कोन गाँव ले आय रोला
पर के बाना मार, अपन भर सुख ला देखे।
पाये जब तँय मान, सगा नइ कभू सरेखे।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके बइहा।
मति ला करे खराब, इही अउ अंतस कइहा।।
कोन गाँव ले आय,कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के तोर,जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट,धरत हस माल अजारा।
सुन अंतस के बात,जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
बोंवव पेंड़ सुजान रोला
जीव ल लेवत घाम, भड़कगे सूरज चेतव।
बोंवव पेड़ सुजान, नवा पीढ़ी सुख नेतव।।
सिरमिट के संसार, रचत हव आनी बानी।
थोरिक करव गुनान ,सुनव अब गोठ सियानी।।
पेड़ रही सब ठाँव,तभे बड़ बरसा होही।
सुख पाही संसार,सबो जब पेड़ ल बोंही ।।
आही तभे सुकाल,सबो बर भुँइया कोरा।
पानी ला पनकाय,करव सब जोखा तोरा।।
शोभामोहन
बेटी अउ भौंरा उपर दू ठन रोला
राखव बने सहेज,सबो झन बेटी सेवव।
माँगय नहीं दहेज,उही ला भाँवर देवव।।
दू कुल के मरजाद,निभाथे बेटी मानो।
बेटी जगत अधार,सहज झन मनखे जानो।।
महर महर ममहात,मोंगरा के फुलवारी।
भँवरा गंध नहाय,मगन हो मुचकत भारी।।
चुहके झोर अघाय, सुनावत मया तराना।
झुमरत लठरत देख,संभारत डारा पाना।।
शोभामोहन
बनउकी हमरो बनही
हीरा जइसे साँस, लुटा कचरा नइ सेवँन ।
सुमिरन करके नाम,पिया के लाहो लेवँन।।
बनथे सबके काम, बनउकी हमरो बनही।
बिरथा होये साँस,दयालू हे नइ गनही।।
बिगड़े सबके काम,बनाथे मुरली वाला।
भटके जन ला बाट,बताथे दीनदयाला।।
लेथे सबके सोर, अधरमी पापी चोला ।
छोड़ कपट जंजाल,लगा मन सुमिरौ ओला।।
सबके हिरदे माँझ, रहइया घट घट बसिया ।
सबके दाई बाप, उही हे सब जग रसिया ।।
मेट भगत के ताप, दया कर बाँही धरथे।
लटपट फेर जनाय,गजब वो माया करथे ।।
शोभामोहन
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल अजारा
पर के बाना मार, पेट ला अपने देखे।
वो नइ पावय मान,जेन नइ पर ला लेखे ।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके बइहा।
पइसा मनखे बुद्धि, जान ले करथे कइहा।।
कोन गाँव ले आय, कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के तोर, जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल अजारा ।
सुन अंतस के बात, जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
होत करेजा आज बाप के कुटका-कुटका
1/
होत करेजा आज, बाप के कुटका कुटका।
छोड़ अपन परिवार, जात हे बेटा छुटका।।
होगे नानुक बात,तेन मा बहू रिसागे।
दाई किरिया देत, दूध के तभो परागे ।।
2/
खूँटी हवय टँगाय, एक ठन जुन्ना कुरता।
पनही माड़े आँट, करावत हावय सुरता ।।
परछी अँगना गाँव, गली घर सुन्ना परगे।
सुमता के संसार, रचे छिन भर मा जरगे ।।
3/
बेटा परछो लेत,मूड़ में आय बुढ़ापा।
जाँगर खँगगे तभो,चलावत गैंती रापा।।
टूटिस घर परिवार,सगा मा होत फदीता।
महतारी अउ बाप,आसरा रहिगे रीता ।।
शोभामोहन
बाप कुँआ खन बीस फीट मा पानी पाये
