Wednesday, 15 March 2023

आल्हा छंद छत्तीसगढ़ी

 

काकर काकर टहल नइ करिस, चोला बिन बनिहारी पाय।
सुख दुख दूनो पल्ला मलकत, अब जनास ला कोन बताय ।।

ड़ी करत हे चारी मोर,
पूछत हे महतारी मोर ।
घेरीबेरी ओखी करके
काला देखे जाथस खोर ।।

अर्धाली भर हवय रचाय

 

रस भीझें सब गोठ बात के,बरफ असन सुध टघलत जाय ।

आँखी हर गंगा बन धोवत,सब झन के चिखला छटकाय।।

दुख पीरा के महाकाव्य के,अर्धाली भर हवय रचाय ....1

आस छूतहा गोठ दोखहा,भाव पार बाँधे नइ पाय ।

उटकट होये मया बंधना, मन हतास नइ जगत सुहाय ।।

दुख पीरा के महाकाव्य के,अर्धाली भर हवय रचाय.. ..2

बोलत देंह लुकावत आँखी,पीरा फुलवारी गमकाय।

मिरगा लहरा देख दँउड़थे, हाड़ा हपटत दुख परघाय ।।

दुख पीरा के महाकाव्य के,अर्धाली भर हवय रचाय ....3

बेरा हर बिन छुए न बुलकै जागौं चाहे रहौं मताय ।।

अनबन टूटत देख मगन मन,गरज सुनता बाँधे आय ।

दुख पीरा के महाकाव्य के,अर्धाली भर हवय रचाय.....4

अइलागे हे मन बृन्दावन,घिरलत काया जगत चलाय ।

साध बने हावय धुरनागीपर ला दोस लगावत जाय ।।

दुख पीरा के महाकाव्य के,अर्धाली भर हवय रचाय.... 5

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

31/01/2020

 

 

मनुखबाहिर मनखे(आल्हा)

घात लगावै शेर शिकारी , प्रकृत प्रदत नख दाँती पाय ।

पेट भरे बर ओ जंगल मा, गोली ना बंदूक चलाय ।।१।।

अपन बाँह बल कर शिकार वो, तो बन के राजा कहलाय ।

जीव जंतु तक प्रान बचाये, ईश दिये हे शक्ति पाय ।।२।।

अपन शक्ति ले आन जीव ला, कहूँ जिनावर हर जब खाय ।

नख दाँती ताकत गति के बल, खाय जोग जीव मार गिराय ।।3।।

फेर मनुखबाहिर हो मनखे, प्रकृति संग करत खिलवार ।

रूँआ खने के सक न इ तेला, मारत कर विरुद्ध व्यवहार ।।

शोभामोहन

३०/०४/२०२०

 

 

आल्हा

मरुआ धरके कोन चलाथे, काया राखे अंतस प्रान ।।

माटी सोंखत पवन अगन जल, लहुटावत दुगना कर दान।।

बादर ला पटकत भुँइया मा, सुरुज नरायन हर भन्नाय ।

बरसत हावय रटरट-रटरट अबड़ पवन सँग हे सन्नाय ।।

मया महल मा रोवत नत्ता अलट पलट के झाँकत खोर।

उवत बूड़त आस लगावत, आही कब ते बंधन टोर।।

 

 

सीख

गारी मनके बारी पहिरे  चारी सुन मुस्काये सीख।

पीरा मन बर रोय भुलाके,  पीरा मन ला गाये सीख ।।

सब्बो सुख मा आड़ परे हे,  बुलके सुख ला पाये सीख ।

बइहापन मा गजब मजा हे,  कभू कभू बइहाये सीख ।।

शोभामोहन

२७/०१/१९

 

सार बात ले दूरिहा जात आल्हा

 

घाम नेवतत हे लखटकिया, ररुहाँ छाँव उवाटत जात ।

अपन गरज ला जम्मो जोमत, पर के दुख नइ मन टघलात ।।

 

खंड़ित मंडित करके पंडित, पोथी पतरा बाँच बतात ।

फोकट ग्यान बघारत हावय, सार बात ले दूरिहा जात।।

 

मनखे के हुसियारी देखव, जानत नइ तेला अरथात ।

खसलत उम्मर रचड़ावत तन, काया माया देह चलात ।

 

