चंदन टिपके माथा
तोर।
सेंदूर टिपके
हाँथा मोर ।।
रंगमंच कस रच
संसार (जयकारी छंद)
रंग मंच कस रच
संसार ।
ईश्वर बनगे
गम्मतकार ।।
सिरजत हावय
अपन उझार ।
पाठ सबो के कर
तैयार ।।1।।
खुल्ला ये नभ
बना पंडाल ।
भुँइया जम्मो
मंच विशाल ।।
पाठ निभाये
कला दिखाय ।
एकक करके जीव
बलाय।।2।।
परी नजरिया
जोक्कड़ नाम ।
गम्मत अनुहर
रूप व काम।।
पाठ मंच मा
जेकर आय ।
नाटक करके उही
दिखाय।।3।।
कथा कंथली के
भरमार ।
सिगबिग-सिगबिग
करत अपार ।।
दरसनिया तक
मजा उड़ात ।
पीट थपोड़ी
हाँसत गात ।।4।।
कोनो मया दया
बरसात ।
कोनो अँगरा
आगी खात।।
किटकिटात कोनो
बगियात ।
ककरो हाँसी
कहूँ उड़ात ।।5।।
कोनो झगरा करे
उचात ।
मन ला मारे
कहूँ झँवात।।
कोनो हर बंदूक
चलात ।
कोनो मारत
पथरा घात ।।6।।
कोनो हर ड़डा
बरसात ।
मार निहत्था
लोग सुतात ।।
कोनो बोलत आभा
मार ।
कोनो थूकत हवय
खखार।।7।।
कोनो सब दिन
रहै रिसाय ।
कोनो सबके जीव
जुड़ाय।।
सरलग नाटक कोन
कराय ।
जाने बिन गै
सबो बयाय।। 8।।
कोनो चलत धरम
के बाट ।
पाप करत कोनो
गर काट ।।
जे नाटक मा हे
बइहाय ।
कोनो बैरी
हितू बनाय।।9।।
रमगे अतका
नाटक प्रान ।
झूठ लबारी ला
सत मान ।।
कोन नचावत
हावय नाच ।
जाने बिन टघलत
आँच ।।10।।
शोभामोहन
निच्चट ललहूँ दिखत अगास।
पकलाके
सेठरागे आस।।
उम्मर के धन
होगे नास।
आँखी होवत हवय
रोआस।।
शोभामोहन
बड़ विचित्र
लगथे संसार ।
ककरो बर तो
नियम हजार।।
अउ कोनो हर
बने विशेष ।
टोर नियम ला
करथे ऐश ।।
नियम एक हे कहिथे
लोग ।
बात नहीं ए
माने जोग।।
देख भतीजा भाई
वाद ।
दिखथे सबो जगह
आबाद ।।
टारे बिन
विशेष अधिकार ।
मन मा खटका
होय सवार।।
काबर नियम
नहीं समान ।
भेद बता दौं
हे गुनवान ।।
शोभामोहन
मजदूर (जयकारी
छंद)
गोड़ गड़े काँटा
ला हेर ।
रेंगत हस बिन
पनही फेर ।।
सुर्रावत
जिनगी के नेर ।।
कोन करत रे चर्चा
फेर ।।
धनवंता ह ससन
भर पेर ।
फेंकिस चूस
रसा सब हेर ।।
कहूँ करत हे सोग
दबेर ।
आँखी ला
ललियात तरेर।।
लुलुवावत हस
जाँगर पेर ।
सब डेरउठी
धक्का फेर ।
दुख ला कहिबे
काकर मेर ।
कोन सुनही
कपिला टेर ।।
तोरे बल मा
बनिस कुबेर ।
नइ पूछिस दुख
मा एक बेर
गाँव डहर अब
चल रे शेर।
छोड़ गिंजरना
पर के घेर ।।
अउ कुबेरहा
दिन लड़ेर ।।
काम काज करके
बिन ढ़ेर ।।
गुरुशरण
गुरु शरण मा
चेला जाय।
गुरु ज्ञान ला
पाय ललाय ।।
गुरु बात पथरा
के दांड़।
जान धरै छल जम्मो
छाँड़ ।।
अँखमुन्दा
गुरु उपर भरोस।
सम शुभ चाला
बिन भय रोस।।
सरधा कभू न
डगमग होय।
लालच तिसना
नहीं बिटोय।।
हरहिन्छा गुरु
चरन पखार।
भेट जिनिस दे
माँगै सार।।
गुरु के आगू
नवना सीख।
सबो सुगुन ला
सुघ्घर चीख।।
गुरुसेवा बर
रहै तियार।
गुरु गोड़
अहमइती डार।।
होती अपन गुरु
कर भेट।
गरब गरज अंतस
ले मेट।।
सबले जादा
गुरु के मान।
करत होय
सुघ्घर विद्वान।।
अउ तो अउ गुरु
गुरु नत्ता गोत।
सग मितान असलग
गुनसोत।।
सबला ठउका
देवै मान।
साधक के गुन
ला पहिचान।।
गुरु कारज बर
लगन लगाय।
गुरु के मन
लजीतै सुख पाय।।
गुरु के पाछू
रेंगत जाय।
गुरु बर भाव
कृतज्ञ जताय।।