बाप कुँआ खन बीस,फीट मा पानी पाये।
अउ पताल ला तोड़,पूत हर बोर खनाये।।
नातिन हर लुलवात,लानथे नल ले पानी।
आगू काकर भाग,काय हे हम का जानी।।
नरवा परे सुखाय,जीव सब माँगय पानी।
पानी बिन हलकान, होत हे सबो परानी ।।
लहकत मरत पियास,निहारय सुक्खा नरवा।
नइ हे मूँड़ लुकाय, छाँव अउ छान्ही परवा।।
शोभामोहन
हाड़ा हपट रपोट धरत हस माल अजारा
पर के बाना मार, पेट ला अपने देखे।
वो नइ पावय मान,जेन नइ पर ला लेखे ।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके बइहा।
पइसा मनखे बुद्धि, जान ले करथे कइहा।।
कोन गाँव ले आय, कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के तोर, जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल अजारा ।
सुन अंतस के बात, जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
चाही सबला दूध फेर नइ चाही गइया
पैरावट बिन गाँव,लगय अब सुक्खा ब्यारा।
बीजा भर घर लान,धरावत आगी चारा।।
लाँघन भूँखन गाय, फिरत दुख कोन उबारे।
खावत गारी मार, बिचारी बेर गुजारे।।
गइया ला अंँधियार, दिखत हे चारो कोती।।
चारा बर छुछुवात, फिरत हे ऐती ओती।
बिन गउ गोबर आज,परे हे घुरवा सुन्ना।
मनखे महल टेकात, फोर के कोठा जुन्ना।।
घर ले देथें ढील,फिरे बर मारे मारे।
मुँह मारत सब ठाँव,गाय बर कोन बिचारे।।
बेंवारस कस आज,फिरत हे लाँघन गरवा।
बिन पानी फिफियात,सुखागे हावय नरवा।।
मनखे बढ़गे आज,चरागन घलो सिरागे।
लालच में बइहाय,मनुख के चाल किरागे।।
बिन स्वारथ के आज, पुछारी ददा न दाई।
तेकर ले का होय,जीव बर दया भलाई।।
बन काँदी चर जेन,सबो ला गोरस देथे।
अपने पिलवा जान,जेन हा सबला सेथे।।
चोरी कर चुपचाप,गाँव ले लेगय गइया।
जीते जीयत खाल,खींच दय निठुर कसइया ।।
शहर गांँव सब ठाँव,देख लव दीदी भइया ।
चाही सबला दूध,फेर नइ चाही गइया।।
भटकत हावय गाय,देख लव ऐती ओती।
उल्टा जग के चाल,दिखत हे चारो कोती ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
नवधा भक्ति
1/
प्रभु नौ बरन बताय,भगत बर रेंगे धरसा।
नवधा रस्ता जान,भगत मन जावै हरसा।।
होथे ईश दयाल,मया के दिहय चिन्हारी।
नवधा भक्ति जगान,चलौ सुख पाये भारी ।।
2/
नरतन बर नौ बाट,बताये तेमा जाबो।
दसवाँ कहूँ धँवाय,कभू हम नइ पतियाबो।।
पहिली भक्ति सुजान,संत के सुनबो बानी।
दूसर भक्ति मया,कीरतन भजन कहानी।।
3/
तीसर गुरु के गोड़,चाकरी सेवा धरबो ।
चौथा प्रभु गुनगान,कपट तज के अब करबो।।
पंचम मंतर जाप,मया प्रभु जब्बर जब्बर जोरे ।
मन में हे बिस्वास,जेन ला बेद अँजोरे ।।
4/
छटवाँ तज सब काम,धाम के बिरथा बोझा।
काया कसन लगाम,परै झन लालच झोझा।।
सरलग संत सुजान,संगती धरमी चाला।
भक्ति सातवाँ धरन,बनन सम आँखी वाला।।
5/
सबमें देखन एक,जगतपति चारो कोती।
सबो जीव के माँझ,बरत हे ओकर जोती।।
कहे हवय भगवान,संत ला बड़का सबले।
सबला अउ सब बेर,सुलभ होथे वो रबले।।
6/
आठवाँ भक्ति हवय,जेन भी तेमा राजी।
