फेर जनम बर फूल चढाहूँ (सार
छंद )
1/
फेर जनम बर फूल चढ़ाहूँ ,फेर माँगहूँ
तोला।।
धन्य लगत हे धराधाम मा , ए माटी के चोला
।।
2/
उड़न गोठ का करँव भरोसा
, पीयँव तोरे
मानी ।
गमकत आस भरोसा जागत , बनगे
हस जिनगानी ।।
3/
दमकय माथा, चमकय बिंदिया , मगन
रहय मन भारी ।
कारी मोती फूल सोनहा , अछत सुहाग चिन्हारी ।।
4/
टिकली चूरी लाल महाउर, जिनिस भले मनिहारी
।।
इही सवाँगा सजवन पहिरे, भाग
जगय बड़
भारी।।
5/
आँसू छलके पाँव पखारन, आखर
गिल्ला होगे
।
संग साथ मा लागत अइसन, सब सुख मिलगे
भोगे ।।
6/
तोर डेरउठी चौंखट चूमे , कोनो सुख नइ चूके
।
जिनगी आज जिये कस लागत
, तोर चरन
ला छूके
।।
7/
कहे जोग ला जग ले कहिथँव, असली बात लुकाथँव ।
जब ले अंतस लगन लगे हे , सरग
असन सुख पाथँव ।।
8/
सोन सवाँगा तन के करथे,मन
ला मया सजाथे ।
आरुग मया बिगन स्वारथ के, पाथे वो गुन गाथे ।।
शोभामोहन
आगे हावय राखी
1/
सावन महिना बड़ मनभावन,आगे हावय राखी ।
मन हँसा ला लगगे हावय ,सुघर सोनहा पाँखी ।।
2/
रहि रहि बाट निहारत बहिनी ,आवत होही भाई
।
रोटी पीठा
रंग
रंग
के
, राँध भेजही
दाई ।।
शोभामोहन
●अंतस भेंट करा दे (सार छंद)●
हिरदे आसन
बइठे प्रभुवर अनुचित उचित बता दे।
जीव कुबाट तजा
दे अब तो,जिनगी हमर सजा दे।।
चिखला माते
मोह मया के,गंगा जमुन बना दे।
करँव समर्पित
नानुक जिनगी,भाव भगति उमड़ा दे।।
सरधा आरुग
जागै भगवन,सुमिरन चुलुक लगा दे।
जग फुलवारी
गमकत भारी,करके दया नहका दे।।
भीतर के भंडार
ल भेंटौं,मन के गति बहका दे।
अपन हृदय के
पाछू दँउड़ौ,अंतस भेंट करा दे।।
शोभामोहन के
कलकुत सुन,रद्दा सोझ सुझा दे।
पापी हे चोला
हर जानौं,पाप सबो बिसरा दे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२२/०५/२०२१
●बिरहगीत सार छंद●
मखमल जइसे भाव दसाये, फूल पान
बगराये ।
बिरहिन बइठ अगोरै
सँइया, छिन-छिन आस लगाये ।।
जिनगी मा सुख
रंग भरे बर , मधुरस मन मा घोरे ।
अपन जान के सुरता करके,चुटकत आस ल
जोरे ।।
लठरत झुमरत रुखराई
मन, नार ब्याँर गहदागे ।
अलग डार पिकरी
न पको अब, सावन के दिन आगे।।
परत फुहारा भींजत चोला , अंतस दहकत आगी
।
तन के महल अटारी रहिके, मन होगे दू बागी
।।
मन तड़फय जीव
कलपय गउकिन, ककरो गोठ न भावै ।
नैन ओरवाती कस
टपके, जब - जब सुरता आवै ।।
शोभामोहन
सबो डहर ले
छेंके रहिबे, तभो जव इया जाही।
जुगुत काम नइ
आही।।
सुध के कतको
दीप जलाबे,बेर लहुट नइ पाही।
जुगुत काम नइ
आही।
कतको किरिया
कोस खवाबे, देवत मया गवाही।
जुगुत काम नइ
आही।।
आँसू ढारत नइ
भेजौं कहि, होबे आहीं बाँही।
जुगुत काम नइ
आही।।
कतको सँभरे
चुटुक चँदैनी, पढ़ही पाठ कलाही।
जुगुत काम नइ
आही।।
ठगे असन सब
ठाढ़े रहिहौ, बेरा आही जाही।
जुगुत काम नइ
आही।।
शोभामोहन जेकर
डेरा, जब ईश्वर उसलाही।
जुगुत काम नइ
आही।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
०४/०५/२०२१
मैं तोर हाथ
के पुतरी, बिधाता मोर मैं तोर हाथ के पुतरी।।
तहीं चलाथस
तहीं हलाथस,नचवाथस धर सुतरी। बिधाता मोर।।
मैं तोर हाथ के
पुतरी।
मैं जन्तर औं
अउ तैं जन्त्री,तोर धुन बाजत बँसुरी। बिधाता मोर।।
मैं तोर हाथ
के पुतरी।
तोरे बल सब
गुन धन पुन प्रन,बिनय बिबेक व चतुरी। बिधाता मोर।।
मैं तोर हाथ
के पुतरी।
कर्ता भर्ता
धर्ता हर्ता,लिखइया भाग के पतरी। बिधाता मोर।
मैं तोर हाथ
के सुतरी।
शोभामोहन गावै
मन मन,सुमिरन हो झन अतरी। बिधाता मोर।
तैं मोर हाथ
के सुतरी।
शोभामोहन
३०/०४/२०२१
"भज मन प्रभुवर एक सहारा"
सिरतो बंधन
हरि ले हावय, जग ले करे गुजारा।
जीव बुलत जग
में डर डर के,निर्भय ईश सहारा।।
भज मन प्रभुवर
एक सहारा....
