Thursday, 16 March 2023

दुर्मिल सवैया

 

दुर्मिल सवैया

सब वेद बखानत शास्त्र सिधो, सुख के थरहा घन बोवत हे ।

सदग्रंथ उहीच अधार बना, मन के करियापन धोवत हे ।

शुभ अंतस मा गुन ज्ञान धरे, गँठियात उही चक होवत हे ।

अड़हा मनखे अनजान परे, अँधियार खड़े अउ रोवत हे ।

जतका जग ला परसे नयना, भरतार लुकाय हवै सब मा।

नइ कारन खोज सकै मनखे, करतार अमाय हवै सब मा।

जग कारज काम सुभाव लुका, गुनपार जनाय हवै सब मा ।

सब रंग रसे सब रूप हँसे, रिखिया मन पाय हवै सब मा ।

शोभामोहन

०८/११/२०२०

सुंदरलाल शर्मा जी चरित्र दुर्मिल सवैया

बड़ सुंदर हे बड़ चंचल हे मनभावन पावन फूल फुले ।

पुरगे सब आस दबे मन के बस रूप लला नयना म झुले ।

झबला कुरता कवनो पहिना सब रंग फबे सब रंग खुले ।

नइ लागय बाहिर मा मन हा चित चेत सदा घर कोत ढुले ।।

शोभामोहन

पं. सुंदरलाल शर्मा (दुर्मिल सवैया)

तुलसी जइसे बिरवा नइ हे नदिया नइ देव सरी जइसे ।

शिव के जइसे अउ देव नहीं जगराखन हे न हरी जइसे।

ममता नइ माँ जइसे ककरो सुघरी सुरलोक परी जइसे।

कवि मा तस सार छतीसगढ़ी, कवि सुंदर हे अगरी जइसे ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

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