रखके मन संतोष,रखन मन नहीं नराजी।।
सपना में पर दोष,देखय झन आँही-बाँही।
अपन बाट मा जान,करय कोनो हर काँहीं।।
7/
नवम भक्ति अनुसार,सहज हो पानी जइसे।
तजन कपट छल चाल,रहन प्रभु चाहै तइसे।।
रहि भरोस भगवान,एक अउ दूसर नाही।
मन मा रखन न दु:ख,रीस सुख लालच
काँही।।
शोभामोहन
रोलाछंद-शोभामोहन
श्रीवास्तव
नवधा भक्ति
1/
प्रभु नौ बरन
बताय,भगत बर रेंगे धरसा।
ओमा जा रे जीव,अभरही किरपा
बरसा।।
होही ईश दयाल,मया के दिहे
चिन्हारी।
नवधा भक्ति
जगान,महा सुख तज चरियारी ।।
2/ नरतन बर नौ बाट,बताये तेमा जाबो।
दसवाँ कहूँ
धँवाय,कभू हम नइ पतियाबो।।
पहिली भक्ति
सुजान,संत के सुनबो बानी।
दूसर भक्ति
मया,कीरतन भजन कहानी।। 3/
तीसर गुरु के
गोड़,चाकरी सेवा धरबो ।
चौथा प्रभु
गुनगान,कपट तज के अब करबो।।
पंचम मंतर जाप,मया हरि जब्बर
जोरे ।
मन में हो
बिस्वास,जेन ला बेद अँजोरे ।।
4/
छटवाँ तज सब
काम,धाम के बिरथा बोझा।
काया कसन लगाम,परै झन लालच
झोझा।।
सरलग संत
सुजान,संगती धरमी चाला।
भक्ति सात के
भार,बनन सम आँखी वाला।।
5/
सबमें देखन एक,जगतपति चारो
कोती।
सबो जीव के
माँझ,बरत हे ओकर जोती।।
कहे हवय भगवान,संत ला बड़का
सबले।
सब बर वो सब
बेर,सुलभ हो जाथे रबले।।
6/
भक्ति आठ के
ज्ञान ,जेन हे तेमा राजी।
मन राखन संतोष,रहै मन नहीं
नराजी।।
सपना मा परदोष,दिखै झन
आँही-बाँही।
अपन बाट हम
जान,करै कोनो हर काँहीं।।
7/
नवम भक्ति
अनुसार,सहज हो पानी जइसे।
तजन कपट छल
चाल,रहन प्रभु चाहै तइसे।।
रहि भरोस
भगवान,एक अउ दूसर नाही।
मन मा रखन न
दु:ख,रीस सुख लालच काँही।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
धरत हस माल
अजारा (रोला)
पर के बाना
मार, पेट ला अपने देखे।
वो नइ पावय
मान,जेन नइ पर ला लेखे ।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके
बइहा।
पइसा मनखे बुद्धि, जान ले करथे
कइहा।।
कोन गाँव ले
आय, कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के
तोर, जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल
अजारा ।
सुन अंतस के
बात, जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
बाप कुँआ खन बीस फीट मा पानी
पाये
बाप कुँआ खन बीस,फीट मा पानी पाये।
अउ पताल ला टोर,बेटवा बोर खनाये।।
नातिन हर लुलवात,लानथे नल ले पानी।
आगू काकर भाग,काय हे हम का जानी।।
नरवा परे सुखाय,जीव सब माँगय पानी।
पानी बिन हलकान, होत हे सबो परानी ।।
लहकत मरत पियास,निहारय सुक्खा नरवा।
नइ हे मूँड़ लुकाय, छाँव अउ छान्ही परवा।।
पानी स्त्रोत अँटात,काटके रूख मनमाने ।
मूँड़ उपर हे काल, सुतव झन चद्दर ताने ।।
सब झन पेड़ लगाव, बचाये बर जिनगानी।
नइ तो मरन भँजाव, सबो झन के बिन पानी ।।
रूख रही सब ठाँव,तभे घन बरसा होही।
सुख पाही संसार,सबो जब पेड़ ल बोंही ।।
आही तभे सुकाल,सबो बर भुँइया कोरा।
पानी ला पनकाय,करव सब जोखा तोरा।।
जीव ल लेवत घाम, भड़कगे सूरज चेतव।
