गुनान मनहरण घनाक्षरी
दशरथ कस नहीं कभू प्रभु प्रीत करे,
कौशल्या असन नहीं संजम जगाय हो।।
कैकई कस कलंक लिये ना अपन मूड़,
सीता कस नहीं पति धरम निभाय हो।
बंधवा भरत कस राजा नहीं बन सके
लखन असन नहीं सेवा मन लाय हो।
भजनट करे ना कभू सजन मनाये बर,
छुतहा चेत हा कइसे रामधन पाय हो।।
शोभामोहन
मनहरण घनाक्षरी)
राम रट राम रट, राम बसे घट-घट,
संसो के चिरइया उड़ जाही भर-भर ले ।
बेरा बड़ा बलकर, ओकर जतन कर,
फर हर फरे झर जाही झर-झर ले ।
बेरा संग झन खेल, अउ दुख झन झेल,
अइलाही फूल जेन फूले चर-चर ले ।
पयडगरी सुघर, हरि भजन के धर,
दूरिहाय जगत के दुख सरभर ले ।
२
घनाक्षरी छंद
परबतिया ला देखौ शंभू मेर चेंध चेंध,
जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।
सीता सत डटे रहि पति पत राखे बर,
फूल भार अगन ले नहक देखाय हे
रत्नारानी ला देखौ माया परे तुलसी ला,
राम मा रमाये मन लहर लगाय हे।
जब जब देखहू लहुट के रे मनखे हो,
पग पग तिरिया हा जग ला रेंगाय रे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
मनहरण
घनाक्षरी
(छत्तीसगढ़ी स्त्री विमर्श)
तिरिया ला
तिरिन बरोबर सरेखे नहीं,
तिरियाच बर
सबो नेम ला बनाय रे।
बपरी बना के फेर
पुतरी असन नाच,
चारो जुग हावय
परमान नचाय रे।
जब ले जनम धरे
तब ले करम करे,
बाँचे-खोंचे
खाय हाड़ा टूटत कमाय रे।
जब-जब देखहीं
लहुट के ये मनखे तौ,
पग बल भर उही
जग ला रेंगाय रे ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
-------------------------------------------
संजोग (जनहरण
घनाक्षरी)
-------------------------------------------
रबि अरन बरन,जग छिंचत किरन,
दमकत कन-कन,जब परस करै।
कलियन-कलियन,सकुचय मधुबन,
अलियन गलियन
भँवरन भँवरै।
कर पिय दरसन, झिलमिल नयनन
अड़बड़ ठनगन,कर शरम मरै ।
अउ जुगल चरन, धर जियन मरन
मन हवन करन
दुलहिन सँभरै ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
बरसात के
चित्र (कवित्त छत्तीसगढ़ी )
1/
बूँद-बूँद बन
काँदी , चुक्क चमकत चाँदी ।
हीरा कस कन चउमास
मे बगरगे ।।
भींजे-भींजे
डारा पाना, चुरगुन गाये गाना।
चराचर जगत के
दुख ताप हरगे ।
बूँद गली
गाँव-गाँव, गिंजरत धर पाँव।
बिगन थके चलत
दहरा उतरगे ।
मंडल टंगा
अटारी, झड़ी पाय सुख भारी ।
गुरबा गरीब
जान बिन मारे मरगे ।।
2/
पुरवा छेड़त
राग, जागे धरती के भाग,
डारा डोल-डोल
झूम-झूम लहरात हे ।
चातक पिये
पियास, स्वाति बूँद बस आस,
मुँह फार नभ
कोती आँखी गड़ियात हे ।
दुबराय देख तन, मरत जल बिगन,
नदियाँ ऊपर घन
आँसू टपकात हे ।
बिहाये बरात
धर, आवत हवय बर,
गगन फटाका फोर
मादर बजात हे ।।
3/
कोंवर तरोई
नार, चढ़े अमुवा के डार,
झुमरत झूल-झूल
कुछु गोठियात हे ।
धीरे-धीरे फर
फूल, हाँसत हें खुल-खुल ,
भँवरा बगइचा
मा बड़ा इतरात हे ।
घम-घम बन जागे, चम-चम दूबी
छागे ,
कोनो भुँइया
भर बीजहा छरियात हे ।
