Thursday, 16 March 2023

सरसी

 

कउड़ी के ग्यान (सरसी )


कोन डहर ले आये पुरव

का लाने संदेश। 

मन जियत हन रूर -घुर के ,

वो कइसन परदेश।।1।।

बेटा ऊँचा पढ़े पढ़ाई ,

अड़बड़ भइस सुजान ।

मनखे मनखे नइ लेखत धर ,

दू कउड़ी के ग्यान ।।2।।

सात समुन्दर पार गये हे ,

पइसा बर बइहाय।

भुले जनम देवइया मन ला,

कभू आय ना जाय ।।3।।

यंत्र तंत्र मा मंत्रमुग्ध हे ,

जीयत नता भुलाय ।

मोबाइल के जुग तबले ,

कभू नइ सोरियाय ।।4।।

सुरता धर सुतथन मुड़सरिया ,

रतिहा नींद न आय ।

पीरा पझरत गोठ बात ला ,

कोन हमर पतियाय ।।5।।

बिद्या संग अपन लइका ला ,

देवव शुभ संस्कार

चेतव गत ला हमर देख के ,

नइ तो उही तुहाँर ।।6।।

शोभामोहन



तरिया (सरसी )

हमर गाँव के तरिया पार ,

रंग रंग के फूल ।

पार म बइठे महादेव हे ,

सरी जगत के मूल ।।1।।

तरिया अगहन दियना ढिलके ,

भक्तिन तिया नहाय ।

कातिक जेन नहाय तेन हर ,

भोले नाथ रिझाय ।।2।।

अवघड़ दानी ला मनाय बर ,

चाँउर धोय चढ़ाय ।

जल रितोय अउ मूँड़ी ऊपर ,

फूड़हर फूल मड़ाय ।।3।।

शोभामोहन

13/07/19

 

सोन किनारी लाली लुगरा (सरसी)

सोन किनारी लाली लुगरा,

गर मोतिन के हार।

माथा टिकली गोड़ महाउर ,

बाँह पहुँची डार ।।1।।

ककनी पहिरे धारदार अउ,

चूरी ला खनकात।

करधन मोती मनी झूलनिया ,

कनिहा में लहरात।।2।।

हाथ मुँदरिया जम्मो अँगरी ,

मोती रतन जड़ाय ।

छमछम बाजे पैरी झाँझर,

जब जब गोड़ मड़ाय ।।3।।

कर सोला सिंगार चलत हे ,

राधा जमुना घाट

मोहन हुरहा खड़े अगड़िया ,

छेंकत हे बीच बाट ।।4।।

शोभामोहन

 


सिंगार सरसी छंद



सोन  किनारी  लाली  लुगरा, गर  मोतिन के हार।

माथा टिकली गोड़ महाउर , बाँह म पहुँची  डार ।

ककनी  पहिरे  धारदार अउ  , चूरी  ला खनकात।

करधन मोती मनी झूलनिया, कनिहा में लहरात।।

हाथ मुँदरिया जम्मो अँगरी,  मोती रतन जड़ाय ।

छमछम बाजै पैरीझाँझर, जब जब गोड़ मड़ाय ।।

कर सोला सिंगार चलत हे, राधा जमुना घाट ।

मोहन  हुरहा खड़े अगड़िया, छेंकत हे बीच बाट।।



शोभामोहन

 

लगन धरागे हे धरती के

 

लगन धरागे हे धरती के ,

गमकत हे दिन रात ।

सबो घरतिया करत अगोरा,

आवत हवय बरात ।।1।।

चढ़ा तेल हरदी लगनाही ,

मउर बँधा के माथ ।

नहडोरी करवात सुवासिन ,

रेंगत हे धर हाथ ।।।2।।

गीत भड़उनी गावत हावय,

बइठ कोइली डार ।

बाजा रूँजी दूल्हा लाने,

नाचत हें संँगवार ।।3।।

सात रंग के सजवन साजे ,

नभ ताने धनुबान ।

अपन रंग मा रंँगत जगत ला ,

सुघ्घर छत्तर तान ।।4।।

मगन मैन नाचत हे झिंगुर ,

रात रात भर जाग ।

नेंग जोग सब करत बिहतरा ,

मुचकत नत्ता लाग ।।5।।

पुरवइया हर मुखिया बनके ,

झुमरत पागा बाँध ।

रुख राई मन करत परघनी ,

समधी भेंटत खाँध ।।6।।

पढ़त मेचका टरर टरर कर ,

सरलग साखोचार ।

भाँवर गिंजरत परम देव हर,

बनत हवय भरतार ।।7।।

बिहिना ले अलसाये धरती ,

सकुचत जगे सुहाग ।

बगरे चूंदी कस नदिया हर ,

सागर जावत भाग ।।8।।

शोभामोहन

09/07/19

 

