Thursday, 16 March 2023

रूपमाला छन्द मदन छन्द

 

 

*रूपमाला छन्द (मदन छन्द)*

रूपमाला रूपमाला, रूपमाला रूप

लाललाला लाललाला, लाल लाला लाल

(१)

डोंगरी ले अधर जइसे, कस गिरै बनफूल।

तस तहूँ अधरे हवस तन, ये कभू झन भूल।।

चूमथे जे पवन फुलवा, गंध ला बगराय ।

फेर टूटत देख डारी, दै वहू मिटकाय ।।

 

हे लुकाये सार (मदन छन्द)

रूपमाला रूपमाला, रूपमाला रूप

ये जगत अइसे किसम के,हे रचे करतार ।

बोदरा खखरा दिखत अउ,हे लुकाये सार ।।

सार हावय देह आत्मा,फेर दिख नइ पाय ।

देह भिन्ना ला नसनहा,तो सबो पतियाय ।।

प्रभु हरै सब लोक मुखिया,नइ दिखै जग खार।

अउ रचे ओकर प्रकृति भर,देख दिखथे झार।।

लोक जम्मो अउ धरातल,हे कुलुप अँधियार।

जग अँजोरन सूर्य चंदा,हे रचे करतार।।

शोभामोहन

मोर बिन अँधियार हे जग (रूपमाला छंद)

बाँहबल सबला सिरजथौं, मैं न मानँव हार ।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

गाँव कस्बा अउ शहर मा, मोर मिहनत सार ।

गौंटिया सब सेठ दाऊ, मोर करजादार ।

बीन काँटा खेत जोतौं, घाम मा अइलाँव ।

पेट भर सब ला खवाके, लाँघने सुत जाँव।।

मोर मिहनत ले चलत हे, जान लौ संसार ।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

मैं कछोरा भिर कमाके, साँझकुन घर आँव ।

उठ पहट दिनभर खँटौं मैं, नइ चिटिक सुस्ताँव ।।

देख लौ सुख मा नहीं हे, मोर कुछु अधिकार।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

मोर सिरजाये महल मा, भोगथौ सुख भोग।

मोर कुरिया देख छितका, कब मरे हौ सोग।।

कारखाना मा गिराथौं, मैं पसीना धार ।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

शोभामोहन

 

मोर बिन अँधियार हे जग (रूपमाला छंद)

२१२२ २१२२, २१२२ २१

(१)

बाँहबल सबला सिरजथौं, मैं न मानँव हार ।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

गाँव कस्बा अउ शहर मा, मोर मिहनत सार ।

गौंटिया सब सेठ दाऊ, मोर करजादार ।

(२)

बीन काँटा खेत जोतौं, घाम मा अइलाँव ।

पेट भर सब ला खवाके, लाँघने सुत जाँव।।

मोर मिहनत ले चलत हे, जान लौ संसार ।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

(३)

मैं कछोरा भिर कमाके, साँझकुन घर आँव ।

उठ पहट दिनभर खँटौं मैं, नइ चिटिक सुस्ताँव ।।

देख लौ सुख मा नहीं हे, मोर कुछु अधिकार।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

(४)

मोर सिरजाये महल मा, भोगथौ सुख भोग।

मोर कुरिया देख छितका, कब मरे हौ सोग।।

कारखाना मा गिराथौं, मैं पसीना धार ।

मोर बिन अँधियार हे जग, मैं हरौं बनिहार ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर छ.ग.