पेड़ लगा दू चार, नवा पीढ़ी सुख नेतव।।
सिरमिट के संसार, रचत हव आनी बानी।
थोरिक करव गुनान,सुनव अब गोठ सियानी।।
शोभामोहन
होत करेजा आज
बाप के कुटका-कुटका
(रोलाछंद)
1/
होत करेजा आज, बाप के कुटका
कुटका।
छोड़ अपन परिवार, जात हे बेटा
छुटका।।
होगिस नानुक
बात,तेन मा बहू रिसागे।
दाई किरिया
देत, दूध के तभो परागे ।।
2/
खूँटी हवय
टँगाय, एक ठन जुन्ना कुरता।
पनही माड़े आँट, करावत हावय
सुरता ।।
परछी अँगना
गाँव, गली घर सुन्ना परगे।
सुमता के
संसार, रचे छिन भर मा जरगे ।।
3/
बेटा परछो लेत, मूड़ में आय
बुढ़ापा।
जाँगर खँगगे
तभो, चलावत गैंती रापा।।
टूटिस घर
परिवार, सगा मा होत फदीता।
महतारी अउ बाप, आसरा रहिगे
रीता ।।
शोभामोहन
बोंवव पेंड़
सुजान रोला
जीव ल लेवत
घाम, भड़कगे सूरज चेतव।
बोंवव पेड़
सुजान, नवा पीढ़ी सुख नेतव।।
सिरमिट के
संसार, रचत हव आनी बानी।
थोरिक करव
गुनान ,सुनव अब गोठ सियानी।।
पेड़ रही सब
ठाँव,तभे बड़ बरसा होही।
सुख पाही
संसार,सबो जब पेड़ ल बोंही ।।
आही तभे सुकाल,सबो बर भुँइया
कोरा।
पानी ला पनकाय,करव सब जोखा
तोरा।।
शोभामोहन
बेटी उपर रोला
राखव बने सहेज,सबो झन बेटी
सेवव।
माँगय नहीं
दहेज,उही ला भाँवर देवव।।
दू कुल के
मरजाद,निभाथे बेटी मानौ।
बेटी जगत अधार,सहज झन मनखे
जानौ।।
भौंरा उपर रोला
महर महर ममहात,मोंगरा के फुलवारी।
भँवरा गंध
नहाय,मगन हो मुचकत भारी।।
चुहके झोर
अघाय, सुनावत मया तराना।
झुमरत लठरत
देख,संभारत डारा पाना।।
शोभामोहन
कोन गाँव ले आय रोला
पर के बाना मार, अपन भर सुख ला देखे।
पाये जब तँय मान, सगा नइ कभू सरेखे।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके बइहा।
मति ला करे खराब, इही अउ अंतस कइहा।।
कोन गाँव ले आय,कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के तोर,जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट,धरत हस माल अजारा।
सुन अंतस के बात,जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
बोंवव पेंड़ सुजान रोला
जीव ल लेवत घाम, भड़कगे सूरज चेतव।
बोंवव पेड़ सुजान, नवा पीढ़ी सुख नेतव।।
सिरमिट के संसार, रचत हव आनी बानी।
थोरिक करव गुनान ,सुनव अब गोठ सियानी।।
पेड़ रही सब ठाँव,तभे बड़ बरसा होही।
सुख पाही संसार,सबो जब पेड़ ल बोंही ।।
आही तभे सुकाल,सबो बर भुँइया कोरा।
पानी ला पनकाय,करव सब जोखा तोरा।।
शोभामोहन
बेटी अउ भौंरा उपर दू ठन रोला
राखव बने सहेज,सबो झन बेटी सेवव।
माँगय नहीं दहेज,उही ला भाँवर देवव।।
दू कुल के मरजाद,निभाथे बेटी मानो।
बेटी जगत अधार,सहज झन मनखे जानो।।
महर महर ममहात,मोंगरा के फुलवारी।
भँवरा गंध नहाय,मगन हो मुचकत भारी।।
चुहके झोर अघाय, सुनावत मया तराना।
झुमरत लठरत देख,संभारत डारा पाना।।
शोभामोहन
बनउकी हमरो बनही
हीरा जइसे साँस, लुटा कचरा नइ सेवँन ।
सुमिरन करके नाम,पिया के लाहो लेवँन।।
बनथे सबके काम, बनउकी हमरो बनही।
बिरथा होये साँस,दयालू हे नइ गनही।।