चक्करभँउरी मन नइ छोंड़त, सार फोकला समझ न आत ।

रेंगत बोलत-चालत हाँसत, फेर न जानै कोन चलात ।।

 

 

 

सोर संदेशा लेवय कोन

कहे सुने ले बात बाढ़ही,  चुप्पे रहिबे सुख ला पाय ।

दू दू ईटा सबो मड़ाही, नत्ता भितिया माँझ उठाय ।।

तातारोसी बात बिगाड़े, सुघ्घर घर ला देवै टोर।

राइल कस्सा करू नत्ता मा,  कोन सके हे मधुरस घोर।।

अहमइती हर जबर भोगागे,  लदका गे जब चाँदी सोन।

बेरा नइ हे तीर काकरो,  सोर संदेशा लेवै कोन ।

शोभामोहन

१४/०१/२०२०

 

कोन 

 

माटी के सिरजइया कोन बादर सुघर रचइया कोन ।

भीतर के जहरा घट पलटा अमृत बूंँद भरइया कोन ।

मया दया बरसइया कोन थरहा सुख देवइया कोन ।

अंतस मा आगी सिपचा के, जूड़ करै पुरवइया कोन ।

हाथ छोड़ाये सुख ला धरके जिनगी ला सुघरइया कोन ।

आँखी के कलजगरी पन के, डीठ नजर उतरइया कोन ।

ये अबूझ जिनगी गनित ला चुटकी मा सुलझइया कोन ।

देह म उपके कजरी पढ़के  पूछय नहीं ठठइया कोन ।।

पहिली किरण छुवइया कोन उपबन बाग सजइया कोन ।

ड़ोगर ला मूड़ी मा धरके, नभ मा नील पोतइया कोन ।

आरुग भाव जगइया कोन मुक्कापन समझइया कोन ।

पाँखी रंग सुआ के रंगके, कोईली असन गवइया कोन।

करुणा कर टघलइया कोन सुघ्घर परस करइया कोन ।

माया के परपंच काटके, अंतस ला दमकइया कोन ।।

सबो सेवाद जनइया कोन  रंग गंध बगरइया कोन ।

सबो जीव के थाम्हन बनके, अजगुत करम करइया कोन ।

लाली चूनर ओढ़इया कोन हरदी के चुपरही कोन ।

जल थल नभ के पार पिया हे  बिरहा अगन बुतइया कोन

शोभामोहन

 

जग के नता बनत के ताय

जग के नता बनत के ताय ।

 

पतझड़ के डारी खाँधी मा,

नहीं बसंती फूल खिलाय। जग के नता बनत...

बन के अगन बढ़ा पुरवइया,

तुलसी चौंरा दिया बुताय।। जग के नता बनत..

प्यास बुतइया पानी बिफरै,

सँउहत काल रूप बन जाय। जग के नता बन..

रात अँधेरी बजनी बाजे,

उवत सुरुज वो दिया बुताय।जग के नता बनत.

जड़कल्ला पिछलग्गा किंजरै,

कुहुक घरी वो रबि गरियाय। जग के नता बनत

चंदा जोहत अरग देवइया,

भादो चउथी फिरै लुकाय।जग के नता बनत

गरज परे मा पाँव पखारैं,

पाछू न इ चिन्हय गोठियाय। जग के नता बनत

 

शोभामोहन

30/01/2020

 

 

आल्हा

बेरा डंगनी अकन बचे हे, अउ जाना हे अबड़ दूर ।

अँगना के गोंदा मोंगरा मन आँखी मा नावत हे धूर।।

चरचर ले फूले ममहावत, फूल झुमर के तीर बलाय।

मन बहमतिया असन लगत अउ बिगन पंख अंबर छू आय ।।

गमक लुटावत पवन फिरत हे, मन के बंधना बोचक जाय ।।

मया म मुहरन पूजे जावत, लोग कहत का धर लिस बाय ।।

शोभामोहन

 

 