गुन गाय पुन
पाय, बेद मंत्र अरथाय,
टर्र-टर्र
मेचका मगन नरियात हे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
०२/०१/१९
०००००००००००००००००००००००००
अरे मोर
सोनापाँखी
०००००००००००००००००००००००००
अरे सोनपाँखी
मोर, चिरइ घर अँजोर,
अँचरा के
छइहाँ में रखके चलाँव रे।
चमकत आँखी तोर
बुलथस गली खोर,
कलजुग देख जग
मन डर जाँव रे ।
मुहरन चंदा कस
फूल के असन हस,
सुन सुन बयगुन
गुन कठवाँव रे ।
सबो बिसवास हर
जोरगत भरभर,
अनहोनी घटै
घर-घर गाँव-गाँव रे ।
छाती छोले
अंधियार, नानकुन दीया बार,
सरपिन रतिहा
ले झगरा उठाँव रे ।
पयजन बोलै झन, छनछन-छनछन,
हरु-हरु डहर
मा गोड़ मडवाँव रे ।।
रकसा हा मनखे
ते मनखे हा रकसा ए,
समझ न आवै
नोनी कइसे समझाँव रे ।
कोनो हर फुनगी
मा दीया बारै बारन दे,
अँचरा लुकाँव
डर छाती चटकाँव रे ।
कले चुप रहै
गली कहै सब हलीभली,
जेकर उपर बीते
छोड़ देवै गावँ रे।
भाग हे उटँग
तव ,दोसदारी कोन दँव,
अलथी-कलथी कर
रतिहा पहाँव रे।
टुकुर टुकुर
बस चातक कस निटोर,
देखत अगाह कती
जीव जुड़वाँव रे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
अनहोनी घटै
घर-घर गाँव गाँव रे
सोन चिरइया
मोर, अँगना घर अँजोर,
अँचरा के
छइहाँ में रखके चलाँव रे।
चमकत आँखी तोर
बुलथस गली खोर,
तोर रखवारी करे
कोन पतियाँव रे ।
चंदा कस मुहरन, हाँसी फूल के
असन ,
रूप नजरावै झन ठीड
उतराँव रे ।
ककरो न बिसवास, रोज टूटे एक
आस,
अनहोनी घटै
घर-घर गाँव-गाँव रे ।
छाती छोले
अंधियार, नानकुन दीया बार,
सरपिन रतिहा
ले झगरा उठाँव रे ।
पयजन बोलै झन, छनछन-छनछन,
सोच गुन डहर
मा गोड़ मडवाँव रे ।।
रकसा हा मनखे
ते मनखे हा रकसा ए,
समझ न आवै
नोनी कइसे समझाँव रे ।
कोनो हर फुनगी
मा दीया बारै बारन दे,
अँचरा लुकाँव
मै तो छाती चटकाँव रे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
छूवत भूतल
गोड़ बाजे पयजनिया
######################
छनन-छनन छन, छनछन-छनछन,
छुवत भूतल
गोड़ बाजे पयजनिया ।
खनन-खनन खन, खनखन-खनखन,
मगन करत
धुन हाथ के कंगनिया ।
लर-लर गर
भर,
माला मोती
सरभर,
झूलनी झूलत
झूले,
पतरेंगी
कन्हिया।
झरर-झरर झर, झरझर-झरझर,
बगरात
हाँसी रूप रंग धन रनिया ।
######################
शोभामोहन
०१/०५/२०१९
#####################
राम रट राम
रट (मनहरण घनाक्षरी)
#####################
राम रट राम
रट,
राम बसे
घट-घट,
संसो के
चिरइया उड़ जाही भर-भर ले ।
बेरा बड़ा बलकर, ओकर जतन कर,
फर हर फरे
झर जाही झर-झर ले ।
बेरा संग
झन खेल,
अउ दुख झन
झेल,
अइलाही फूल
जेन फूले चर-चर ले ।
पयडगरी
सुघर,
हरि के भजन
धर,
दूरिहाय
जगत के दुख सरभर ले ।
#######################
शोभामोहन
######################
तिरिया सिखौना
कवित्त
1/
भौरों कस
भुनुन-भुनुन कर नर हर,
रूप रंग देखके लुढ़ारे बर आय
रे ।
उड़ियात तितली
असन देख आँखी फूँटै,
मया मया कहै पाँखी
टोर के मड़ाय रे ।
