Thursday, 16 March 2023

मत्तगयंद savaiya

 

(मत्तगयंद छंद)

जे गुनिया जन तीर बसे अउमाँगय दान सबो हितकारी ।

प्रश्न करै सब उत्तर पावय,जीवन लाभ बनै अधिकारी

पाय उहीच बताय सबो झन,जान बने बड़ होय सुखारी ।

हे मनखे उपदेसु गुरूजन,सिल्प सुजान बनाय सवारी ।

जे बिध रात बिहान करे ,व्यवहार वही बिध हो मनुसाना ।

ओर धरे करि जेवन आवन,जावन के व्यवहार सुजाना।

देंह ल राख बने शुभ में सुख ,पावन हेत सदा सुख नाना ।

बेद बतात सबो झन के हित,जीव रखे बर जान खजाना ।

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

 

 

बूँद बचाय उदीम हजारी

1/

जान तहूँ जनवा अउ लोगन,  हे धरनी जल सोत करारी ।

बूँद बना न सकै बिगियानिक, ईश रचे जल जान अनारी ।।

फोकटिहा उरका न रितो अब,बात बिगाड़न खातिर भारी ।

देख अँटावत भूजल सोंचन, बूँद बचाय उदीम हजारी ।।

2/

सोच बिना जल के जग जीवन,प्रान बचावन कोन अधारी ।

पेड़ बिना फर फूल लता बन,औसध अन्न बिना सुखकारी ।।

ताल तलाब सरोवर के बिन,सिन्धु बिना सुख के उजियारी

देख अँटावत भूजल सोंचन, बूँद बचाय उदीम हजारी ।।

शब्दार्थ

करारी-सीमित, अनारी-मूर्ख,फोकटिहा-व्यर्थ

रितो-उड़ेलना या उलीचना गिराना बहाना, उरका-समाप्त,अँटावत-जलस्तर कम होना,

उदीम-उद्यम,

शोभामोहन श्रीवास्तव

१८/०३/२०२०

 

 

भावलहरा

 

देह रचे अजगूत धरा गुन,इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।

दे मन चोर मड़ाय मँझार म,अंतस संपत लूटन सारे ।।

बुद्धि धराय गुनान भँजाकर,अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।

रूप निरंजन जोत बरै शुभ,ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

१८/०३/२०२०

 

 

सवैया

 

सब बेद बखान करै उँकरे,सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।

सद्ग्रन्थ उही ल अधार बना,मनके करियापन धोवत हे ।

धर अंतस मा गुन गोठ धरे,गँठियाय उही चक होवत हे ।

अड़हा मनखे अनजान बने,अँधियार परे अउ रोवत हे ।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

११/०१/२०२०

 

देह बनै बड़ जोर लड़ैया (मत्तगयन्द छंद)

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आफत आवत देख भिंड़े बर,देह बनै बड़ जोर लड़ैया ।

हे मन हा सकवान बड़ा सुन,रीझ बुझे व बिरोध करैया ।

अंतस हे सबले जबरा अउ,दूर हँकारन रोग बलैया ।

प्रकृति दे सबला सक साधन,रूँध अजार मुसेट मरैया ।।

 

फेर कभू कुछु कारन मारन,ले बिगड़े सुमता तन तारी ।

बात बिगाड़ बियावय रोग ल,हो तन में झगरा बड़ भारी ।

ओरझथे तन शक्ति भगाय ल,देह रसे तब रोग अजारी ।

सैनिक हे रखवार हवै तन,माँझ भँजावव होव सुखारी ।।

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शोभामोहन श्रीवास्तव

०१/०४/२०२०

 

 

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आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी

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आकर कंकर आखर शंकर आखर मा अँगरा अउ आरी।

आखर मंतर आखर जन्तर आखर तन्तर आखर चारी ।

आगर मंगन आखर रंगन, आखर दंगन ले मुँह टारी ।

आखर पारस आखर सारस आखर मा रस हे बड़ भारी ।।

आखर उज्जर भाव बेलुज्जर आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी ।

आखर मारन आखर तारन आखर जीत व जीव हतासी ।

हे मनभावन ताप नवावन, आखर उच्छल मंगल हाँसी ।

आखर शारद आखर नारद ज्ञानबिसारद भारत काशी।।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