ऊर्जा आल्हा

जेवन सेवन देवय ऊर्जा, नींद सुते ले अउ सकलाय।

जागे ले उरकै यह ऊर्जा, प्राणायाम जगावत जाय।।

धारन ले माँझा मा आवै, ध्यान करे ले उपर जाय।

डर भय शोक अउ संसो में, ऊर्जा सिकुड़त छप्पन बाय ।।

काम बियाथे साध जगाथे, तेकर ऊर्जा खसलय हाय।

पिरित मया ले ऊर्जा पसरै, अउ अंतससुख प्रान बढ़ाय।।

बइठै समाधि तेला ऊर्जा, परमप्रभु ले मेल कराय।

हो विराट ले एकमइ ऊर्जा, हो परमातम लीन थिराय।।

शोभामोहन ऊर्जा के गुन, गावत अउर बतावत जाय ।

जगतिक ऊँचहर सुख पाये बर, जानौ ठउका डउल लगाय ।।

शोभामोहन

 

 

 

रूपसी सुघरइ के बखान (आल्हा)

 

कमलताल मा नहा खोर के, गोरी अंग सुंगध लगाय।

कस्तुरी मिरगी बासा ले, जेन ठउर सबदिन ममहाय।।

गोंटी फेंकत हे पानी मा, अपन रूप ला देख लजाय।।

कमल बियइया तरिया पुरइन, पाना छछले मणि लुटाय।।

चूँदी मा माढ़े जलबुँदिया, मोती चटके असन जनाय।

चन्दरबदनी निर्मल चोला, नर गर ले गहना ओरमाय।।

गरु कान के हवय झुमका, लटकत भार सहे नइ जाय।

पहिर कनौती जड़े जवाहर, घेरी बेरी हे खसकाय।।

पटा पछेला चूरी पहुँची, बेनी खोंच चमेली जाय।

गूँथ मोंगरा के बेनीफूल,हीरा पन्ना झूल बलाय।।

नागमुड़ी के चूरा पहिरे, कनक देह मा कनक जगाय।

मोती मणि जड़ाये कंगन, सोन सँभारे लाख भराय।।

लुगरा लहरा झलमल अँचरा, मया मताये नैन लजाय।

बेनी फूल सजे चरचर ले, गजरा झाबा सुघर गँथाय।।

लुगरा पटुका लाली पिंउरा, रगरग भरे माँग सेंदूर ।

मूँड़ ढ़ाक के रखे चुन्दरिया, नहक किरन चूमत भरपूर।।

हवय तिहार मनावत आँखी, दूसर कहूँ ओरख नइ पाय।

रूप रंग के रस लूटे बर,साझ होत सजना लोरियाय।।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

२१/०१/२०२०

 

शीतल गंग सुगंधित जल ले, लइका ला मइया नहवात।

कस्तुरी अउ चंदन चिक्सा, मल मल सुघ्घर देह लगात।।

उज्जर वस्त्र विभूषित भूषण, लकलक ले संभरा सिंगार।

पुन्नी के चंदा कस दग ले, मुख मंड़ल बगरे उजियार।।

मोहत नैनन बैनन चैनन, थकत न आँखी रूप निहार।

काँपत जेकर देखे रक्सा, दर्शन टारत भोग विकार।।

सतसंगी ला पार लगावत, भक्तन के सँउहत रखवार।

शोभामोहन के सुखदेउक, भवाटवी कर ड़ोगा पार ।।

 

 

शोभामोहन श्रीवास्तव

 

 

रकत सनावत हवय तिहार।

 

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

हमर चुने अगुवा सरकार।।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

भारत टोरे करत बिचार।।

जोंमत तेला खेद बिदार।।

हमर चुने अगुवा सरकार।।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

कँउवा मन ला परघावत हें,

देत कोयली जेन बिदार।।

हमर चुने अगुवा सरकार।।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

फूल टोर के रमजत हावँय,

टोर हाथ उनकर बइठार।।

हमर चुने अगुवा सरकार।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

बंगबंग बंगबंग बारत हाँवय,

जे दूसर के घर ब्यापार।

हमर चुने अगुवा सरकार।।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

धुँगिया उड़त हवा में जहरा

पथरा मारत होश बिसार।

हमर चुने अगुवा सरकार।।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

कुकुर घेर डारे हे बछरू,

धरौ रुद्र हिन्दवा अवतार।

हमर चुने अगुवा सरकार।।

घरघाती ला चिन्ह के मार।।

शोभामोहन

 

 