झालापाला ओढ़ना
पहिर झन ओढ़ झन,
हाट गली खोर
तन आँखी गड़ीयाय रे ।
बेर हर अलहन
गोड़ ला मड़ावै चुप,
गउ कस हवस
तोला नइ ममहाय रे ।
2/
ताकत हवय
कतकोन झन तोर चाल,
हब ले काँटा
हा कहूँ झन तो गोभाय रे ।
दुख न अभरै
मोर सोन के चिरइया ला,
दाई मन मानै
नहीं संसों बड़ खाय रे ।।
रंग झन उतरय, पर झन कुतरय,
भेजके अकेल्ला
तोला जीव कठवाय रे ।
जात हे अबड़
बिखहर मनखे के सुन,
फोर कइसे कहौं
समझ नइ आय रे ।
शोभामोहन
पानाझरी
शिशिरगीत कवित्त छत्तीसगढ़ी
कोईली हा
कुहकत ,भौंरा रस चूहकत ,
फूलवारी कोती
सब झन लोरियात हें ।
फूल फूले रंग रंग,पिंयर व लाल
बंग,
मयारूक अपन
मया ला सोरियात हें ।
महराज दिवाकर,पसर में भर कर,
सोन कस किरन
भूतल छरियात हे ।
कोनो सुख सपना
ला,कोनो दुख तपना ला,
अपन अपन भाग
भोगे ओरियात हे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
04/02/ 2019
*मनहरण घनाक्षरी*
रेंगे बर तोर
बाट, मन ला करै उचाट,
अइसन साध
प्रभु, दया कर टार दे ।
हालै डोलै झन
मन, थीर जल से बसन
मगज मा मया दया, भगति पधार दे
।
साधू संत
सतसंग, रंग दे उँकर रंग,
सब रंग छोड़वा
केसर रंग डार दे ।
जनम-जनम चल, नइ जेन बाट भल,
"शोभामोहन"ला जग बाट ले उबार दे ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
११/०६/२०२०
खुश्बू विहार
कालोनी
हरि के छाती
भृगु के लात
(मनहरण घनाक्षरी)
(१)
जगहित करे बर, जग्य रचाये
सुघर,
देवदल संसो मा
बिकट बूड़े रहिथे ।
फल अरपन करे, ब्रम्हा हरि
हर वरे,
रिखि भृगु हा
नियाव करे जोग लहिथे ।।
शेषनाग के उपर, सुते रहै हरि
हर,
देख के अहँजथस
रिखि भृगु कहिथे ।
आगी अँगरा असन, रीस लागिस बढ़न,
रिखि छाती
मारे लात हरि अउ सहिथे ।
(२)
फूल कस गोड़
तोर, बज्र कस छाती मोर,
बिनय बचन कहे
हरि गोड़ धरथे।
सुन गोठ मया
सने, भृगु सुख पाये बने,
जग्य फल देये
तब रिखिवर करथे ।
सुन लछमी
रिसाय, छतिया मोला बसाय,
कोन छाती लात
मारे घेपै नइ डरथे ।
लछमी करत लख, रखमख रखमख,
शोभामोहन
बिसनु लोक ले निकरथे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
गुरु घनाक्षरी
:
चलत धुन अपन, रनबन रनबन,
चल गदकत मन, दरस करे बर।
दुख सुख अलहन, गिंजरन घुमरन,
घुचन सब बिघन, सरस धरे बर।
तज अब संँभरन, गुनधर अभरन,
कर सब अरपन, हरस भरे बर।
अनमन जनमन, उझरन बन बन,
जग मग बिचरन, परस टरे बर।
शोभामोहन
२३/११/२०२०
बरसात के चित्र (कवित्त छत्तीसगढ़ी )
1/
बूँद-बूँद बन काँदी , चुक्क चमकत चाँदी ।
हीरा कस कन चउमास मे बगरगे ।।
भींजे-भींजे डारा पाना, चुरगुन गाये गाना।
चराचर जगत के दुख ताप हरगे ।
बूँद गली गाँव-गाँव, गिंजरत धर पाँव।
बिगन थके चलत दहरा उतरगे ।
मंडल टंगा अटारी, झड़ी पाय सुख भारी ।
गुरबा गरीब जान बिन मारे मरगे ।।
2/
पुरवा छेड़त राग, जागे धरती के भाग,
डारा डोल-डोल झूम-झूम लहरात हे ।
चातक पिये पियास, स्वाति बूँद बस आस,