बिगड़े सबके काम,बनाथे मुरली वाला।
भटके जन ला बाट,बताथे दीनदयाला।।
लेथे सबके सोर, अधरमी पापी चोला ।
छोड़ कपट जंजाल,लगा मन सुमिरौ ओला।।
सबके हिरदे माँझ, रहइया घट घट बसिया ।
सबके दाई बाप, उही हे सब जग रसिया ।।
मेट भगत के ताप, दया कर बाँही धरथे।
लटपट फेर जनाय,गजब वो माया करथे ।।
शोभामोहन
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल अजारा
पर के बाना मार, पेट ला अपने देखे।
वो नइ पावय मान,जेन नइ पर ला लेखे ।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके बइहा।
पइसा मनखे बुद्धि, जान ले करथे कइहा।।
कोन गाँव ले आय, कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के तोर, जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल अजारा ।
सुन अंतस के बात, जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
होत करेजा आज बाप के कुटका-कुटका
1/
होत करेजा आज, बाप के कुटका कुटका।
छोड़ अपन परिवार, जात हे बेटा छुटका।।
होगे नानुक बात,तेन मा बहू रिसागे।
दाई किरिया देत, दूध के तभो परागे ।।
2/
खूँटी हवय टँगाय, एक ठन जुन्ना कुरता।
पनही माड़े आँट, करावत हावय सुरता ।।
परछी अँगना गाँव, गली घर सुन्ना परगे।
सुमता के संसार, रचे छिन भर मा जरगे ।।
3/
बेटा परछो लेत,मूड़ में आय बुढ़ापा।
जाँगर खँगगे तभो,चलावत गैंती रापा।।
टूटिस घर परिवार,सगा मा होत फदीता।
महतारी अउ बाप,आसरा रहिगे रीता ।।
शोभामोहन
बाप कुँआ खन बीस फीट मा पानी पाये
बाप कुँआ खन बीस,फीट मा पानी पाये।
अउ पताल ला तोड़,पूत हर बोर खनाये।।
नातिन हर लुलवात,लानथे नल ले पानी।
आगू काकर भाग,काय हे हम का जानी।।
नरवा परे सुखाय,जीव सब माँगय पानी।
पानी बिन हलकान, होत हे सबो परानी ।।
लहकत मरत पियास,निहारय सुक्खा नरवा।
नइ हे मूँड़ लुकाय, छाँव अउ छान्ही परवा।।
शोभामोहन
हाड़ा हपट रपोट धरत हस माल अजारा
पर के बाना मार, पेट ला अपने देखे।
वो नइ पावय मान,जेन नइ पर ला लेखे ।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके बइहा।
पइसा मनखे बुद्धि, जान ले करथे कइहा।।
कोन गाँव ले आय, कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के तोर, जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल अजारा ।
सुन अंतस के बात, जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
चाही सबला दूध फेर नइ चाही गइया
पैरावट बिन गाँव,लगय अब सुक्खा ब्यारा।
बीजा भर घर लान,धरावत आगी चारा।।
लाँघन भूँखन गाय, फिरत दुख कोन उबारे।
खावत गारी मार, बिचारी बेर गुजारे।।
गइया ला अंँधियार, दिखत हे चारो कोती।।
चारा बर छुछुवात, फिरत हे ऐती ओती।
बिन गउ गोबर आज,परे हे घुरवा सुन्ना।
मनखे महल टेकात, फोर के कोठा जुन्ना।।
घर ले देथें ढील,फिरे बर मारे मारे।
मुँह मारत सब ठाँव,गाय बर कोन बिचारे।।
बेंवारस कस आज,फिरत हे लाँघन गरवा।
बिन पानी फिफियात,सुखागे हावय नरवा।।
