अवधपुरी
वर्णन*(किरीट सवैया)
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नादर शेष
दिनेश सदाशिव रोज सियापति गोड़ मनावत।
जोग बिराग
भुला तपसी जन दिव्य पुरी गिंजरे बर आवत।
श्रेष्ठ सबो
तपसी गुनिया तन लोभ तजे मन देख लुभावत।
जे नगरी कमलापति
मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
रामपुरी जब
सोन जड़े मणि माणिक देखत देव सिहावत।
रंग बिरंग ढ़ले
फरसी तल, बिम्ब छटा प्रतिबिंब दिखावत।
शिल्पगुनी
मनखे बुध के बल, रेंगनबाट गढ़े मन भावत।
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
काँच गड़े
सतरंग गली भर देखत वो सुध हे बिसरावत।
जोग बिराग
भुला तपसी जन दिव्य पुरी गिंजरे बर आवत ।
उज्जर धाम हवै
नभ चूमत दिव्य अँजोर सबो मग छावत।
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
देख सियापति
के पुर उज्जर चन्द्र दिवाकर छेंव लजावत।
भूतल वैभव ला
सुन के चिढ़ देखन स्वर्ग पुरन्दर आवत।
ध्यान भुला
तपसी मन हा झुमरै लठरै जँह नाचत गावत।
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
झाफर हे अँगना
जिह ओरिन इस्फटिका मणि तेज लुटावत।
होय खुदाव
किंवाड़ महीनन हीर कनी नग लक्कलकावत।
झींकत हे मन
ला रनिवास चरित्र लिखे कुरिया मन भावत।
अंकित राम
चरित्र सबो कति हे मुनि के चित चेत चुरावत
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
हे पुर में
सबके घर सुंदर बाग फुले फुलवा मुसकावत।
रंग बिरँग सजे
घरुहा मन मोहत मार सुगंध लुटावत।
रीत भुला अउ
नेम मढ़ा सब बेर बसंत रहै लुरियावत।
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
भाँवर देत
अँड़े भँवरा दल गुँजन ले हिरदे हरसावत।
शीतल मंद
सुगंधित आत हवा रुखवा सब हे लहरावत।
सारस हंस मयूर
सुआ दल के दल हे पड़की सन गावत।
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
सुंदर हाट
बजार सजे वह तो मुँह ले बरने नइ जावत।
मोल बिना सब
चीज मिलै जन लेवत जेकर जे मन भावत।
राम सरीख
जिहाँ पर राउर ते पुर के न बनै गुन गावत।
जे नगरी
कमलापति मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
लोग सराफ बजाज
बजार म हाथ उठा सब चीज लुटावत।
काबर देवत तेन
घलो सब ला बिन मोल मलोवन पावत।
कोन भला
प्रभुधाम बसे सुख बैभव ठीक बता सब पावत।
जे नगरी कमलापति
मालिक वो पुर लोग कुबेर जनावत।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
किरीट
सवैया*
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हे रघुनाथ
दयाल दया कर तोर दुआर खड़े हम हावन।
हे सरनागत
के सुखदेउक हे भवसागर पाप नसावन।
फेर मरे
जनमे दुख जब्बर मेटनहार गुहार लगावन ।
भक्त बना अनुरक्त करा चित चेत हमार बिराज अपावन।
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