काया खूँटा
निचट बँधाये,जीव करे छुटकारा।
लोकलाज ला तीर
मढ़ा दे,होवन सुखी अजारा।।
भज मन प्रभुवर
एक सहारा....
उटकट जग के
रीत जनाथे,उटकट टोला पारा।
मर्मर धुन
संगीत लहर में,सुमिरत करन तियारा।
भज मन प्रभुवर
एक सहारा...
मन ला चोला
बाँध न पावै,उड़ चल बन बंजारा।
सुंदर सुंदर
गुन उदगरही,मया करत बढ़वारा।।
भज मन प्रभुवर
एक सहारा...
शोभामोहन
०२/०५/२०२१
मनौना गीत
काबर रोथस
लाला काली, घुनघुन्ना मँगाहूँ रे।
तै झन रो रे
आँखी तारा, घुनघुन्ना मँगाहूँ रे।।
चुप तो हो जा
राजदुलारा, घुनघुन्ना मँगाहूँ रे।
झन रो रे बाबू
सतधारा, घुनघुन्ना मँगाहूँ रे।।
भेज कहूँ ला
मैं हठवारा, घुनघुन्ना मँगाहूँ रे।
काबर रोथस
लाला काली, घुनघुन्ना मँगाहूँ रे।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
१७/१२/२०१९सोंढ़
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।सुमर सुमर सुखरासी।।
मालिक महल करत
बनिहारी,मन घर करय निवासी।
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।।
मालिक महल
तिजौरी देखौं,आवै झन ललचासी।
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।।
मालिक लरिकन
पालौं पोंसौ,राखौ भाव उदासी।
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।।
मालिक धनहा
डोली बोवौं,कोड़ौं करौं बियासी।
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।।
पेट पीठ बर
जाँगर पेरौं,अउ न परौं गरफाँसी।
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।।
शोभामोहन करत
तियारा,जपन करौ दुखनासी।।
प्रभु जग तोर
रहौं बन दासी।।
शोभामोहन
३०/०४/२०२१
साँसा के आवाजाही में, भरम जिये के होथे ।
अउ अंतस
किरवार करे बिन,
कलप कलप के
रोथे ।
भटकत
गिंजरत भरमाये मन,
जतका साध
सकेले ।
अलहन ले
अंजान बने अउ,
जीयत भर
दुख झेले ।।
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शोभामोहन
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बिरहिन बइठ
अगोरत सँइया (सार छंद)
1/
मखमल जइसे भाव दसाये ,
फूल पान
बगराये ।
बिरहिन बइठ अगोरे सँइया ,
छिन - छिन आस लगाये ।।
2/
जिनगी मा सुख रंग भरे बर ,
मधुरस मन मा घोरे ।
अपन जानके सुरता करके ,
चुटकत आस ल जोरे ।।
3/
लठरत झुमरत रुखराई
मन,
नार ब्याँर
गहदागे ।
अलग डार पिकरी
न पको अब ,
सावन के दिन
आगे ।।
4/
परय फुहारा भींजय चोला ,
अंतस दहकय आगी ।
तन के महल अटारी रहिके,
मन होगे दू बागी ।।
5/ मन तड़फय जी कलपय गउकिन ,
ककरो गोठ न
भाये ।
नैन ओरवाती कस
टपके,
जब - जब सुरता
आये ।।
शोभामोहन
[24/08, 10:51]
जिनिस भले मनिहारी ।।
इही सवाँगा सजवन पहिरे ,
भाग जगय बड़ भारी।।
आँसू छलकत पाँव पखारन ,
आखरगिल्ला होगे ।
संग साथ मा लागत अइसन,
सब सुख मिलगे भोगे ।।
तोर डेरउठी चौंखट चूमे,
कोनो सुख नइ चूके ।
जिनगी आज जिये कस लागत ,
तोर चरन ला छूके ।।
कहे जोग ला जग ले कहिथँव,
असली बात लुकाथौं।
जब ले अंतस लगन लगे हे,
सरग असन सुख पाथौं ।।
सोन सवाँगा तन के करथे,
मन ला मया सजाथे ।
आरुग मया बिगन स्वारथ के,
पाथे वो गुन गाथे ।।
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