 

 

मिलिन्दपाद/सरसी छंद

भवभय पसरे सबो डहर हे, ये डर टारै कोन।

अँधरा के बस्ती बसवारी, नैन उघारै कोन ।।

तोर गंध ले गमकत मधुबन,बिरला जानै बात।

तँही मुँदास उघारस आँखी, करके मन दिनरात।।

शोभामोहन

१२/०७/२०२०

 

काया के आरुग सुगंध ला , आज पवन बगरात ।

आरुग होये आँखी सपना, पिय ले लगन धरात ।।1।।

मीट्ठी बोली कोइली जइसे , मया झोर बरसात ।

झलमल सतरँग मलमल चुनरी , रंगधनुष लजवात ।।2।।

 

 

सरसी छंद चन्द्र यान

चंदा  के  फोटू  खींचे   बर , भेजत  हावँय  यान ।
का  होवत  भुँइया  मा  तेकर कोनो  ला  नइ   ध्यान ।।1।।

सब  भुँइया   ला  बंजर   करके  , जाही   चंदा लोक ।
हे  विज्ञान  अबड़  बलवंता कोनो सकय न टोक ।।2।।

शोभामोहन
[25/07, 17:06]

 

पिंयर पान झर्राथे रुखवा

पिंयर  पान  झर्राथे  रुखवा , जब   बसंत परघाय ।
झरे   पान   के  हाल    पूछय नवा साध पिकियाय ।।1।।

रहय  कलेचुप  डारी  खाँधी  ,   जुन्ना   मया भुलाय ।
वहू  रउँद  के  जावत  हावय , कभू   जेन  सुस्ताय ।।2।।

बेरा   ले   बलवान  जगत   मा , कोनो   नहीं जनाय ।
सबो  नता  बेरा  मा   छछले  ,  बेरा   मा  अइलाय ।।3।। 

तेकर  सेती  आस  लगा  झन  ,  मया  नता अउ  लाग ।
देख  जगत  ला  चारो  कोती  ,  दुख  हे  सबके  भाग ।।4।।

शोभामोहन
[22/07/19 ]

 

रस बरसत रतिहा मा सुकुवा

रस बरसत  रतिहा  मा  सुकुवा  ,  भेजे कोन   जगाय ।
बिरही  के लटकत आँखी हर , कोन ल सहि नइ जाय ।।।1।।

कोन ह  हीरा  टाँक  डरे हे , बन  काँदी  मा    सोंच।
कोन  रात  कुन  डारी मन  मा , देत  फूल ला   खोंच ।।2।।

कोन  झूलना   बाँधे  तेमा रुख राई लहरात।
रँगके  कोन  बगइचा  रतिहा अत्तर   ले गमकात  ।।3।।

सज धज निकले सुरुज नरायन, कोन डहर हे जात ।                                                   

रुख अँजोर कोती बहकत हें , कहि तो कोन लुहात ।।4।।
          
चींव चींव करके चुरगुन मन , पढ़त  कोन से  श्लोक ।
दरस  परस  अउ  रंग  गंध  ले , गदगद हे भूलोक।।5।।

कमल   फूल   फूले   तरिया मा काकर   कहना   मान 
अउ  बिहान  ले भौंरा कहिथे , काय कली के कान।।6।।

शोभामोहन
[24/07, 15:24]

 

छंद सीखथन हमन सबो झन

छंद सीखथन  हमन  सबो  झन  , जुड़े  छंद परिवार ।
गुरुदीदी   गुरुदेव   सबो  झन देत  ग्यान  भंडार ।।1।।

सरस्वती चित्रा शशि शोभा , सीखे  छंद सधाय।।                      
रामकली अउ तुलेश्वरी हा सीखत  हें मन  लाय ।।2।।

शोभामोहन
19/07/19

 

तरिया (सरसी )