मुँह फार नभ कोती आँखी गड़ियात हे ।
दुबराय देख तन, मरत जल बिगन,
नदियाँ ऊपर घन आँसू टपकात हे ।
बिहाये बरात धर, आवत हवय बर,
गगन फटाका फोर मादर बजात हे ।।
3/
कोंवर तरोई नार, चढ़े अमुवा के डार,
झुमरत झूल-झूल कुछु गोठियात हे ।
धीरे-धीरे फर फूल, हाँसत हें खुल-खुल ,
भँवरा बगइचा मा बड़ा इतरात हे ।
घम-घम बन जागे, चम-चम दूबी छागे ,
कोनो भुँइया भर बीजहा छरियात हे ।
गुन गाय पुन पाय, बेद मंत्र अरथाय,
टर्र-टर्र मेचका मगन नरियात हे ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
तन ला रंगा ले रंग, मंतर ले रंग मन,
अंतस ला भगति के चुक रंग बंग
ले।
बिद्या ले बुद्धि मलंग, घोख घोख चित्त रंग,
मीठ नीक गोठ बात कर मीत संग
ले।
अहम ले रंग ज्ञान, प्राणायाम रंग प्रान,
अइसे बरन रंग देखै जग दंग ले।
झन आने रंग डार, प्रभु कहै बार बार,
अँधियारी मिटही मुँधेर
पंगपंग ले।
शोभामोहन
०४/०५/२०२१
तोर ले मन
उजास, तोर दरसन प्यास,
तोरेच भरोसा
भार जीव हा रहत हे।
बने कहैं ते
गिनहा, अरझे ते सुलीनहा,
जेला ज इसे कहिना
त इसे कहत हे।
मोला तोर ले
हे काम, एक थेभा तोर नाम,
मन तोरे अनुसार
रहे ला चहत हे।
मोला तो फिकर
नहीं, कोनो हा कहय कहीं,
चित चेत आनंद
के धार में बहत हे।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
११/०४/२०२१
मनहरण घनाक्षरी
तोर नाम के उजास, तोर दरसन प्यास,
तोरेच भरोसा भार जीव हा रहत
हे।
बने हौं ते हौं गिनहा, अरझे ते सुलीनहा,
जेन जइसे समझ तइसे कहत हें।
तोर ले मोला हे काम, एक रुचै तोर नाम,
मन तोर अनुसार रहन चहत हे।
मोला तो फिकर नहीं, कोनो हा कहत कहीं,
तोर कोती चित चेत चिंतन बहत
हे।
शोभामोहन श्रीवास्तव
११/०४/२०२१
अनहोनी घटै घर-घर
गाँव गाँव रे
सोन चिरइया
मोर, अँगना घर अँजोर,
अँचरा के
छइहाँ में रखके चलाँव रे।
चमकत आँखी तोर
बुलथस गली खोर,
तोर रखवारी करे
कोन पतियाँव रे ।
चंदा कस मुहरन, हाँसी फूल के
असन ,
रूप नजरावै झन ठीड
उतराँव रे ।
ककरो न बिसवास, रोज टूटे एक
आस,
अनहोनी घटै
घर-घर गाँव-गाँव रे ।
छाती छोले
अंधियार, नानकुन दीया बार,
सरपिन रतिहा
ले झगरा उठाँव रे ।
पयजन बोलै झन, छनछन-छनछन,
सोच गुन डहर
मा गोड़ मडवाँव रे ।।
रकसा हा मनखे
ते मनखे हा रकसा ए,
समझ न आवै
नोनी कइसे समझाँव रे ।
कोनो हर फुनगी
मा दीया बारै बारन दे,
अँचरा लुकाँव
मै तो छाती चटकाँव रे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
कृपाण
घनाक्षरी वर्णिक छंद
परे खटिया
उतान, होवत ले ठाढ़ भान,
उठत बघार शान, कहत हे चहा
लान ।
बात धर नान
नान, बोलत हे तान तान,
रीस रोस मन ठान, सिरतो ले
अनजान।
दूसर के बात
मान, लेगे हे कँउवा कान,
पाछू जात सही
जान, आवत हे धूर्रा छान।
बिन धरे गुन
ज्ञान, चिन्हत ना लाभ हान,
होवत हे अपमान, धँसत करेजा
बान।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२२/११/२०२०
पाटन दुर्ग
छ.ग.
