कतको सुख भोग
छके नइ हे*सुन्दरी सवैया*
प्रभु हा रचके
जग सुंदर ये कतका सुख साध रचाय रखे हे ।
सबला जकड़े जड़
काम क्षुधा सपना मन हा बउराय रखे हे ।
बगरे अउ लालच
के चुगनी मति के गति ला छरियाय रखे हे ।
सुख पोंस रखे चटिया मटिया
मनखे शुभ ध्येय भुलाय रखे हे ।
कतको सुख भोग
छके नइ हे मन ला तिसना दँउड़ाय रखे हे।
सब भोग बियावत
रोग तभो अँधरा बनके बिसराय रखे हे।
हदराय भरे
भरका भर ला खुँद भूलन भेद भुलाय रखे हे।
अपने भर दोष न
देख सकै अँगरी पर कोत उठाय रखे हे ।
शोभामोहन
२८/११/२०२१
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