हमर गाँव के  तरिया   पार     ,  रंग  रंग  के फूल ।
पार  म बइठे   महादेव  हे    ,  सरी  जगत  के  मूल  ।।1।।

तरिया  अगहन  दियना   ढिलके , भक्तिन  तिया  नहाय । 
कातिक  जेन   नहाय   तेन  हर , भोले नाथ रिझाय ।।2।।

अवघड़  दानी  ला मनाय  बर चाँउर   धोय   चढ़ाय ।
जल  रितोय  अउ  मूँड़ी ऊपर  , फूड़हर फूल मड़ाय ।।3।।

शोभामोहन
13/07/19

 

चलव पढ़े बर स्कूल जाबो

मूँड़  कोर  के  ड्रेस  पहिन  के  , सब   होवव  तैयार ।
चलव पढ़े  बर  स्कूल  जाबो, होये  बर  हुसियार ।।1।।

खाये  पीये  फिकर  नहीं  हे  ,  चुरथे भात व दार ।
किसम -किसम तरकारी  मिलथे पापड़ संग अचार ।।2।।

शोभामोहन
[15/07, 10:25]

 

 

सोन किनारी लाली लुगरा (सरसी)

सोन  किनारी  लाली  लुगरा, गर  मोतिन के हार।
माथा  टिकली  गोड़  महाउर , बाँह    पहुँची  डार  ।।1।।

ककनी  पहिरे  धारदार अउ, चूरी  ला खनकात।
करधन  मोती  मनी  झूलनिया ,कनिहा  में  लहरात।।2।।

हाथ  मुँदरिया   जम्मो  अँगरी मोती  रतन   जड़ाय ।
छमछम  बाजे  पैरी  झाँझर, जब  जब  गोड़ मड़ाय ।।3।।

कर  सोला  सिंगार  चलत  हे , राधा  जमुना घाट 
मोहन   हुरहा  खड़े अगड़िया , छेंकत  हे  बीच बाट ।।4।।

शोभामोहन

लगन धरागे हे धरती के

लगन  धरागे हे  धरती  के , गमकत  हे  दिन  रात ।

सबो घरतिया  करत  अगोरा, आवत हवय बरात ।।1।।

चढ़ा तेल  हरदी  लगनाही मउर   बँधा के माथ ।
नहडोरी  करवात  सुवासिन  , रेंगत   हे धर हाथ ।।।2।।

गीत भड़उनी गावत  हावयबइठ कोइली डार ।
बाजा रूँजी दूल्हा लाने,   नाचत  हें संँगवार ।।3।।

सात   रंग  के  सजवन साजे , नभ ताने  धनुबान ।
अपन  रंग  मा  रंँगत  जगत ला सुघ्घर  छत्तर तान ।।4।।

मगन  मैन  नाचत  हे  झिंगुर , रात  रात  भर जाग ।
नेंग  जोग  सब  करत  बिहतरा मुचकत नत्ता लाग ।।5।।

पुरवइया  हर  मुखिया  बनके , झुमरत पागा बाँध ।
रुख राई मन करत परघनी , समधी भेंटत  खाँध ।।6।।

पढ़त  मेचका  टरर  टरर  कर सरलग साखोचार ।
भाँवर  गिंजरत  परम  देव  हर, बनत  हवय भरतार ।।7।।

बिहिना  ले  अलसाये  धरती , सकुचत  जगे सुहाग ।
बगरे चूंदी कस  नदिया  हर , सागर  जावत भाग  ।।8।।

शोभामोहन
09/07/19

जब घमाय भुँइया के तन मा (सरसी )
1/
जब  घमाय  भुइँया  के  तन  मा,पहिली परिस  फुहार।
सब  झँवाय  रुख  राई  मन  के, हरियर  होगे डार ।।
2/
पाल तनागे   हे  सतरंगीझिमिर   झिमिर बरसात ।
लउकत  हे  चारो   खुँट   बिजुरी, नदियां  मन उफनात ।।
3/
बादर  अँगरी धरे हवा  के येती  ओती  जाय ।
गरजत  घुमरत  बरसत  सबके , अंतस   ला जुड़वाय  ।।
4/
हो  किसान  मन   मगन  चलत हे  ,  नाँगर  धरके  खार ।
भाग  लिखे  बर लकलकाय  हे ,    बरसत  मूसर धार ।। 
5/
बन   काँदी जलबुँदिया चमकतहीरा असन जनात । 
आये हे चउमासा के दिनसबला गजब सुहात ।।