 

 

 

भीतर ही रहियो बन राजा (मत्तगयंद सवैया)

 

सून भईं गलियांँ सड़कें अरु,बंद सभी खिड़की दरवाजा।

माल दुकान कपाट खुलै नहि, मंदिर में नहि बाजत बाजा।।

दंड मिले जब बाहिर जावहु,छोट बड़े अटके कछु काजा।

रेख खचाय दियो सरकारहि,भीतर ही रहिये बन राजा।।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर

 

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चेतन रूप धरे बुल आथन

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रात पहाय थिराय बिछावन, नींद सुते सपना सपनाथन ।

ठाठ परे रहिथे खटिया कर, चेतन रूप धरे बुल आथन ।

देह नहीं हम चेतन आवन, छोड़ तभें तन घेर उड़ाथन ।

काबर फेर सहे दुख दालिद, देह रमे दुख भाग लिखाथन ।।

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शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

 

 

पीयन ना ककरो अब मानी

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जात गुवालिन के गुनिया हम ज्ञान गुनान ल का हम जानी ।

गोरस दूहन माखन हेरन गोबर थापन जानन ज्ञानी ।

कारज मा दिन रात खँटावन हे घर के सगरो जिनगानी ।

नाम अधार धरेन जिये बर पीयन ना ककरो अब मानी ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

ज्ञान घटा घपटे अँधियारे

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आय उधौ हर ज्ञानघमंड भरे जब फोकट ज्ञान बघारे ।

तत्व बतावन बोध करावन द्वैत अद्वैत विभेद उघारे ।

गोकुल गाँव म गोड़ मड़ावत ज्ञान घटा घपटे अँधियारे ।

ओमन ला समझावन आवत जे सुख लूटत ज्ञान बिसारे ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

 

मत्तगयंद सवैया"(कोरोना)

 

सून भईं गलियां सड़कें अरु,बंद सभी खिड़की दरवाजा।

माल दुकान कपाट खुलै नहि, मंदिर में नहि बाजत बाजा।।

दंड मिले जब बाहिर जावहु,छोट बड़े अटके कछु काजा।

रेख खचाय दियो सरकारहि,भीतर ही रहिये बन राजा।।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर

 

 

भावलहरा सवैया

1/

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चेतन रूप बसे प्रभु भीतर, नैन हमार निहार न पाये।

छाय चराचर में प्रभु तौ फिर, कोन करा हस बोल लुकाये ।।

खोजत बेर ढ़ले बर जावत, कोन बिधान बताय जनाये ।

हौं अड़ही कड़ही जग जानत, खोजत हौं बिन आप गँवायें ।।

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शोभामोहन

 

सवैया

2/

देह रचे अजगूत भरे गुन, इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।

हे मन चोर मड़ाय मँझार म, अंतस संपत लूटन सारे ।।

बुद्धि धराय गुनान भँजाकर, अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।

रूप निरंजन जोत बरै शुभ, ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

3/

रात सुते हम तान बिछावन, नींद परे सपना सपनाथन ।

ठाठ परे रहिथे खटिया कर, चेतन रूप धरे बुल आथन ।

देह नहीं हम चेतन आवन, छोड़ तभें तन घेर उड़ाथन ।

काबर फेर सहे दुख दालिद, देह रमे दुख भाग लिखाथन ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

१८/०३/२०२०

 

मत्तगयंद छंद (वेदमंत्र )

 

जे बिध रात बिहान करे,व्यवहार वही बिध हो मनुसाना ।

ओर धरे करि आवन जावन,जेवन के व्यवहार सुजाना।

देंह ल राख बने शुभ में सुख,पावन हेत सदा सुख नाना ।

बेद बतात सबो झन के हित, जीव रखे सुख ज्ञान खजाना ।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

 

 

मत्तगयंद छंद

जे गुनिया जन तीर बसे अउ माँगय ज्ञान सबो हितकारी ।

प्रश्न करै अउ उत्तर पावय, जीवन लाभ बनै अधिकारी

पाय उहीच बताय सबो झन, जान बने बड़ होय सुखारी ।

हे मनखे उपदेसु गुरूजन, सिल्प सुजान बनाव सवारी ।

 