 

ईश के गुन गाँव

रूपमाला रूपमाला, रूपमाला रूप

नानकुन भूलोक कुटका, राज जेकर आज।

तेन ला काबर रिझाहूँ, छोड़ जग महराज।।

देह मनखे के मिले हे, भाग ला सहराँव।

गीत के बरदान पाके, ईश के गुन गाँव।।

जेन सत्ता हा उसल के, ताश कस गिर जाय ।

माथ ओला नइ नवावौं, प्रभु परम बिसराय।।

चर अचर पति शरण गति बर,छोड़ के जग जाँव।।

गीत के बरदान पाके, ईश के गुन गाँव ।।

साध के बिरवा जगाके, दुख नहीं परघाँव ।

जानथौं रखथे पिया हर, तो हथेंरी छाँव।।

चाकरी जग के करत नइ, छिन पहर बिसराँव ।

गीत के बरदान पाके, ईश के गुन गाँव ।।

शोभामोहन

रूपमाला रूपमाला, रूपमाला रूप

2122 2122, 2122 21

(१)

देह मनखे के मिले हे, भाग ला सहराँव।

गीत के बरदान पाके, ईश के गुन गाँव।।

नानकुन भूलोक कुटका, राज जेकर आज।

तेन ला काबर रिझाहूँ, छोड़ जग महराज।।

(२)

जेन सत्ता ताश पत्ता, के असन गिर जाय ।

माथ ओला का नवावौं, प्रभु परम बिसराय।।

चर अचर जम्मो जगतपति, के शरन मे जाँव ।।

गीत के बरदान पाके, ईश के गुन गाँव ।।

(३)

साध के बिरवा जगाके, दुख नहीं परघाँव ।

जानथौं रखथे सजन सुख, मा हथेंरी छाँव।।

चाकरी जग के करत छिन,भर नहीं बिसराँव ।

गीत के बरदान पाके, ईश के गुन गाँव ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

०३/०६/२०२०

खुश्बू विहार

 

दुख नँगत सपड़ाय

रूपमाला रूपमाला रूपमाला रूप

दुख बगर के सुख डहर के, बाट ला भुलुवात।

कोन कोती जाय बर मन, कोन कोती जात ।।

भोरहा का होत हावय, कुछु समझ नइ आय।

सुख सधाये रेंग सब दिन, दुख नँगत सपड़ाय।

कोन दुख ला नेवतत हे, कोन हे परघात ।

बिन बलाये बिन चलाये, ते अपन हो आत ।।

चीज बस मा रूप रस मा, जेन हे भरमाय ।

सुख सधाये रेंग सब दिन, दुख नँगत सपड़ाय।।

नाम जस के लोभ फँसके, हे नरी कसवात।

सुख सुभीता ला सिधो के, मन हवै बहलात।।

लाग नत्ता राज सत्ता, पद बइठ बइहाय।।

सुख सधाये रेंग सब दिन, दुख नँगत सपड़ाय।।

सोत सुख के जीव जाने, रहि गये छुछुवात।

प्रभु लहर के सुख डहर के, अनसुनी कर बात।।

रंग मन ला रंग तन ला, बड़ गरब पनकाय।

सुख सधाये रेंग सब दिन, दुख नँगत सपड़ाय।।

शोभामोहन

 

दुख नंँगत सपड़ाय (रूपमाला )

(१)

दुख बगर के सुख डहर के, बाट ला भुलुवाय।

कोन कोती जाय बर मन, कोन कोती जाय ।।

भोरहा का होत हावय, कुछु समझ नइ आय।

सुख रपोटे रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।

(२)

कोन दुख ला नेवते हे, कोन हे परघाय ।

बिन बलाये बिन चलाये, ते अपन हो आय ।।

चीज बस मा रूप रस मा, कोन हे सुख पाय ।

सुख रपोटे रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।।

(३)

नाम जस के लोभ फँसके, कोन हे सुख पाय।

सुख सुभीता ला सिधो के, मन भले बहलाय।।

लाग नत्ता राज सत्ता, पद बइठ बइहाय।।

सुख रपोटे रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।।

(४)

सोत सुख के बिगन जाने, सब डहर छुछुवाय।

प्रभु लहर के सुख डहर के,बात सुन नइ पाय।।

रंग मन ला रंग तन ला, बड़ गरब पनकाय।

सुख सधाये रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।।

शोभामोहन

खुश्बूविहार कालोनी

 

 

 

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