शोभामोहन
[09/07, 11:57]

गोड़ खोभ के रेंग जवानी मिलिन्दपाद छंद

गोड़ खोभ के रेंग जवानी, बड़ बिच्छल हे बाट।

‌अउ कन्हारी भुँइया मेरन, लगे जगत के हाट।।

गोड़ खोभ के रेंग जवानी, बड़ बिच्छल हे बाट।

फूल सही तन कठवाये मन,भेंटत जगत उचाट।

छल परपंच करइया पानी, पीये बारा घाट।

गोड़ खोभ के रेंग जवानी, बड़ बिच्छल हे बाट।

ब इहा पूरा काम क्रोध के, छलकत दूनो पाट।

काया भीतर हे बैतरनी, खून पीब अउ ठाट।

गोड़ खोभ के रेंग जवानी, बड़ बिच्छल हे बाट।

शोभामोहन ये बैतरनी, गहिरी पाबे काट।

नाम सहारा भजन अजारा, देही खाई पाट।।

गोड़ खोभ के रेंग जवानी, बड़ बिच्छल हे बाट।

शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/०५/२०२१

 

दू कउड़ी के ग्यान सरसी

कोन डहर ले आये पुरवा, का लाने संदेश।

हमन जियत हन रूर-घुर के, वो कइसन परदेश।।

बेटा ऊँचा पढ़े पढ़ाई, अड़बड़ भइस सुजान ।

मनखे ला मनखे नइ लेखत, धर दू कउड़ी ग्यान।।

सात समुन्दर पार गये हे, पइसा बर बइहाय।

भुले जनम देवइया मन ला, कभू आय ना जाय।।

यंत्र तंत्र मा मंत्रमुग्ध हे, जीयत नता भुलाय ।

मोबाइल के जुग हे तबले, कभू नइ सोरियाय।।

सुरता धर सुतथन मुड़सरिया, रतिहा नींद न आय ।

पीरा पझरत गोठ बात ले, कोन हमर पतियाय।।

बिद्या संग अपन लइका ला, देवव शुभ संस्कार

चेतव गति ला हमर देख के, नइ तो उही तुहाँर।।

शोभामोहन

 

विज्ञान सरसी छन्द

एक डहर ईश्वर के सत्ता, एक डहर विज्ञान ।

ए विज्ञान भले बलकर हे, फेर बड़े भगवान ।।

सबके सुख के पाग धरत हे, विज्ञानी गुनवान ।

हे विज्ञान अभिशाप कभू तव, इही कभू वरदान ।।

शोभामोहन

 

सार छंद

बीजा बोंबे सुख लहराही , माथ नवाही बाली ।

तब आँखी मा फरक जनाही, आज व बीते काली ।।

शोभामोहन

 

 

गुरुवर कर दौ भव ले पार (सरसी छंद)

 

जनम जनम के भाँवर देवत, जीव परे अँधियार।

ज्ञान अधारी अगम दुआरी, सरका दौ ओलवार।गुरुवर कर दौ भव ले पार

ज्ञान विज्ञान जला के जोती, कर दौ जीव उद्धार।।

गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु शंकर, गुरुवर जीव अधार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

सहसो मुँह बरने नइ जावै, महिमा अपरम्पार।।

चमड़ा आँखी जगती झाकै, गुरु झकँवा दौ पार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

जगत पटल के बाहिर घेरा, दृश्य दिखावनहार।।

तुम माटी के भाग गढ़इया, गुनधर विग्य कुम्हार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

करके चोट सुधारौ गल्ती, पाछू फेर पुचकार।

भक्ति मिलै नइ तुँहर बिना गुरु, मिलय नहीं सुख सार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

पारस पथरा सोन बनाथे, तुम गुनि करव गँवार।।

तुँहर कहे अब हलहूँ चलहूँ, जग जंजाल बिसार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

चोला माटी सोन असन हे, गुरुवर बचन बिचार।।

तुम दुरिहा हौ नाम तुँहर हे, लकठा अंतस द्वार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

जे गुरुवर के बाचा मानै, वो लग जावै पार।।

गुरु लंगोटी प्रभुवर छाँटे, टारे बर भू भार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार

