Wednesday, 5 April 2023

बिरहा ऋतु-छन्द वसन्ततिलका

बसंत बिरहा-छन्द वसन्ततिलका

ऽ   ऽ । ऽ ।   । ।   ऽ ।   । ऽ ।   ऽ ऽ
लाला ललाल ललला, ललला ललाला

बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।

सारी उड़ात पुरवा, 
लपटा झपागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजागे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।

जाके बिदेस बनिया, 
रसिया रसे हे।
ठोली बसंत बिरही, 
करके हँसे हे।
आँखी पिया डगर में,
कब के दसे हे।
जे हे भुलाये सुध वो,
हिरदे बसे हे।।

शोभामोहन श्रीवास्तव 

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