मनखे बढ़गे आज,चरागन घलो सिरागे।
लालच में बइहाय,मनुख के चाल किरागे।।
बिन स्वारथ के आज, पुछारी ददा न दाई।
तेकर ले का होय,जीव बर दया भलाई।।
बन काँदी चर जेन,सबो ला गोरस देथे।
अपने पिलवा जान,जेन हा सबला सेथे।।
चोरी कर चुपचाप,गाँव ले लेगय गइया।
जीते जीयत खाल,खींच दय निठुर कसइया ।।
शहर गांँव सब ठाँव,देख लव दीदी भइया ।
चाही सबला दूध,फेर नइ चाही गइया।।
भटकत हावय गाय,देख लव ऐती ओती।
उल्टा जग के चाल,दिखत हे चारो कोती ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
नवधा भक्ति
1/
प्रभु नौ बरन बताय,भगत बर रेंगे धरसा।
नवधा रस्ता जान,भगत मन जावै हरसा।।
होथे ईश दयाल,मया के दिहय चिन्हारी।
नवधा भक्ति जगान,चलौ सुख पाये भारी ।।
2/
नरतन बर नौ बाट,बताये तेमा जाबो।
दसवाँ कहूँ धँवाय,कभू हम नइ पतियाबो।।
पहिली भक्ति सुजान,संत के सुनबो बानी।
दूसर भक्ति मया,कीरतन भजन कहानी।।
3/
तीसर गुरु के गोड़,चाकरी सेवा धरबो ।
चौथा प्रभु गुनगान,कपट तज के अब करबो।।
पंचम मंतर जाप,मया प्रभु जब्बर जब्बर जोरे ।
मन में हे बिस्वास,जेन ला बेद अँजोरे ।।
4/
छटवाँ तज सब काम,धाम के बिरथा बोझा।
काया कसन लगाम,परै झन लालच झोझा।।
सरलग संत सुजान,संगती धरमी चाला।
भक्ति सातवाँ धरन,बनन सम आँखी वाला।।
5/
सबमें देखन एक,जगतपति चारो कोती।
सबो जीव के माँझ,बरत हे ओकर जोती।।
कहे हवय भगवान,संत ला बड़का सबले।
सबला अउ सब बेर,सुलभ होथे वो रबले।।
6/
आठवाँ भक्ति हवय,जेन भी तेमा राजी।
रखके मन संतोष,रखन मन नहीं नराजी।।
सपना में पर दोष,देखय झन आँही-बाँही।
अपन बाट मा जान,करय कोनो हर काँहीं।।
7/
नवम भक्ति अनुसार,सहज हो पानी जइसे।
तजन कपट छल चाल,रहन प्रभु चाहै तइसे।।
रहि भरोस भगवान,एक अउ दूसर नाही।
मन मा रखन न दु:ख,रीस सुख लालच
काँही।।
शोभामोहन
रोलाछंद-शोभामोहन
श्रीवास्तव
नवधा भक्ति
1/
प्रभु नौ बरन
बताय,भगत बर रेंगे धरसा।
ओमा जा रे जीव,अभरही किरपा
बरसा।।
होही ईश दयाल,मया के दिहे
चिन्हारी।
नवधा भक्ति
जगान,महा सुख तज चरियारी ।।
2/ नरतन बर नौ बाट,बताये तेमा जाबो।
दसवाँ कहूँ
धँवाय,कभू हम नइ पतियाबो।।
पहिली भक्ति
सुजान,संत के सुनबो बानी।
दूसर भक्ति
मया,कीरतन भजन कहानी।। 3/
तीसर गुरु के
गोड़,चाकरी सेवा धरबो ।
चौथा प्रभु
गुनगान,कपट तज के अब करबो।।
पंचम मंतर जाप,मया हरि जब्बर
जोरे ।
मन में हो
बिस्वास,जेन ला बेद अँजोरे ।।
4/
छटवाँ तज सब
काम,धाम के बिरथा बोझा।
काया कसन लगाम,परै झन लालच
झोझा।।
सरलग संत
सुजान,संगती धरमी चाला।
भक्ति सात के
भार,बनन सम आँखी वाला।।
5/
सबमें देखन एक,जगतपति चारो
कोती।
सबो जीव के
माँझ,बरत हे ओकर जोती।।
कहे हवय भगवान,संत ला बड़का
सबले।
सब बर वो सब
बेर,सुलभ हो जाथे रबले।।
6/
भक्ति आठ के
ज्ञान ,जेन हे तेमा राजी।
मन राखन संतोष,रहै मन नहीं
नराजी।।
सपना मा परदोष,दिखै झन
आँही-बाँही।
अपन बाट हम
जान,करै कोनो हर काँहीं।।
7/
नवम भक्ति
अनुसार,सहज हो पानी जइसे।