जनम जनम के भाँवर देवत, जीव परे अँधियार।

शोभामोहन सरनागत प्रभु, डंडाशरन जोहार।।गुरुवर कर दौ भव ले पार,

 

 

कवयित्री शोभामोहन श्रीवास्तव

१५/०४/२०२१

 

मार्कण्डेय पुराण के काव्यानुवाद छत्तीसगढ़ी

मदालसा हर अपन लइका ला कइसन लोरी सुनावत हे इही सनातन धर्म के महाज्ञान आय।

लाला बन जा रे जगवार।

तोला जाये बर ओ पार।।

ओढ़ चदरिया मोह निंदरिया,

सुत झन पाँव पसार ।सुत झन पाँव पसार

भाग जगाये साध सधाये,

कलकुत करँव गोहार।लाला बन जा रे जगवार

काबर रोथस काबर सोथस,

आँखी अपन उघार।।सुत झन पाँव पसार

कतको मनगड़हन गुन अवगुन,

पंचभौतिक जग झार।लाला बन जा रे जगवार

शुद्ध तहीं अस बुद्ध तहीं अस,

छिनभंगुरा संसार ।सुत झन पाँव पसार

अपन लगत ये सपन जगत ये,

माया बिधुन बजार ।लाला बन जा रे जगवार

गुरतुर बोली धनहा खोली,

घुच रद्दा चतवार।

बिलग करंजन अलख निरंजन,

रहत परमप्रभु भार।लाला बन जा रे जगवार

नाम नगर ये ठीहा घर ये,

जम्मो झूठ लबार।सुत झन पाँव पसार

पाँच पदारथ सत्व पधारत,

नाच नचात अपार ।।लाला बन जा रे जगवार

भिन्ना चोला हिनहर भोला,

जीव जमो गोतियार।सुत झन पाँव पसार

जीव अबल हे भूतमहल हे,

भूत करत बढ़वार।लाला बन जा रे जगवार

जेंवन पानी आनी बानी,

पोठ करत करतार ।सुत झन पाँव पसार

आरुग अंतस तैं हर होये,

लाभ न हान बिचार।लाला बन जा रे जगवार

काया खिरही माटी गिरही,

टर जा मोह बिकार।सुत झन पाँव पसार

देह मिले हे फूल खिले हे,

भाग करम अनुसार।लाला बन जा रे जगवार

चोला बाँधे गोला छाँदें,

अउ तैं मुक्त बयार।सुत झन पाँव पसार

कोनो बनके बाप बिराजत,

कोनो बन महतार। लाला बन जा रे जगवार

कोनो तिरिया सुत अउ पिरिया,

कहूँ बने भरतार।सुत झन पाँव पसार

कोनो संगी अउ मनरंगी,

कहूँ बने लगवार।लाला बन जा रे जगवार

मोह मताथे थाह न पाथे,

जाथे धारे धार ।सुत झन पाँव पसार

जीवदल जंगल उच्छल मंगल,

अनगिन रूप बिकार।लाला बन जा रे जगवार

भोगजिनिस दुख रूप बिराजे,

समझ न पाय गँवार।सुत झन पाँव पसार

दुख ले सुख ले गुनधर मनखे,

चलथे चेत ल टार।।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार

भोग बियाये सुख दुख देथे,

जान सकै बुधियार।सुत झन पाँव पसार

अँधियारी नगरी नहके ला

जग दिखथे दुख खार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार

का तिरिया तन हाँसी फाँसी,

का ओकर सिंगार।सुत झन पाँव पसार

जेन सुघर आँखी कहवाथे,

माँस कलुषता नार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

थन अउ यौवन चाम चकोलन,

धोंधा माँस प्रकार।सुत झन पाँव पसार

तिरिया देंह निहारत मनखे,

काम अगन लै बार ।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

मन आगी मा देह दहथे,

गिजरत हाथ पसार ।सुत झन पाँव पसार

मोह मया अनुराग धँवाथे,

नरक नठे निस्तार ।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

भुँइया यान बिमान चलत हे,

तेमा देह सवार।सुत झन पाँव पसार

तइसे कायागढ़ मा आने,

बइठे पुरुख अधार ।।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

भुँइया अउ सवारी मा जब,

ममता नही पार।सुत झन पाँव पसार

भोगाथे तन मा दमदम ले,

मूरखता अँधियार। लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

धन्य धन्य हो धन्य धन्य हो,

बैरी अपन निबार ।सुत झन पाँव पसार

जुग जुग तैं पबरित भुँइया के,

बनके पालनहार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

ये भुँइया के अब्बड़ सुघ्घर,

करत करत किरवार।सुत झन पाँव पसार

भुँइया के सुख भोगन पाबे,

