Wednesday, 15 March 2023

गीतिका chhand

 

गीतिका) 
2122      2122   ,    2122      212
1/
आय हे संसार मा वो, एक दिन जाही घलो
एक भाँवर घूम फिरके,वो बहुर आही घलो ।
जीव दँउरी मा फँदाये, बात गुनिया जानथे
ज्ञान के उजियार भरके,जीव ला सुख सानथे।।

जानथस पतझर लुकाये, हे बसंती बाग के
सोझिया ले चेत बैरी,रहत बेरा जाग के।
आसरा के ढ़ेखरा में, साध ला छछला झने ।
खोजबे सुख ला जगत मा,लागही गिनहा बने ।।

जानथस पतझर लुकाये हे बसंती बाग के (गीतिका)परिस्कृत

1/

आय हे संसार मा वो, एक दिन जाही घलो

एक भाँवर घूम फिरके,वो बहुर आही घलो ।

जीव दँउरी मा फँदाये, बात गुनिया जानथे

ज्ञान के उजियार भरके,जीव ला सुख सानथे।।

2/

जानथस पतझर लुकाये, हे बसंती बाग के

सोझिया ले चेत बैरी,रहत बेरा जाग के।

आसरा के ढ़ेखरा में, साध ला छछला झने ।

खोजबे सुख ला जगत मा,लागही गिनहा बने ।।

शोभामोहन

24/10/19

 

 

 

गीतिका छंद

2122      2122,    2122      212

काल मूँड़ी नाचहीं

पूरही बेरा तहाँ ले, लेगही धर बाँध के
छेंक नइ पाही कहूँ हा, जीव माया धाँध के ।
ठाढ़ आँखी देख नत्ता,श्लोक गीता बाँचहीं
दूतवा यम जीव लेही, काल मूँड़ी नाचही।।

लान गंगाजल पियाहीं, बहुरिया बेटा बड़े
पान तुलसी दान गउवा, दे सबो होहीं खड़े।
प्रान हावय ते नहीं ये,छू टमड़ के जाँचहीं
दूतवा यम जीव लेही, काल मूँडी नाचही।।

जीव छूटत साठ रोहीं, सब मया ममता बढ़ा
फेर करके टाँठ मन ला, बोहहीं चैली चढ़ा।
धान लाई फूल धरके,अब चलो कहि टाँचहीं
दूतवा यम जीव लेही, काल मूँड़ी नाचही।।

मात के माया महल मा,राम ला बिसरा डरे,
ये जगत मा सार वो ही,नाम ओकर सत हरे।।
फोर मरकी घूम भाँवर, खन गहीरी खाँचहीं
दूतवा यम जीव लेही, काल मूँड़ी नाचही ।।

 

कंकरी झन मारहू(गीतिका)

आज पुन जागे हवय अउ,साध मन चुप होत हे।

सब अड़ानीपन भुलागे,देह अब न बिटोत हे।

देख के निच्चट कलेचुप, रंग भंग न भारहू ।

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

हाय उठही तेन लहरा,पार खोजे भागही।

तन धँवाही प्रान ला तब, चेत ओती जागही।

जब कसे बर बेर सोंटत,सोग झन कर डारहू।

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

चेत के डबरा म गंगा,जल पझारे साध हे।

ये कुलुप अँधियार अंतस,जोत बारे साध हे।।

ठान ठाने हौं जबर मैं, हाँक तुम झन पारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

शोभामोहन

 

हौं गजब हैरान रे (गीतिका)

भूलके मैं एक रतिहा,कोन अँव का नाम हे

जान डारे हँव जगत मा,मोर कतका दाम हे।

देख उघरा सच ल संगी ,काँप गे हे प्रान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

घाट मा शमशान दिखथे,एक राजा कंगला

हे परे ओकर कमाये ,कार मोटर बंगला ।

जीव भर जावत असंगी,देख लागिस बान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

सोन चाँदी ला सजाये,जे रतन मोती जड़े

देख ले हँव मोल ओकर, घाट मा होके खड़े ।

देख नत्ता मन उखलगे,ये रमइया प्रान गरे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

राख के कुड़ही बनत हें,बीर जगजीता घलो

पाय कोनो सुख नहीं हे ,मोह अउ माया मलो ।

हे लबारी गाँव ये अउ,जग लबारी जान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

जे हवा के संग बोलै, आज अउँधे हे परे

गौंटिया कोनो बड़े हे,अउ कहूँ दाऊ हरे।

जेन कोनो ला गुनय नइ, भूलगे अँटियान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

जेन फूले नइ समावै,रूप के अभिमान मा

डरडरावन वो दिखत हे, जब परे शमशान मा।

जीव जावत साठ जम्मो ,सब निकलगे शान रे

देखके जग के तमाशा, हों गजब हैरान रे।।

शोभामोहन

 

बाट घर के भूल के (गीतिका )

