दुर्मिल सवैया
सब वेद बखानत
शास्त्र सिधो, सुख के थरहा घन बोवत हे ।
सदग्रंथ उहीच
अधार बना, मन के करियापन धोवत हे ।
शुभ अंतस मा
गुन ज्ञान धरे, गँठियात उही चक होवत हे ।
अड़हा मनखे अनजान
परे, अँधियार खड़े अउ रोवत हे ।
जतका जग ला
परसे नयना, भरतार लुकाय हवै सब मा।
नइ कारन खोज
सकै मनखे, करतार अमाय हवै सब मा।
जग कारज काम
सुभाव लुका, गुनपार जनाय हवै सब मा ।
सब रंग रसे सब
रूप हँसे, रिखिया मन पाय हवै सब मा ।
शोभामोहन
०८/११/२०२०
सुंदरलाल
शर्मा जी चरित्र दुर्मिल सवैया
बड़ सुंदर हे
बड़ चंचल हे मनभावन पावन फूल फुले ।
पुरगे सब आस
दबे मन के बस रूप लला नयना म झुले ।
झबला कुरता
कवनो पहिना सब रंग फबे सब रंग खुले ।
नइ लागय बाहिर मा
मन हा चित चेत सदा घर कोत ढुले ।।
शोभामोहन
पं. सुंदरलाल
शर्मा (दुर्मिल सवैया)
तुलसी जइसे
बिरवा नइ हे नदिया नइ देव सरी जइसे ।
शिव के जइसे
अउ देव नहीं जगराखन हे न हरी जइसे।
ममता नइ माँ
जइसे ककरो सुघरी सुरलोक परी जइसे।
कवि मा तस सार
छतीसगढ़ी, कवि सुंदर हे अगरी जइसे ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
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