अटल धरम ला धार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

धरम बाट मा जावत जावत,

पावे अमरित सार।सुत झन पाँव पसार

परब बेर सबला परतोसे,

करबे उदिम उदार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

भाई बंद के साध पुरोबे,

परभल हृदय बिचार।सुत झन पाँव पसार

पर तिरिया बर मन झन दँउड़ै,

बुध अइसे चतवार।।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

चेत अपन प्रभु के गुनान मा,

निशदिन रखबे डार।सुत झन पाँव पसार

रीस रोस अउ काम अगन के,

छै बैरी ला मार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

माया टारे ज्ञान पधारे,

डउल लगा करतार।सुत झन पाँव पसार

जगती छिनभंगुर ला चिन्ह के,

करबे सब ब्यवहार। लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

धन पाये बर उदिम लगा बन,

राउर जीतनहार।सुत झन पाँव पसार

नाम कमाये जस बगराये,

करबे दान उदार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

चुगली चारी ले डर भारी,

टरबे झूठ लबार।सुत झन पाँव पसार

बिपत समुन्दर ले जन तारे,

जीव करे उद्धार।।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार।

जग निर्मल जस गाही तोरो,

जब बनबे करतार।सुत झन पाँव पसार

शोभामोहन लोरी गावत,

आँखी बँधना टार।लाला बन जा रे जगवार

तोला जाये बर ओ पार ।

शोभामोहन

१०/११/२०२०

 

मार्कण्डेय पुराण के काव्यानुवाद छत्तीसगढ़ी

(मदालसा हर अपन लइका ला कइसन लोरी सुनावय तेन ला पढ़व अउ जानव सनातन धर्म हर कतका महान हे । )

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

ओढ़ चदरिया मोह निंदरिया,सुत झन पाँव पसार ।

भाग जगाये साध सधाये,कलकुत करँव गोहार।।

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

काबर रोथस काबर सोथस, आँखी अपन उघार।।

कतको मनगड़हन गुन अवगुन,पंचभौतिक जग झार।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

शुद्ध तहीं अस बुद्ध तहीं अस, छिनभंगुरा संसार ।

अपन लगत ये सपन जगत ये, माया बिधुन बजार ।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

गुरतुर बोली धनहा खोली,घुचत बाट चतवार।

बिलग करंजन अलख निरंजन, रहत परमप्रभु भार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

नाम नगर ये ठीहा घर ये, जम्मो झूठ लबार।

पाँच पदारथ सत्व पधारत, नाच नचात अपार ।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

भिन्ना चोला हिनहर भोला, जीव जमो गोतियार।।

जीव अबल अउ भूतमहल अउ, भूत करत बढ़वार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

जेंवन पानी आनी बानी, पोठ करै करतार ।

आरुग अंतस तैं हर होये,लाभ न हान बिचार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

काया खिरही माटी गिरही,टर जा मोह बिकार।

देह मिले हे फूल खिले हे,भाग करम अनुसार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

चोला बाँधे गोला छाँदें,अउ तैं मुक्त बयार।

कोनो बनके बाप बिराजत,कोनो बन महतार।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

कोनो तिरिया सुत अउ पिरिया,कहूँ बने भरतार।

कोनो संगी अउ मनरंगी,कहूँ बने लगवार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

मोह मताथे थाह न पाथे,जाथे धारे धार ।

जीवदल जंगल उच्छल मंगल,अनगिन रूप बिकार।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार.............

भोग सबो दुख रूप बिराजे,समझ न पाय गँवार।

दुख ले सुख ले गुनधर मनखे,चलथे चेत ल टार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार...........

