी में सगरी समाय रे ।
संग-संग रेंगही ये, चाह तिहां लेगही ये,
बिलमे ले बिलमही बेरिया पहाय रे ।
32/
कहे लकछरहा बरमदेव के कर गोठ,
मनखे भूतल आगे बिगन भंजाये रे ।
बनबाठ रेंगत रेंगत कहे तिरिया ला,
फरफूल चिख के गुनतवा बताय रे ।
नीक-खीख जिनीस सेवाद लेत तिरियन,
नाव धर गुन जान मीठ ला खवाय रे ।
सबो नाव ओकरे धरे चलत हे जग में,
देखे इतिहास जेन नहीं पतियाय रे ।
33/
कमबुध पेटपोंसू डरेलहा डरईया,
बनमानूस रकरकी भर बुताय रे ।
तिरिया के मति हा सुभउनी के गति देख,
सृस्टिसीरजन जाने धुन पिकियाय रे ।
एकठन बिजहा एकक रूख होथे जान,
अपन सोधे ला जन-जन ला जनाय रे ।
परभल अंवतर, पर बर फूल फर,
परभल संभर उझर के देखाय रे ।
34/
मनुसान बढती के ओरी ला लहूट देख
सबमें तिया के करमईती हे समाय रे ।
देबी कस पूजत रहिस एकजुग हर,
अपने असन जीव ला जब बियाय रे ।
मनखे के जात गढ, बिमता के संग लड,
मनुखईती के तिय धजा फहराय रे ।
मनखे के मन में तिरिया मया पीका फोरे,
मनखे ला तिरिया हा जिये ला सिखाय रे ।
35/
कोड-खन भूंईया ला, गुन बाॅंट गुंईया ला,
गिंजरन्ता मनखे किसानी थिरवाय रे ।
बीजा के चिन्हार कर, माटी मरकी में भर,
चिन्हा दे आने आने, बीजहा बंचाय रे ।
गिंजरत मनखे ला बिलमें के थेभा दिये,
तिरिया धारनी तब ले बूता जिहाय रे ।
बीजा बोंय पानी करे, सिखोये किसानी करे,
अपन छंईहा बचाय रूॅंधना रूॅंधाय रे ।
36/
तिरिया गरन्थ गढे, ना धरमपंथ गढे,
मनूस के अहमईती के सब बाय रे ।
तिरिया हा गढतिस धरम गरन्थ एक्को,
धरम जम्मो देतिस एक में समाय रे ।
अलग-बिलग बाठ, गढथे मनूस पाठ,
तभे तो कोरी-कोरी धरम उफलाय रे ।
दसकोरी जीयत धरम हावय भूंईया में,
झींकातानी में सबके जीव भर जाय रे ।
37/
गढ के घर दुआर, चारोमूडा भांडी मार,
छेंके बर होती तोर रूधंना बंधाय रे ।
घर राख छेना थाप, सेवा कर भाई-बाप,
घरबूता में पेराय लईका खेलाय रे ।
घरघूंदिया में छंेक, पूरोवय अपन टेक,
तिया मन जाने बिन अपन चलाय रे ।
कतको सौ साल चारकोठ छेक राख कर,
बूधबल धार ला देईन भोथवाय रे ।
38/
कोन गढे हावय सीख, कभू छुआ कभू नीक,
तोर नीकता अगीनपरछो देवाय रे ।
नर संग चले बर, आधा बल आधा डर,
कतका तंय अपन अंतस ला पोठाय रे ।
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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