जीव छूटे कस जनावै,अउ न जीयत कस लगे,

बोलना बेकार हे अब, कोन हे कतका ठगे।

मन मड़ावत दुख बढ़ावत,गाँव दूसर बूल के

जीव अब्बड़ हे सहत दुख,बाट घर के भूलके।।

आसरा के ढेंखरा मा, मोह लपटे नार हे

बिन सुते सपना बिटोवत, जीव खावत हार हे।

मन बिलमगे जेन मेरन,साध हाँसिस फूलके

जीव अब्बड़ हे सहत दुख,बाट घर के भूलके।।

कोन ला काकर गरज हे, ये बताथे बेर हा

भाव कोंवर जब झवाँथे,हो जथे मन ढेरहा ।

मन रमा झन साध सिपचा, फेर लहुटे ढूल के

जीव अब्बड़ हे सहत दुख,बाट घर के भूलके।।

कोस नापे छोड़ दे मन,चेत जा अब चेत जा

सब डहर ले मूँद आँखी, नाम हरि के लेत जा।

छोड़ दे जंजाल जग के, नाम झूला झूलके ।

जीव अतका हे सहत दुख,बाट घर के भूलके।।

शोभामोहन

 

 

लेग दे ओ पार माझी(गीतिका)

छूटगे हे रंगरेली,रंग छूटत देख के ।

मन चलत हे अब जगत मा, देह माटी लेख के

लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे।

दूरिहा बड़ दूरिहा चल,नइ जिहाँ संसार रे।।

रीस दुख-सुख साध लहरा,के भयंकर हे नदी।

पार करहूँ अपन बल तौ, लागही कतको सदी ।

तोर ले हावय भरोसा,नाहके भव खार रे।

लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे।।

प्रान के बाती सजा के,एक दियना बारहूँ ।

संग तँय देबे नहीं तव,मूँड़ धुनहूँ हारहूँ ।।

हे बिकट लहरा उठत अउ,हँव परे मझधार रे ।

लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे ।

शोभामोहन

लेग दे ओ पार माझी गीतिका

छूटगे हे रंगरेली,रंग छूटत देख के ।

मन चलत हे अब जगत मा, देह माटी लेख के

लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे।

दूरिहा बड़ दूरिहा चल,नइ जिहाँ संसार रे।।

रीस दुख-सुख साध लहरा,के भयंकर हे नदी।

रेंगहूँ मैं गोड़ मा तब, बीतही कतको सदी ।

तोर ले हावय भरोसा,नाहके भव खार रे।

लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे।।

प्रान के बाती सजा के,एक दियना बारहूँ ।

संग तँय देबे तभे तो,सबो अलहन टारहूँ ।।

हे बिकट लहरा उठत अउ,हँव परे मझधार रे ।

लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे ।

शोभामोहन

 

भूलगे दाई ददा हरिगीतिका

 

झुल झूलगे,फर फूलगे,अउ भूलगे, दाई ददा

 

नइ हे दया,नइ हे मया,गे हे बया,अब बाढ़ के

झटकारथे, हटकारथे,फटकारथे, गुन काढ़के ।

दुख ला हरे,जोखा धरे,बड़ मर मरे,दँउरी फँदा

झुल झूलगे,फर फूलगे,अउ भूलगे, दाई ददा ।।

दुख मा जरे,अउ कंदरे,आँसू झरे, दिनरात के।

ननपन धरे,सुरता करे,बेरा टरे, सब बात के।

मन बोरना,सुख जोरना,गुन घोरना,सुख दे सदा

झुल झूलगे,फर फूलगे,अउ भूलगे, दाई ददा ।।

भुँइया नहीं,छँइया नहीं,गइया नहीं,सब फूँकगे

जग ले लड़े,जेला बड़े,करके खड़े,का चूकगे।।

घोड़ा बने,सेउक बने,का नइ बने,बोझा लदा।।

झुल झूलगे, फर फूलगे,अउ भूलगे, दाई ददा।।

शोभामोहन

 

देख के जग के तमाशा हँव गजब हैरान रे गीतिका

2122 2122 2122 212

1/

भूलके मैं एक रतिहा,कोन अँव का नाम हे

जान डारे हँव जगत मा,मोर कतका दाम हे।

देख उघरा सच ल संगी ,काँप गे हे प्रान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

2/

घाट मा शमशान दिखथे,एक राजा कंगला

हे परे ओकर कमाये ,कार मोटर बंगला ।

जीव भर जावत असंगी,देख लागिस बान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

3/

सोन चाँदी ला सजाये,जे रतन मोती जड़े

देख ले हँव मोल ओकर, घाट मा होके खड़े ।

देख नत्ता लाग बानी, उटकुटागे प्रान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे ।।