भोग बियाये सुख दुख देथे,जान सकै बुधियार।

अँधियारी नगरी नहके लाजग दिखथे दुख खार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

का तिरिया तन हाँसी फाँसी,का ओकर सिंगार।

जेन सुघर आँखी कहवाथे,माँस कलुषता नार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

थन अउ यौवन चाम चकोलन,धोंधा माँस प्रकार।

तिरिया देंह निहारत मनखे,काम अगन मन बार ।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

मन आगी मा देह दहथे,गिजरत हाथ पसार ।

मया मता अनुराग धँवाथे,नठा नरक निस्तार ।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

भुँइया यान बिमान चलत हे,तेमा देह सवार।

तइसे कायागढ़ मा आने,बइठे पुरुख अधार ।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

भुँइया अउ सवारी मा जब,ममता नही पार।

भोगाथे तन मा दमदम ले,मूरखता अँधियार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

धन्य धन्य हो धन्य धन्य हो,बैरी अपन निबार ।

जुग जुग तैं पबरित भुँइया के,बनके पालनहार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

ये भुँइया के अब्बड़ सुघ्घर,करत करत किरवार।

भुँइया के सुख भोगन पाबे,अटल धरम ला धार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

धरम बाट मा जावत जावत,पावे अमरित सार।

परब बेर सबला परतोसे,करबे उदिम उदार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

भाई बंद के साध पुरोबे,परभल हृदय बिचार।

पर तिरिया बर मन झन दँउड़ै,बुध अइसे चतवार।।

लाला बन जा रे जगवार..........

तोला जाये बर ओ पार............

चेत अपन प्रभु के गुनान मा,निशदिन रखबे डार।

रीस रोस अउ काम अगन के,छै बैरी ला मार।।

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

माया टारे ज्ञान पधारे,डउल लगा करतार।

जगती छिनभंगुर ला चिन्ह के,करबे सब ब्यवहार।।

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

धन पाये बर उदिम लगा बन,राउर जीतनहार।

नाम कमाये जस बगराये,करबे दान उदार।।

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

चुगली चारी ले डर भारी,टरबे झूठ लबार।

बिपत समुन्दर ले जन तारे,जीव करे उद्धार।।

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

जग निर्मल जस गाही तोरो,जब बनबे करतार।

शोभामोहन लोरी गावत,आँखी बँधना टार।।

लाला बन जा रे जगवार.............

तोला जाये बर ओ पार...............

शोभामोहन

१०/११/२०२०

पाटन जिला दुर्ग छ.ग.

३/पिया रंगरसिया रंग लहराँव.....

(राग पहाड़ी)

पिया रंगरसिया रंग लहराँव

सबके बेड़ा पार करइया,

भव फदके सोरियाँव। पिया रंगरसिया..........

जेन बिमुख हे तोर डहर ले,

ओकर खुँदव न छाँव। पिया रंगरसिया........

पुन के जोरन-भारन नइ हे,

तबले आस लगाँव । पिया रंगरसिया.........

कीचक अजामिल पापी तारे,

ते सेती पतियाँव । पिया रंगरसिया........

जग के गारी कान के बारी,

समझँव मूड़ नवाँव । पिया रंगरसिया.......

आज मरौं ते काल मरौं मैं,

आन बाट नइ जाँव ।। पिया रंगरसिया.......

रहे बसे जग मन नइ लागै,

बनके बिंहग उँडाव।। पिया रंगरसिया......

चोला खूँटा हवय बँधाये,

मन भाड़ी भसकाँव ।। पिया रंगरसिया.......

उटकट लागत बोली भाखा,

ए स्वारथ के गाँव ।। पिया रंगरसिया.........

शोभामोहन अधर जगत मा,

रहत हथेंरी छाँव ।। पिया रंगरसिया..........

शोभामोहन

१२/०१/२०२०

मशीनीकरण

अब मशीन के आगे, हावय राज।

कमिया मन के मूँड़ी, गिरगे गाज।।

नाँगर हवय टँगाये, जुन्ना कोठ।

ट्रेक्टर रखत किसनहा, मन हर पोठ।।

बाँही में बल होवय, कतको जान।

 रोजगार बिन बिरथा,अतका मान

सबो बुता ला करथे, आज मशीन।

ठलहा कर दिस मनखे, बूता छीन।।

बोंवत लूवत मींजत, पल में खार ।

कोनो नइ खोजत हे , अब बनिहार।।

रोजगार बर मनखे, हे लुलुवात ।

ट्रेक्टर वाला फुदरत, मजा उड़ात।।

शोभामोहन

[06/07, 11:03]

 

 

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