९/सदग्रंथ गुन बखान सवैया

सब बेद बखान करै उँकरे,

सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।

सद्ग्रन्थ उहीच अधार बना,

मनके करियापन धोवत हे ।

धर अंतस मा गुन गोठ सबो,

गँठियात उही चक होवत हे ।

अड़हा मनखे अनजान बने,

अँधियार परे अउ रोवत हे ।

शोभामोहन

१०/प्रभु के विराटता सवैया

जतका जग ला परसे नयना,

भरतार लुकाय हवै सबमे ।

नइ जानन कारज हेत उँहो,

करतार समाय हवै सबमे ।

जग कारज गुन सुभाव सबो,

गुनधार अमाय हवै सबमे ।

सब रंग बसे सब रूप हँसे,

अउ सार जगाय हवै सबमे ।

शोभामोहन

 

...........................................................

मत्तगयन्द छंद

ब्रम्ह बिचार बतात बिल्होरत, बोलत ज्ञान जतात गुमानी ।

भौं नइ देवत हे सखियाँ सब, जानत जावन बाट सयानी ।।

प्रेम अनेम पराग झरावत, होवत उत्सव के दहकानी।

गोकुल गाँव जिये सुख लूटत, माँ जसुदा मइया मन बानी

 

शोभामोहन

 

 

 

मत्तगयन्द सवैया

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बूलत जावत हे जमुना कत, मोहन हाथ धरे सुकुमारी ।

हें अँखियावत हाँसत साँवर, लाज मरे बृषभानु दुलारी।।

लाज भरे बड़का डग मारत, बाट मया तलवार दुधारी।।

बाजत हे चुरिया अउ कंगन, वो धुन लागत हे सुख भारी।।

शोभामोहन



भाव लहरा (मत्तगयन्द सवैया)

 

भीतर सेज सुते रसिया अउ,पापिन झाल न पावँव पंखा ।

भूल पिया घर काज जिहावँव,आगर के उपजै मन शंका ।

मार डरै डर लाज जरै जग,राउर द्वार रहौं बन रंका ।

रेंगन चाहँव संग महूँ पर, हौं जस पाट नदी कर अंका ।

 

हा बिरथा जिनगी अब लागत, कोन मिटाहय माथ कलंका ।

बाट बनावँत जावँव पी कत,बोरझरी अरझौं अरझंका ।

लोक तिनो अउ चौदह भूवन, बाजत हे रसिया कर डंका ।

राघव ले बिछड़े सिय लागत, प्रान बियाकुल कंचन लंका ।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

दिनांक ०९/०५/२०२०

रायपुर छ.ग.



उद्धव सखी प्रसंग

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1/

आय उधौ हर ज्ञानघमंड भरे जब फोकट ज्ञान बघारे ।

तत्व बतावन बोध करावन द्वैत अद्वैत विभेद उघारे ।

गोकुल गाँव म गोड़ मड़ावत ज्ञान घटा घपटे अँधियारे ।

ओमन ला समझावन आवत जे सुख लूटत ज्ञान ल टारे ।।

2/

जात गुवालिन के गुनिया हम ज्ञान गुनान ल का हम जानी ।

गोरस दूहन माखन हेरन गोपर थापन जानन ज्ञानी ।

कारज मा घर के दिन रात खँटावन ये बिरथा जिनगानी ।

नाम अधार धरेन जिये बर पीयन ना ककरो अब मानी ।।

3/

का समझाय ल आय उधौ तँय कोन पठोय धिरोय बता तो ।

नून जरे म मिंजे अउ हाय इहाँ तँय हा झन ज्ञान जता तो ।

ये बिरहा अगनी म भुँजावत अंतस ला झन बेध सता तो ।

मात मया म बने मतवारिन खोजन मोहन नाथ पता तो ।

4/

मूड़ मुड़ाय तियार खड़े हन का छुरिया हम ला डरवाही।

हाँसत थूँकत जात-सगा मन गोड़ बढ़े नइ छेकन पाही ।

कोन घड़ी दिखही पिय मूँह

उम्मर के दियना भर तेल ल साँस भला कइसे उरकाही।

कोन हमार बसे सुख गाँव हवै नजराय  दुखहाही ।

नाम नहीं जिभिया हम लानन जीव ह काकर मूँह अमाही ।


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