बहत नदी
(रेणकी छंद)
बड़ कलकल कलकल, छलछल छलछल, निरमल निरमल
बहत नदी।
कर दिनकर उजवल, झलमल झलमल, हिलत पवन बल, रहत नदी।
टुरियन दल के
दल, पनघट गम चल, गगरी भरत जल, बहत नदी।
नाहवत बड़ मल
मल, पहिरत मखमल, मुतियन ढल ढल, बहत नदी।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
बहत नदी
(रेणकी छंद)
बड़ कलकल कलकल, छलछल छलछल, निरमल निरमल
बहत नदी।
कर दिनकर उजवल, झलमल झलमल, हिलत पवन बल, रहत नदी।
टुरियन मन दल
बल, पनघट गम चल, गगरी भरत जल, बहत नदी।
नाहवत मल मल, पहिरत मखमल, मोति म ढल ढल, बहत नदी।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
१७/०८/२०२०
४/रेणकी छंद
(मन के गति)
मन झपकत पलक
जगत गिंजरत अउ,
चटकत फकत बिषय
कर हे ।
समझत नइ अशुभ
व शुभ बन बरकस,
टरकत बिदक करत थर
हे ।
सब बिषयन डहर
लहस मन लपकत,
मग अहलन डहर
चलत भर हे ।
मन कस नइ
अजब-गजब नटखट जग,
भटकत-अटकत
चर-चर हे ।
शोभामोहन
१३/०१/२०२०
रेणकी छंद
छत्तीसगढ़ी
सत्य सनातन
बाकी झूठ
जब नभ नइ
अलग-बिलग रबि शशि तब,
धरम ला अलग करव झन
रे।
जब अन नइ
अलग-बिलग जल तरुवर,
भरम ल मगज भरव
झन रे ।
जब तन नइ अलग
रुधिर नस दँउड़त,
परचम अलग धरव
झन रे ।
जग सुख बर बरम
रचिस यह जग सुन,
चरम म अलग चरव
झन रे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर
छत्तीसगढ़
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