तजन कपट छल
चाल,रहन प्रभु चाहै तइसे।।
रहि भरोस
भगवान,एक अउ दूसर नाही।
मन मा रखन न
दु:ख,रीस सुख लालच काँही।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
धरत हस माल
अजारा (रोला)
पर के बाना
मार, पेट ला अपने देखे।
वो नइ पावय
मान,जेन नइ पर ला लेखे ।।
पइसा बर पगलाय,हवँस तँय बनके
बइहा।
पइसा मनखे बुद्धि, जान ले करथे
कइहा।।
कोन गाँव ले
आय, कहाँ हे तोला जाना।
कतका दिन के
तोर, जगत मा हवय ठिकाना।।
हाड़ा हपट रपोट, धरत हस माल
अजारा ।
सुन अंतस के
बात, जगत के करत तियारा।।
शोभामोहन
बाप कुँआ खन बीस फीट मा पानी
पाये
बाप कुँआ खन बीस,फीट मा पानी पाये।
अउ पताल ला टोर,बेटवा बोर खनाये।।
नातिन हर लुलवात,लानथे नल ले पानी।
आगू काकर भाग,काय हे हम का जानी।।
नरवा परे सुखाय,जीव सब माँगय पानी।
पानी बिन हलकान, होत हे सबो परानी ।।
लहकत मरत पियास,निहारय सुक्खा नरवा।
नइ हे मूँड़ लुकाय, छाँव अउ छान्ही परवा।।
पानी स्त्रोत अँटात,काटके रूख मनमाने ।
मूँड़ उपर हे काल, सुतव झन चद्दर ताने ।।
सब झन पेड़ लगाव, बचाये बर जिनगानी।
नइ तो मरन भँजाव, सबो झन के बिन पानी ।।
रूख रही सब ठाँव,तभे घन बरसा होही।
सुख पाही संसार,सबो जब पेड़ ल बोंही ।।
आही तभे सुकाल,सबो बर भुँइया कोरा।
पानी ला पनकाय,करव सब जोखा तोरा।।
जीव ल लेवत घाम, भड़कगे सूरज चेतव।
पेड़ लगा दू चार, नवा पीढ़ी सुख नेतव।।
सिरमिट के संसार, रचत हव आनी बानी।
थोरिक करव गुनान,सुनव अब गोठ सियानी।।
शोभामोहन
होत करेजा आज
बाप के कुटका-कुटका
(रोलाछंद)
1/
होत करेजा आज, बाप के कुटका
कुटका।
छोड़ अपन परिवार, जात हे बेटा
छुटका।।
होगिस नानुक
बात,तेन मा बहू रिसागे।
दाई किरिया
देत, दूध के तभो परागे ।।
2/
खूँटी हवय
टँगाय, एक ठन जुन्ना कुरता।
पनही माड़े आँट, करावत हावय
सुरता ।।
परछी अँगना
गाँव, गली घर सुन्ना परगे।
सुमता के
संसार, रचे छिन भर मा जरगे ।।
3/
बेटा परछो लेत, मूड़ में आय
बुढ़ापा।
जाँगर खँगगे
तभो, चलावत गैंती रापा।।
टूटिस घर
परिवार, सगा मा होत फदीता।
महतारी अउ बाप, आसरा रहिगे
रीता ।।
शोभामोहन
बोंवव पेंड़
सुजान रोला
जीव ल लेवत
घाम, भड़कगे सूरज चेतव।
बोंवव पेड़
सुजान, नवा पीढ़ी सुख नेतव।।
सिरमिट के
संसार, रचत हव आनी बानी।
थोरिक करव
गुनान ,सुनव अब गोठ सियानी।।
पेड़ रही सब
ठाँव,तभे बड़ बरसा होही।
सुख पाही
संसार,सबो जब पेड़ ल बोंही ।।
आही तभे सुकाल,सबो बर भुँइया
कोरा।
पानी ला पनकाय,करव सब जोखा
तोरा।।
शोभामोहन
बेटी उपर रोला
राखव बने सहेज,सबो झन बेटी
सेवव।
माँगय नहीं
दहेज,उही ला भाँवर देवव।।
दू कुल के
मरजाद,निभाथे बेटी मानौ।
बेटी जगत अधार,सहज झन मनखे
जानौ।।
भौंरा उपर रोला
महर महर ममहात,मोंगरा के फुलवारी।
भँवरा गंध
नहाय,मगन हो मुचकत भारी।।
चुहके झोर
अघाय, सुनावत मया तराना।
झुमरत लठरत
देख,संभारत डारा पाना।।
शोभामोहन
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