आल्हा

बुलत घाम सगा कस आत।

 

गमकत मधुबन लहलोट मन,सोन किरन के सूती खात।

बरसत ओस गगन रतिहा कुन,काँदी उपर ओस कुढ़वात।।

अमरित टपकत बूँद बूँद मा,रसभीजे डारी लहरात।

फूल पान ले नाचत डारा,हाँसत गावत खुशी मनात।।

गुँजन कर कर निरघट भौंरा,कली कली के तीर लोरियात।।

अमरइया के घन छँइहा हर,सरगलोक के सरीख जनात।

कुलकत राजहँस सरवर भर,दृश्य देख के नैन जुड़ात।

जाड़ समावत सुरसुर सुरसुर,बुलत घाम सगा कस आत।।

 

शोभामोहन

 

जिनिस नसाये सकै न कोनो, कतको मारै जब्बर मार ।

नाम रूप ला रकम रकम ले, हवय भले बदले अधिकार।।

फूल समझ के अंँगरा चूमै, जे होके निच्चट मतवार।

नाम धाम के साध अमिट हे, ओकर जानव बेड़ा पार।।

 

शोभामोहन

 

भगवान श्रीहरि स्तवन

 

रतन जड़ाय सिंहासन सुमिरौ करौं कमल दल अष्ट गुनान।

हर दल ॐ नमो नारायण' अष्टाक्षर मन्तर धर ध्यान।।1।।

आठ कमल दल ऊपर बइठे,कोटि कोटि चन्द्रमा समान।

रूप चतुर्भुज विष्णु देवता,सरलग डउल लगावौं ध्यान ।।२।।

सबो हाथ मा अस्त्र शस्त्र प्रभु,शंख,चक्र अउ गदा सुहात।

आँखी फूले कमल असन अउ,सुरुज जोत जग दिव्य जनात।।३।।

सब शुभ लक्षण हावय सोहत,अंग दिव्य अत्तर ममहाय।

छाती मा श्रीवत्स चिह्नारी,कौस्तुभमणि माला झमकाय।।

कन्हिया कसे पीताम्बर सुघ्घररूप दिव्य श्रृंगार सजाय ।

दिव्य फूल के गर भर माला,चर्चित चन्दन लेप लगाय।।

अक्षमाल बनमाला पहिरे,कोमल तुलसी दल टँकवाय।।

सौ करोड़ ले कतको आगरबाल सुरुज कस रूप जनाय।।

डेरी भाग बिराजत लक्ष्मी,तोला हिरदे अपन बसाय।

शोभामोहन करत वंदना अपन परमप्रभु मया गढ़ाय।।

 

शोभामोहन

२०/१२/२०२०

 