जलहरण
घनाक्षरी (वर्णिक छंद)
बिन तारा बिन
कूची, पोठ रोठ नान बूची,
मनखे ला माया
छाँद राखै जग जेल प्रभु।
मड़ा सुख
सुविधा ला, भोग रोग दुविधा ला,
बिलमाये राखै
जीव रच यह खेल प्रभु।
सुख दुख ओरी
पारी, भोगै सब जीवधारी,
कहूँ जगत मा
नइ दिखै बिन झेल प्रभु।
गुरुवर के
गियान, जेन हा देवै धियान,
जग रूँधना ला
टोर करा देवै मेल प्रभु।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२२/११/२०२०
पाटन दुर्ग छ.ग.
रूप घनाक्षरी
भगत के मति अउ
गति
(१)
अहम के भाव
तजे, परमात्मा ला भजे,
सुख दुख मा उहीच, ला सुमिरथे
सचेत ।
तज भेदभाव मन, जीव दया कर
प्रन,
गरब गुमान हन, प्रभु ला परम
नेत।
दुख में न रोय
गाय, सुख बर ना ललाय,
एक ईश ला मनाय, जग जीवसुख
देत।
करै कहूँ अनभल, करथे ओकरो भल,
हरि भज पल पल, बड़हर सुख लेत।
(२)
लाभ अउ हान
घुँचे, हार जीत पार ऊँचे,
हरहिन्छा दान
रुचे, वह सब सुख पाय।
छोड़ सबो कलकल, गोठ बात भलभल,
तज मन हलचल, तन जीते बर
जाय ।
परमातमा मा
टेके, तन मन राखै छेंके,
एती ओती नइ
देखे, प्रभु मन मा बसाय।
कोनो हा उदिम करे, कुड़काय रीस
भरे,
तभो अमरित झरे, अरि थक हार
जाय।
(३)
कुड़काय ना
कहूँ ला, बगियाय ना कहूँ ला,
झगराय ना कहूँ
ला, रीस रोस रहै पार।
जगत जिनिस बर, ओला नइ धरै जर,
माटी लेख चोला
घर, गुनय फकत सार।
देखके बढ़त पर, सुख पावै बड़हर,
इरखा डाह उबर, बिन डर बिन
भार।
चार कोस दूर
रीस, परै ना पाँच पचीस,
सुमरत एक ईश, बहय जगत धार।
(४)
गड़ै नइ आस
फाँस, तन मन एक रास,
सब संग बोल
हाँस, पबरित बेवहार।
चिन्ह के अपन
दोस, सरलग रहै होस,
डहरसाजी न रोस, सब बेर शुभ
धार।
कभू ना होवै
बिहल, रहै एक ईश बल,
लीला जान हलचल, अटल दियना
बार।
भोग मा नहीं भुलाय, आत्मा नहीं
सुलाय,
आसरा नइ ढुलाय, राखै मन दूर
टार।
(५)
भोग नाश देख
डर, धरै नहीं रोये बर,
राखै मन टाँठ
कर, परमेश के अधार।
पाये अउर अपाय, बर ना मन झपाय,
सुख साध
दुरिहाय, चेत ला रखै उलार।
शुभ वा अशुभ
फल, एक लागै तप बल,
चेत बुध निरमल, सम लागै बैरी
यार।
अपमान अउ मान, जानै वो एक
समान,
बात धर नान
नान, टौरै ना धीरज पार।
(६)
सरद गरम सम, सुख दुख जान
भ्रम,
चेत उटँग बिरम, घुँचे घुँचे
मोर तोर।
चाहे कहूँ
सहराय, चुगली करै सुनाय,
देह ना चटक
