14/14 मात्रा के 4 चरण वाले समपाद मात्रिक छन्द.
बेरा निंदरत अउ
परात
बिलमत नहीं न सुनत
बात,
परघाये ले मुँह
बनात,
रेंगत अपने सुर म
जात ।
बेरा छेंके बर
सधाय,
मोह परे जन दुख ल
पाय,
मोह उपज के दुख
बियाय ,
मनखे कुछ नइ समझ
पाय ।
मोह नार मा फदक
हाय,
बिरथा होवत जनम
जाय।
जीयत भरम गरी
फँदाय,
उबरे बर न डउल
लगाय ।।
[12/10, 17:58]
14/14 मात्रा के 4 चरण वाले समपाद मात्रिक छन्द आय.
बेरा निंदरत
अउ परात
बिलमत नहीं न
सुनत बात,
परघाये ले
मुँह बनात,
रेंगत अपने
सुर म जात ।
बेरा छेंके बर
सधाय,
मोह परे जन
दुख ल पाय,
मोह उपज के
दुख बियाय ,
मनखे कुछ समझ
नइ पाय ।
मोह नार मा
फदक हाय,
बिरथा होवत
जनम जाय।
जीयत भरम गरी
फँदाय,
उबरे बर न डउल
लगाय ।।
शोभामोहन
कज्जल छंद
पाना सुर्रे
बेर-बेर,
हरिया जाही
फेर-फेर,
बन दूबी जर फेंक
हेर,
रहिबे तो झन ढ़ेर
ढ़ेर ।
[12/10, 17:59]:
इन्द्रिय मन के
बने दास,
चुप-चुप रोये रहि
उदास,
राई-छाई होय आस,
जम्मो जिनगी करे
नास।
[16/10, 14:16]
कज्जल छंद
ददा
1/
जेन बाप हा पेट
काट,
जोड़े पइसा करे हाट,
खवा समोसा बरा चाट,
देवय घर मा चीज
पाट ।
2/
गरू लगत हे उही बाप,
जेन भुला के अपन
आप,
सबके सुख दुख रखे
नाप,
आज सहत अपमान ताप
।
3/
कलपत हावय मरे हाड़,
बेटा लहुटे
मूँहबाड़,
गइस ददा के करम छाँड़
ओकर सब सुख परे आड़
।।
4/
बाँटा होगे खेत
खार,
डिलवा डोली मेड़
पार,
अइसन बेरा परिस
मार,
जब्बर मनखे गइस हार ।
5/
जेकर साजे सजय साज,
घर मा जेकर चलय
राज
,
अपन करे नइ सकत
काज,
हाथ गोड़ हे थके
आज।
6/
बेटा मन सब करव
मान,
बढ़िया राखव खान
पान,
सेवा करके रखव
ध्यान,
सबले बढ़के ददा
जान।
●कज्जल छन्द ●
हे तेला देखन
न पाय,
नइ तेला गजब
पतियाय।
छाहित ला
मुरुख लतिताय,
दिखे न तेकर सुध
लमाय ।।
शोभामोहन
●अगोरा कज्जल ●
झाँकत अँगना
गली खोर,
भींजे-भींजे
नैन कोर।
जोहत रद्दा
चेत चोर
मन मा मधुरस
घोर-घोर।।
शोभामोहन
राई छाई होय
आस (कज्जल )
बने गीनहा ऊँच
नीच,
कहिके झन तो
ड़ाड खींच,
मया लगाके बाग
सींच,
बीजा मन मा मया
छींच।
पाना सुर्रे
बेर-बेर,
हरिया जाही
फेर-फेर,
बन दूबी जर
फेंक हेर,
रहि न जानके
ढ़ेर ढ़ेर ।
इन्द्रिय मन
के बने दास,
चुप-चुप रोये
रहि उदास,
राई-छाई होय
आस,
करे जमो जिनगी
नास।
स्वारथ करथे चोख धार,
नत्ता माने न
तो यार,
नहीं पसीना
सकय गार,
परधन देखय
मूँह फार।
ककरो ले नइ
पटे तार,
सबो मानगे
हवँय हार,
ऐती ओती मूँह
मार,
चुगली चारी
करे झार।
लालच तिसना के
अजार,
धरके अब्बड़ चले यार,
रोग शोक के घर
दुवार,
कतको ओकर फाँस
नार,
झाँकत अँगना
गली खोर,
भींजे-भींजे
नैन कोर,
जोहत रद्दा
चेत चोर
मन मा मधुरस
घोर-घोर,
शोभामोहन
उबरे बर न डउल
लगाय (कज्जल छन्द) (14-14)*
हे तेला देखन
न पाय,
नइ तेला गजब
पतियाय।
छाहित ला
मुरुख लतिताय,
दिखे न तेकर सुध
लमाय ।।
बेरा निंदरत
अउ परात
बिलमत नहीं न
सुनत बात,
परघाये ले
मुँह बनात,
अपने सुर म
रेंगत जात ।
बेरा छेंके बर
सधाय,
मोह परे नर
दुख ल पाय,
मोह उपज के
दुख बियाय ,
मनखे हर समझ
नइ पाय ।
मोह नार मा
फदक हाय,
मनुख जनम ल
अपन गँवाय।
जीयत भर गरी म
फँदाय,
उबरे बर न डउल
लगाय ।।
शोभामोहन
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