गुरु बदला न इ
कोनो जान।
जेन गुरु बर
देवै प्रान।।
गुरु सरसब
सुखदेवा जान।
गुरुवर ला
सरबस आपन मान ।।
सपना मा परदुख
नइ देय।
परसुख बर दुख
मूँड़ी लेय।।
गुरुवारी सब
जुरे मितान।
भाई बहिनी सगे
समान।।
दया मया के
राखै भाव।
पानी ज इसे
करै सुभाव।।
तन मन धन सब
तजे तियार।
गुरुवर ला सुख
दिये अपार।।
सबके बढ़ती करै
बढ़ाय।
कतको गुन
गियान ला पाय।
भाव अनन्य
गुरु ला ध्याय ।।
सदा सदा रहि
गुरुवर छाँव।
बिन बोले समझै
गुरु भाव ।।
शोभामोहन
गुरुवर मेर।
मन टेकाये रहि
सब बेर।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
शोभामोहन
२३/११/२०२०
अंतस धरके एक्के
नाम जयकारी छंद
1/
अंतस धरके एक्के नाम ।
साँस साँस में जप नितनाम।
डउल लगा के हो उपराम,
जब तक नइ जनाय परिनाम।।
2/
होही प्रकट एक दिन राम,
सरलग जप मन तज सब काम।
बसे ल मिलही पबरित धाम,
छोड़व बिरथा बूता काम।।
3/
बसे धुकधुकी में नितनाम,
सबके भीतर ओकर धाम।
जब्बर गुरु बिन रद्दा लाम,
देह भूँजावय गिंजरत घाम।।
4/
दाहिन करथे बिधना बाम,
जब सतगुरु हर बाँहीं थाम।
उड़थे पंछी तभे गुलाम।
डेना छतरा नभ निजधाम।।
5/
पानी खातू ले बीजा जाम,
जइसे लहराथे जर थाम।
तइसे गुरु सेवा नितनाम,
सदा सुफलकारी सब काम।।
6/
सुधर जाय खोंटा तकदीर,
सरधा गुरु बन धरे शरीर।
गुरु बनथे रखवार गहीर,
लेग जीव ला ईश्वर तीर।।
7/
सबला गुरु ग्यान धरवाय,
छाहित ईश्वर वो करवाय।
जउन दुआरी खोजत जाय,
ब्रम्ह जानबा वोहर पाय।।
8/
जब तक सतगुरु मिले न होय,
तब तक जागे जीव हिय धोय।
सुमिरन कर कर मया गढ़ोय,
एको छिन बेरा झन खोय ।।
9/
दू आखर के नानिक नाम,
साँसा डोरी पोहव राम।
इष्टदेव तब बाँही थाम,
भजबे तब देही निजधाम ।।
10/
जेमा रमथे जोगी जाग,
अपन जगाथे सुते भाग।
एक ईश ले रख अनुराग,
सदा लुटाथे मया पराग।।
11/
घुचे मुरुखपन आये ग्यान।
तब मुनिया हर पाये जान।।
रमे रहय ओमा दिनरात।
राम उही प्रभु हवय कहात।।
12/
सबो जीव के हिरदे माँझ।
राम बिहिनिया रतिया साँझ।।
जपय भगत हर जेकर नाम ।
अवध गोसइया सीता राम ।।
13/
जे आनंद सिंधु सुखरास ।
सीकर तें त्रैलोक सुपास ।।
सो सुखधाम राम अस नाम ।
अखिल लोक दायक बिश्राम ।।
●पाँच जिनिस के अनगिन खेल●
पाँच जिनिस के
अनगिन खेल।
जेन करावत
बिरहा मेल।।
अनचिन्ह हावय
गाँव सियार।
अनमिट सब मा
फेर चिन्हार।।
अपन टकर के
आगू हार।
जीव करत जगतिक
बेवहार।।
मन के अँगना
लाख बहार।
होत तभो कचरा
भरमार।।
ईश मिलै अउ आप
गँवाय।
खुरचत शुभदिन
बादर लाय।।
शोभामोहन हे
निरधार।
धर ले हाथ जबर
करतार।।
शोभामोहन
०८/०२/२०२१
●रंगमंच कस रच संसार जयकारी●
रंग मंच कस रच
संसार ।
ईश्वर बनगे
गम्मतकार ।।
सिरजत हावय
अपन उझार ।
पाठ सबो के कर
तैयार ।।
खुल्ला नभ
बनाय पंडाल ।
भुँइया जम्मो
मंच विशाल ।।
पाठ निभाये
कला दिखाय ।
एकक करके जीव
बलाय।।
जोक्कड़ परी
नजरिया नाम ।
गम्मत अनुहर
रूप व काम।।
पाठ मंच मा
जेकर आय ।
नाटक करके उही
दिखाय।।
दंतकंथली हे
भरमार ।
सिगबिग-सिगबिग
करत अपार ।।
दरसनिया तक
मजा उड़ात ।
पीट थपोड़ी