पाय, ईश धुन मा सजोर ।
चरचा में दिन
निश, सुमरत जगदीस,
दुनिया ले कोस
बीस, दुरिहा रहै अँजोर।
पर के ना करै
बात, बस प्रभु गुन गात,
अपन दिन पहात, मन नाम गुन
बोर ।।
(७)
प्रभु बर मया
जगा, भजन में जीव लगा,
सबो ला नजीक
सगा, समझे अउ परिवार।
मन राखथे
संतोष, देवे ना कहूँ ला दोष,
करथे सबो ला
तोस, मोह नहीं घर द्वार।
बूध प्रभु पद थीर, धरम ला धर धीर,
तीरथ किंजर
फीर, सरधा ला बढ़वार।
भगत के गुन गन, गावत शोभामोहन,
करे बर ठंस मन, होये बर भव
पार।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२०/११/२०२०
पाटन
घनाक्षरी
बिन लटर-पटर, बिन मटर-मटर
बिन सटर-पटर, सब करम करै।
मन जतर कतर, तन गमक अतर,
कर हलर हलर मन
भरम भरै।
जब चलय डहर, कर महर महर,
झरफर झरफर पग
ठिठक डरै।
चमकत झझकत, अउ हँसत फकत,
लहुटय अउ मन
सुख अगम भरै ।।
शोभामोहन
१०/११/२०२०
सरसर सरसर
फरफर फरफर
धरधर धरधर
झरझर झरझर
थरथर थरथर
खरखर खरखर
हरहर हरहर
हरहर कटकट, पर जग फटफट,
छटपट छटपट, अलहन ल धरे ।
तन तहल-बिकल,मन बड़ हलचल,
नइ सुमिरन बिन, जग बिपत टरै ।
बफलत झगरत,
दुख धर तलफत, जग अगन जरै ।
संस्कृत लोरी
मदालसा
सुन मेरे लाल
सुन, नैन उजियाल सुन।
कैसे काल
ब्याल सुन, लाल जगजाल सुन ।।
भरम निकाल सुन, सुपथ सुचाल
सुन।
खिसकता काल सुन, जगत भूचाल
सुन।।
दमकाने भाल
सुन, होने को निहाल सुन।
दुख विकराल
सुन, बनने भुवाल सुन।।
रखना संभाल
सुन, बाँध गाँठ डाल सुन।
सुन मेरे बाल
सुन, ओ विशुद्ध ज्वाल सुन।।
शोभामोहन
०५-११-२०२०
खुश्बूविहार
कालोनी
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rksj uhdrk vxhuijNks nsok; js A
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drdk ra; viu varl yk iksBk; js A
डमरू घनाक्षरी (३२ वर्ण)
नियम : ३२
वर्ण लघु बिना मात्रा के ८,८,८,८ पर यति प्रत्येक चरण में . होता
डहर सुघर चल, अपन अजम बल,
कर कर परभल, मगन मगज बर ।
अगम हवय जग, नइ सग असलग,
अब अलग थलग, चलन डउल कर।
अटकन भटकन, दस ठन चटकन,
उलझन मन सन, झन कर झन कर ।
कलकल छलछल, बह बन कर जल,
रहत तन सफल, मर रहन अमर।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
०९/०९/२०२०
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