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ईश्वर की प्रशंसा

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१/

राजा के दरबार पधारिस, एक बड़े कविवर गुनवान ।

मार बड़ौना राजा-रानी, करे लागिस सुघ्घर गुनगान ।।

२/

सुनत बड़ाई गरब भरत मन, अहमइती बाढ़त मुसकात ।

अपन राज के सबले गुनधर, मंत्री लकठा राउ बलात ।।

३/

जे मंत्री ले पूछे बिन नइ, राउर करै कभू कुछु काम ।

कविवर ला देये बर कहिथे, दान उचित तोसे परिनाम ।।

४/

मंत्री गुनिया गजब सोंच गुन, जचे बात मन अपन बताय ।

भरे सभा मा गुनधर कवि ला,कहिथे पनही पाँच लगाय।।

५/

राजा मंत्री सभा बइटका, मंत्री ला देखत बक खाय ।

कवि गुनान करत डर्रावत, कइसन कलजुग गइस खराय ।।

६/

जूता खाके कवि निकलगे, मंत्री बर मन में भर रीस ।

भंडारे बिन नइ छोड़व रे,कहत चलत हे दाँती पीस ।।

7/

अपन सुवारी मंत्री बतावत, गुनधर कबि ले करे नियाव

मंत्री के घरवाली चेंधत, काबर अइसन करेव बताव ।।

8/

भरे सभा मा गुनधर कवि के, काबर करवायेव अपमान ।

दूनो परानी बोलत चालत,सुनत सपट के कवि दे कान ।।

9/

मंत्री बोलत सरसतिया के, बेटा कवि अबड़ गुनवान ।

फेर नठावत राजा राठी, मंत्री संत्री कर गुनगान।।

10/

कंठ कोयली असन पाय हे, सुंदर बुद्धि अउ हे ज्ञान ।

अपन ज्ञान के मोल न जानै, मूरख होगे हे बइमान ।।

11/

राजा के गुन गा जीयत भर, पेट पोंसही अउ परिवार ।।

पुरुस्कार पाके भठ जाही, डउल न करतिस जीव उबार ।।

12/

गुन गावत-गावत राजा के, मर जातिस रहितिस मँझधार ।

ओ कवि बर बड़ दया लगिस तव, मैं लगवायेंव पनही चार ।।

13/

जमो जगत के राजा ईश्वर,तेकर नाम न लै चंडाल ।

राजा रानी मंत्री संत्री, गुन बखान कर पावै माल ।।

14/

मनखे ला राजा समझत अउ, मनखे ला समझत भगवान ।

मनखे के चंदन बंदन कर,कबिबर लोभी बने महान ।।

15/

नानुक भुँइया के कुटका के,राजा ला देवत बड़ मान ।

सबो चराचर जगत पति बर, अउ चिटको कन नइ हे ध्यान।।

15/

ईश डहर वो पीठ करे हे, अतका सुघ्घर धर गुन ज्ञान ।

सोग लगिस तेकर सेती मैं, ओकर अंतस बेधेंव बान ।।

16/

मैं तो नानिक सजा दिये हँव, गुनधर कबि के गुन ला जान।

हरि के सुमिरन भूल करत जे, मनखे के महिमा गुनगान।।

17/

इहाँ पाँच पनही खा छूटगे, उहाँ भोगतिस नरक सुजान।

ईश्वर कोती मन बहकाये, उदिम करे हँव सज्जन जान ।।

18/

सपट सुनत गुनधर कबि आँखी,तरतर तरतर लगिस बोहाय ।

आँखी उघरिस गोठ बात सुन, मंत्री धन्य कहत बस जाय।।

19/

घर मा जाके पाँव धोकर पर, फेर निकलगे भाग जगाय ।

परम ब्रम्ह गुन गावत ध्यावत,परम गति के साध जगाय ।।

 

शोभामोहन

 

आल्हा छंद रास

1/

जहाँ किसन के बंँसी बाजै बार न बाँधै गोपी ग्वाल

रास रंग अउ रंझाझर कर, झुमरावै सबला नंदलाल।।

2/

आँखी चमकत मिरगी जइसे अमरित टपकत बोली बात ।

सुध-बुध सबो भुलाये तन के, रेंगत हें मन मन मुस्कात।।

3/

सँभर सँभर घर घर ले निकलत, रास रचाये आधा रात ।।

एक बरन सुंदरी रूपसी एक्के गोत व एक्के जात।।

4/

आधा डर अउ आधा बल मा, घर-घर ले निकलत ब्रजनार।

गोड़ मड़ावत सँभल-सँभल के, तभो होय पैजन झंकार ।।

5/

दल के दल वृन्दावन कोती, चलत हवँय धर संगी हाथ ।

करत अगोरा बइठे हावय, जिहाँ चराचर जग के नाथ ।।

 