हाँसत गात ।।
कोनो मया दया
बरसात ।
कोनो अँगरा
आगी खात।।
किटकिटात कोनो
बगियात ।
ककरो हाँसी
कहूँ उड़ात ।।
कोनो झगरा करे
उचात ।
मन ला मारे
कहूँ झँवात।।
कोनो हर बंदूक
चलात ।
कोनो मारत
पथरा घात ।।
कोनो हर ड़डा
बरसात ।
मार निहत्था
लोग सुतात ।।
कोनो बोलत आभा
मार ।
कोनो थूकत हवय
खखार।।
कोनो सब दिन
रहै रिसाय ।
कोनो सबके जीव
जुड़ाय।।
सरलग नाटक कोन
कराय ।
जाने बिन गै
सबो बयाय।।
कोनो चलत धरम
के बाट ।
पाप करत कोनो
गर काट ।।
जे नाटक मा हे
बइहाय ।
कोनो बैरी
हितू बनाय।।
रमगे अतका
नाटक प्रान ।
झूठ लबारी ला
सत मान ।।
कोन नचावत
हावय नाच ।
जाने बिन टघलत
हे आँच ।।
शोभामोहन
●गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी)●
गुरुबर मोर
सुनौ गोहार ।
ड़ोंगा मोर लगा
दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर
भरोसा भार।
कलकुत ड़ंडासरन
तुँहार ।।
रद्दा मा हे
अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव
खारे -खार ।
गुरुबर मोर
सुनौ गोहार ।।
हौ उदार बड़हर
महराज।
हाथ तुहर अब
हावै लाज।।
उतरे दहरा पार
अपार ।
गुरुबर मोर
सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति
हौ हे भगवान ।
मोला निचट
अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ
उपकार ।
गुरबर मोर
सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान
तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे
अँधियार ।।
बिनती करथौं
बारम्बार ।।
गुरबर मोर
सुनौ गोहार ।।
शोभामोहन
●बिपत मा सुरता आइस गाँव जयकारी ●
घर ला तजे गये
परदेश ।
होय शहरिया
बदले भेस।।
महतारी कतकोन
बलाय।
फेर न उसरै तोला
आय ।।
हमला तो तैं
कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब
हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज
सकेल।
शान बघारस सहस
न झेल।।
देख गँवइहा ला
बगियास ।
अड़हा कहस अबड़
खिसियास।।
रंगे शहर डहर
के रंग ।
सोझ न बोलस
ककरो संग।।
आज बहुर के
कइसे आय।
बिन बलाय अउ
बिन परघाय ।।
का जीते बर
हारे दाँव।
रद्दा भूले
हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ
देवै भूख।
आये होबे ओही
धूक ।।
रोजगार बर
छोड़े गाँव ।
सुरता आइस
बिपत म छाँव।।
शोभामोहन
●काबर नइ हे नियम समान जयकारी●
बड़ विचित्र
लगथे संसार ।
ककरो बर तो
नियम हजार।।
अउ कोनो हर
बने विशेष ।
टोर नियम ला करथे
ऐश ।।
एक नियम हे
कहिथे लोग ।
बात नहीं हे
माने जोग।।
एक भतीजा भाई
वाद ।
दिखथे सबो जगह
आबाद ।।
टारे बिन
विशेष अधिकार ।
मन मा खटका
होय सवार।।
काबर नइ हे
नियम समान ।
भेद बता दौं
हे गुनवान ।।
शोभामोहन
●बुढ़ौंतीपन (जयकारी छंद)●
थकही जे दिन
हाथ व गोड़ ।
बिरथा लगही सब
गठजोड़ ।।
देंह झपाही
अनगिन रोग ।
अउ कोनो नइ करही
सोग ।।
छाती मा अँगरा
कुढ़वाय ।
ओ दिन परही बड़
पछताय ।।
कोनो हर नइ
सुनही बात।
रंग बदलहीं सग
सगियात ।।
गुन गुन कटही
दिन अउ रात ।
मोह मया के
बदला घात ।।
आँखी घपट जही
अँधियार ।
बइठे रहिबे मन
ला मार ।।