4/

राख के कुड़ही बनत हें,बीर जगजीता घलो

पाय कोनो सुख नहीं हे ,मोह अउ माया मलो ।

हे लबारी गाँव ये अउ,जग लबारी जान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

5/

जे हवा के संग बोलै, आज अउँधे हे परे

गौंटिया कोनो बड़े हे,अउ कहूँ दाऊ हरे।

जेन कोनो ला गुनय नइ, भूलगे अँटियान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

6/

जेन फूले नइ समावै,रूप के अभिमान मा

डरडरावन वो दिखत हे, जब परे शमशान मा।

जीव जावत साठ जम्मो ,सब निकलगे शान रे

देखके जग के तमाशा, हों गजब हैरान रे।।

शोभामोहन

 

देख के जग के तमाशा हँव गजब हैरान रे

1/

भूलके मैं एक रतिहा,कोन अँव का नाम हे

जान डारे हँव जगत मा,मोर कतका दाम हे।

देख उघरा सच ल संगी ,काँप गे हे प्रान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

2/

घाट मा शमशान दिखथे,एक राजा कंगला

हे परे ओकर कमाये ,कार मोटर बंगला ।

जीव भर जावत असंगी,देख लागिस बान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

3/

सोन चाँदी ला सजाये,जे रतन मोती जड़े

देख ले हँव मोल ओकर, घाट मा होके खड़े ।

देख नत्ता मन उखलगे,ये रमइया प्रान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

4/

राख के कुड़ही बनत हें,बीर जगजीता घलो

पाय कोनो सुख नहीं हे ,मोह अउ माया मलो ।

हे लबारी गाँव ये अउ,जग लबारी जान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

5/

जे हवा के संग बोलै, आज अउँधे हे परे

गौंटिया कोनो बड़े हे,अउ कहूँ दाऊ हरे।

जेन कोनो ला गुनय नइ, भूलगे अँटियान रे

देखके जग के तमाशा, हौं गजब हैरान रे।।

6/

जेन फूले नइ समावै,रूप के अभिमान मा

डरडरावन वो दिखत हे, जब परे शमशान मा।

जीव जावत साठ देखव, निकलगे सब शान रे

देखके जग के तमाशा, हों गजब हैरान रे।।

शोभामोहन

 

 

जानथस पतझर लुकाये हे बसंती बाग में

आय हे संसार मा वो, एक दिन जाही घलो

एक भाँवर घूम फिरके,बहुर के आही घलो ।

जीव दँउरी मा फँदाये, बात गुनिया जानथे

ज्ञान के उजियार भरके,जीव ला सुख सानथे।।

जानथस पतझर लुकाये, हे बसंती बाग के

जीव रखके शिव जीले,रहत बेरा जाग के।

आसरा के ढ़ेखरा में, साध ला छछला नहीं ।

खोजबे सुख ला जगत मा,हो जबे तब तो बही

शोभामोहन

 

घाट मा मणिकर्णिका

राख के कुड़ही म बदलत,घाट मा

मणिकर्णिका।

उठत लपटा माँस टघलत,घाट मा

मणिकर्णिका।

एक रतिहा भर पहा ले, घाट मा

मणिकर्णिका।

अपन होती ला थहाले, घाट मा

मणिकर्णिका।

रावरा कंगाल दिखथे, घाट मा

मणिकर्णिका।।

एक सबके हाल दिखथे,घाट मा

मणिकर्णिका

सोझियाही चेत पगला, घाट मा

मणिकर्णिका ।

जाय बर हे सब जगत ला , घाट मा

मणिकर्णिका।।

(गीतिका छंद)

"रंग भंग न डारहू"

आज पुन जागे हवय अउ,साध मन चुप होत हे

सब अड़ानीपन भुलागे,देह अब बिटोत हे।

देख हे निच्चट कलेचुप, रंग भंग न डारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

हाय उठही तेन लहरा,पार खोजे भागही

तन धँवाही प्रान ला तब, चेत ओती जागही।

हे हथौंड़ा परत कहिके,सोग तो न बघारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

चेत के डबरा म गंगा,जल पझारे साध हे

ये कुलुप अँधियार अंतस,दीप बारे साध हे।

ठान ठाने हँव जबर मँय, हाँक तुम झन पारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

(गीतिका छंद)

"रंग भंग न डारहू"

आज पुन जागे हवय अउ,साध मन चुप होत हे

सब अड़ानीपन भुलागे,देह अब बिटोत हे।

देख हे निच्चट कलेचुप, रंग भंग न डारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

हाय उठही तेन लहरा,पार खोजे भागही

तन धँवाही प्रान ला तब, चेत ओती जागही।

हे हथौंड़ा परत कहिके,सोग तो न बघारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

चेत के डबरा म गंगा,जल पझारे साध हे

ये कुलुप अँधियार अंतस,दीप बारे साध हे।

ठान ठाने हँव जबर मँय, हाँक तुम झन पारहू

चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

 

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