शोभामोहन श्रीवास्तव


नरसिंह बसत हवय हर खंभा

हम प्रहलाद बनै नइ पान।

रेंगे बिन अउ दोष लगावन,

काबर मिलय नहीं भगवान।।


बिगन जपे प्रहलाद बरोबर,

कोन बिधि छाहित करवान।

पबरित नाम सुने गाये बिन,

दिव्य दुआरी कइसे जान।।


भजत भजत हरिनाम मुरुख मन,

मइल भरे मन ला फरियान।

निर्मल भाव उवावन घट मा,

जाके बासा अटल थिरान।।


शोभामोहन बेरा बुलकत,

अब तो सुमिरन साध जगान।

लख चौरासी भटकत चोला,

बदलत वो जीव पार लगान।।


शोभामोहन 

०२/०६/२०२१


बसंती सुम्मत बिरहा आल्हा


चारोकोती हाँसत गावत, सुघ्घर सुम्मत गोड़ मड़ात।

सरसों झुमरत फूललदाये, भौंरा माते असन झपात।।


कमलबियैया तरिया छछले, पानापुरइन मणि लुटात।

बिरहा ब्याकुल पिया लहरिया, 

आनदेश ले दँउड़त आत।।


फूल साँझ अइलाहूँ जानत, तबले महर महर ममहात।

सब माते हें अपन अपन में, 

अउ ककरो हे जीव करलात।। 


धर अनगनती सुख ला बसंती, भुँइया रेंगत सुख बगरात।

करत सुहागिन भुँइयातल ला, 

डोंगरमड़वा सुघर सजात।।


सन्डेवा के खड़े फसल में, कोन देख आगी सिपचात।

अंग बसंती संग बसंती, अउर बसंती हाँसी बात।। 


लगनाही हर रूप निखारे,

हरदी चिक्सा लगर नहात।

लहरा छुवत लजावत सिहरत, 

सोच सजन मन मन मुसकात।। 


हवँय तिहार मनात मयारू, अउ बिरहिन आँसू ढरकात। 

काँसकुसुम रूनझुन ले फूले, दुखियारिन के मन दहकात।।

 


शोभामोहन

मिलत जुलत ब्रज जमुनाघाट 


नहाखोर के जमुनातट में, राधा अंग सुंगध लगात।

मंदगंध ला सूँघत-सूँघत, बिगनबलाव सँवरिया आत।। 


चुन्दी में छटके जलबुँदियन,

मोती चटके असन जनात।

पीठ में बेनीफूल ओरमे, झेंझरहा झलमल झलकात।।


नागमुड़ी के चूरा पहिरे, कनकदेह मा कनक सजाय। 

मोतीमणि जड़ाये ककनी, सोनसंभारे लाख भराय।


गाल ओरमें झूलत झुमका, लटकत भार सहे नइ जात। 

चढ़े कनौती जड़े जवाहर, घेरीबेरी हे खसकात।।


पँहुची मुँदरी अउ अँगुठाही, गजरा गुँथे चमेली फूल। 

बिंदिया साजू टिकुली फुल्ली,

लाली पिंउरी लटकन झूल।। 


मूड़ ढ़काये चुटुक चुनरिया, किरन नहक के चूमत जात। 

काँसकुसुम फूलत ऐती अउ, ओती सजन मदन परघात।।

 

लुगरा-पटुका लटकत फुँदना, 

रगरग ले मन चैन चुरात।

हवय तिहार मनावत आँखी, 

दूसर कहूँ ओरख नइ पात।।


फूललदाये डारी हाँसत, पान संग डोलत इतरात। 

रिगबिग रिगबिग मधुबन निधिबन, 

भुनन भुनन भौंरा मन गात।।


डुमरपकैया जूड़ पवन कस, मस्तमोहनी हथनी चाल।

कन्हिया लटकत करधनिया में, 

जड़े जवाहर हीरा लाल।।


नरगर लरलर  गहना-गूठा, नैन बरत सब सजवन देख।

ओठ गोठ हर बदके रहिगे, आँखी नेवतत मया सरेख।।


खोपाअरझे फूल बरोबर,तन मन मोहन अरझत जात।।

मधुबन नापत थके गोड़ के, मुँह देखत पीरा बिसरात।। 


झनक झनक झन पैजन बाजत, 

खनन खनन चूरी खनकात। 

धड़धड़ धड़धड़ धड़कत छतिया, 

फरर फरर अँचरा फहरात।।


मनकेशर डुहरू कस डुहड़ू, चरचर ले फूलत गहदात।

चंचल चेत अचंचल होवत, देख सँवरिया जीव जुड़ात।। 


रुआँ रुआँ हाँसत दरसन कर, परस जगतबंधन बिसरात। 

फूल झरत हे गोठबात ले, मन हुलास बरने नइ जात।। 


आँखी पाँखी पतियाखोलत, ओंठ कलेचुप अउ गुमखात।

पियामिलन मंदमउहा पीके, लठरत गोड़ संभल नइ पात।। 


रूपबखानत स्तुति गावत, पेट चलावत चारण भाट। 

रासरसिक रधिया रसरमनी, मिलत-जुलत ब्रज जमुनाघाट।। 


शोभामोहन


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संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...