Thursday, 16 March 2023

सखी छंद

 

घर हर बने अखाड़ा रे

(सखी छंद)१४,१४अंत २गुरू

पोती पतरा पढ़ ले रे ।

अँधियारी ले लड़ ले रे।

छाही रिगबिग उजियारी।

छूट जही मारा-मारी।।

बस बंदूक चलाये रे ।

बोले ना बतराये रे ।।

बिरथा जनम पहाये तैं ।

होती ला बिसराये तै ।।

केती तोला जाना हे ।

बाट सबो अनजाना हे।।

गुरुवर हर घंटाला हे।

बिगड़े तोरो चाला हे।।

गा झन दूसर गाना ला।

मार न ककरो बाना ला।।

सबके एक घराना रे।

का हँड़िया अलगाना रे।।

ऐके जइसे हाड़ा हे ।

खून माँस तन माड़ा हे ।।

भरे भेद मन गाड़ा रे ।

घर हर बने अखाड़ा रे ।।

छोड़ छटक छटियाये ला।

सीख मया सँटियाये ला।।

तात लहू अँटियाना रे।

बिरथा ला बटियाना रे।।

शोभामोहन

 

 

मन हर रचे बियारा हे ।

सुख दुख करपा भारा हे ।

जिनगी मिले अजारा हे ।

सुख दुख हारीहारा हे ।।

कोनो करत गुजार हे।

कोनो करत तियारा हे ।।

पानी हे ना चारा हे।

रुखराई ना डारा हे।।

चढ़त उतरत पारा हे।

नदिया हे ना धारा हे।

ओद्दा नहीं किनारा हे।।

होवत फकत गुजारा हे ।

दुबके कस हुँकारा हे ।

मीठ मया हर खारा हे।

सुक्खा दूनो किनारा हे ।।

भूख कहत भंडारा हे।

दुख बोहात सतधारा हे।।

निकले पहट सितारा हे ।

अमरित करसा ढारा हे ।।

शोभामोहन

०३/०२/२०२१

पाटन

 

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