डेरौठी के बन
रखवार ।
हूँत कराबे
बारम्बार ।।
कोनो हर नइ
देही कान ।
तोर करेजा
लगही बान ।।
खँगही जाँगर
झुकही नैन।
बेमतलब हो
जाही बैन ।।
दाँत टूट
कोचरही माँस।
मुश्किल होही
लेना साँस।।
छूट जही
सँगवारी साथ ।
अउ कुछु नइ तो
आही हाथ ।।
नइ भाही तोला
संसार ।
अंग ओढ़ना लगही
भार।।
मनखे चोला
दुर्लभ जान ।
का करना तेला
पहिचान ।।
सुमिरे धर ले
पबरित नाम ।
दुख नइ ब्यापन
देवै राम ।।
शोभामोहन
●आखर किल्ला भसकत जात (जयकारी)●
बोलत मूँड़ा
दसो जनात ।
आखर किल्ला
भसकत जात ।
तोर रूप मा मन
मोहात।
बोले सकत नहीं
मोकात ।।
चिटको नइ सुख
साध सुहात ।
भोग-रोग बन
नही सतात ।।
संसो फिकर न
घुन्ना खात ।
तोर डहर मन
बहकत जात।।
का बिहान अउ
संझा रात ।
हाथ धरे जब
पिया चलात ।।
का जियानही
जुन्ना बात।
भँउरी छूटत मन
हरसात ।।
शोभामोहन
कतको आँखी डउल
लगाय ।
बिजली दिखै न
पवन छुआय ।।
कठवा भीतर अगन
लुकाय ।
जब्भे उपकै
तभे चिन्हाय ।
कामा कामा हवस
लुकाय ।।
अउ नइ तैं देखब
मा आय ।
सबले बलकर उही
जनाय।।
जीव जगत जड़ सब
मा छाय।
जम्मो जीव
हलाय डुलाय।।
सबो तोर तो
सूती खाय।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
१९/०४/२०२१
शोभामोहन
श्रीवास्तव-बालगीत
तितली
फूल फुले हे
लहसे डार।
झूलत तितली ओकर भार।।
रंगबिरंगी
पाँखी पाय।
उड़ उड़ डार बइठ
इतराय।।
आगी असन करौ
निर्लेप ।
दिनकर असन करौ
निर्लेप।।
नभ के असन करौ निर्लेप।
जीव संलिप्त
करौ निर्लेप।।
शोभामोहन
२३/०२/२०२१
जयकारी छंद
मनचाहे जब मिल
नइ पाय ।
अनचाहे अउ आगू
आय ।।
रोग शोक मन
जीव दुखाय।
तब औसध तन रोग मिटाय
।।
मन के दुख
कइसे दुरिहाय।
ज्ञान बिगन नइ
जीव जु़ड़ाय।।
अउ उत्तम सुख
नहीं जनाय।
अटकर ले कुछु
हाथ न आय।।
जीव दया जेने
ला भाय ।
जोरै उचित करम
मन लाय।।
जप तप साधन
रहै सधाय ।
हरहिन्छा हो
पुन सिरजाय ।।
जे सत रद्दा
लगन लगाय ।
बिकट बाट चातर
कर जाय ।।
ईश्वर के गुन
करम जनाय ।
वो गुरुवर
जोहारत जाय ।।
गुरुवर सूते
भाग जगाय ।
हो प्रसन्न
दुख ले बिलगाय ।।
ग्यान गुरु
परसादे पाय ।
शोभामोहन माथ
नवाय ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
देखव नवा जमाना आय
जयकारी छंद 15/15
ब्यारा बखरी गै बेंचाय ।
सब औजार पटाव टँगाय ।।
झउँहा चरिहा कहाँ बिलाय।
देखव नवा जमाना आय ।।
काँदा कूसा ला नइ खा।
अरबन-चरबन पाकिट लाय ।।
मुसुर-मुसुर चुप्पे चबुलाय।
देखव नवा जमाना आय ।।
लोटा थारी ला फूलकाँस ।
कोन्टा गोंजे मँहगू दास।।
भाई भाई न इ गोठियाय ।
देखव नवा जमाना आय।।
शोभामोहन
बिसयन ले जेने
घुँच जाय।
उही अटल सुख
ला सपड़ाय।।
सुतै बइठै
पीयय खाय।
फेर बिबेक ला
रखै जगाय।।
गिंजरे फिरे
डहर सब जाय।
फेर नहीं भूले
रतियाय।।
दान करै अउ
नदी नहाय।
फेर गरब मन मा
नइ लाय।।
दरस परस कर नइ
बइहाय।।
कान लिप्त नइ
होय बयाय।
करू कसा सुन
नइ बगियाय।।
सूँघै फेर न
गंध लोभाय।
सबो बिसय ला रऊँदत
जाय।।
शोभामोहन हर
गुन गाय।
अइसन सज्जन
संत सुभाय।।
शोभामोहन
२३/०२/२०२१
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