चोला भटकत देश बिरान रे
मुँड़वार
तिलरिया माने तीन ठन लरी दू लरी के दोहा, चार लरी के मुक्तक कविता पढ़े हन जानथन, फेर पहली तिलरिया "चोला भटकत देस बिरान" पढ़े बर मिलिस अउ लिखे बर घलोक मिलिस। चंदवा ला टोपी पहिरे के ओखी मिलगे। उठत-बइठत हुरहा कोहनी हर ठेंसा जथे तौ कइसे जनाथे ? अंगरी समेत जम्मो हाथ झनझन्ना जाथे, तइसने तिलरिया "चोला भटकत देस बिरान" ला पढ़ेंव तब मोला लागिस, अभी घलोक गुदगुदासी लागत है। वइसे तो ये पुस्तक ला पढ़े बर एकेच घंटा लागही, न हिरदे लगाना हे न बुध, आँखी भर देखत देखत दउड़त जाही किताब पढ़े के किरवा झर जाही। फेर हिरदे अउ बुद्धि लगा के पढ़बे तब तो तिलरिया में चोला भटकत रही। मोला पांँच घंटा लागिस, अपने अपन ठोठक जाबे तहाँ ले अथाह में थाह लगावत रह एक लरी हर एक बात कहिथे, दूसर लरी हर वोकर फूरा-जमूगा करथे अउ तीसर लरी हर कन्झा देथे। ये लरी के सीखा ला देखौ भला का कहिथे ।
मनखे घलोक बजरहा होगे।
अंतस अतेक अजरहा होगे।
बइठे हाट बेंचान रे ।।
कबीर ला जनैया मन तिलरिया 'चोला भटकत देस' बिरान ला ठउका जान पाही, नहीं तो बिरान देस में तो भटकतेच रहना हे।
जगत दिखै नइ जगत चलैया ।
जग के मुँहरन ओकर छँइयाँ । बिरथा मन अनुमान रे ।।
अब का एला अइसने कविता कहिबे ? कबीर, सूर, चैतन्य, गुरूनानक डायोनीज, अउ गुर्जिएफ असन गियानी के संगे संग रेंगे ला धरत हे ये हर तो, अइसन लागथे छत्तीसगढ़ी भाखा में बेद पुरान ला बांँचत हौं। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन के लबेदा हर तो ओ पार नाहकत हे। छत्तीसगढ़ी बोली भाखा में कविता कहिनी लिखई हर चित्रगुप्त धरमराज के खाता-बही असन अब्बड़ झाफर हे जेन हर सबो ला जियान परथे, सरकारी काम-कारज में उही पाय के छत्तीसगढ़ी के नाम ले साहब सूभा
03
मन के पोटा कांँपथे। जीव कलकुत असन छत्तीसगढ़ी लेखक कवि मन हर बोली भाखा ला ढेखरा असन थाम्ह के राखे हें। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन के लिखा मन हर छत्तीसगढ़ी बोली भाखा के एहवांँत आय, फूलत-फलत रहै, सदा सोहागी रहै अभी तक ले तो गंँवावत आय रहे हवन अब तो पाय लागत है तेला तो पोटार लन।
बाठबतैया भठहा भइगे।
आसा खाँधा रटहा भइगे।।
चल मन पिय सोरियान रे।
छत्तीसगढ़ी में पढ़ैया लिखैया मन हर मोर जब्बर गोहार ला सुनौ तिलरिया ल खत्ता में पढ़ौ गुनौ अउ सीखा हर का बोलत हे तेला थोरिक थीरथार सुचेतहा होके धरौ खच्चित अघा जाहू भाई । शंकर पार्वती के भाँवर लगा के गनेश जी हर संसार के परकम्मा करे के बात मनवा लिस वइसने तिलरिया में तीन लोक, चउदाभुवन के मरम समाय हे, निमार के देखौ ।
सौ में सतहा लाख में जतिहा। थोरिक मनुख अति ननजतिया।।चिन्ह ले अपन घरान रे।
लिखा-लिखा ला सकेल के एक संघरा परूसना नोहै, तिलरिया हर आगर हे, सब मिला के कहे के मतलब सोच-समझ हे। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन हर अवैया दिन के बिहनिया ला आजेच देख लेथे। सिरतोन में मनखे असकटागे हे जीयत हे, तब मरे बर मरत हे तव जीये के असूसी।
साध पुरे मन चुप नइ होवैं।
अउ दूसर उपका के रोवैं।।
कइसे नरक खंँटान रे।
राबिया नाव के एक झन बाई घलो लिखे हे, अइसने का कबीर का राबिया संसार में रहिके नहीं रहत रहिन ? उही में शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन ला मैं हर समोखथौं राग में पाग हावय, सन्यासी, विरागी मन संग ठाढ़े हे वोकर तिलरिया "चोला भटकत देस बिरान" हर।
चार खाँध जब जाय जवैया।
आगू रोवैया पाछू गवैया।।
सत हे पिया के नाव रे।
04
एक लिखैया हर लिखे हे "हाट सूना हो गया गोरी चली गयी" शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन हर गोमची आय, गोमची चल देथे फेर ओकर बानी नहीं जावै देखौ :-
हाट उसल के सुन्ना होही।
हठवारा नवा जुन्ना होही ।।
सब जग मरी-मसान रे।
एही ओरी में देखौ :-
बुध ला माया तोपे बइठे।
मेर्री मारे मोह हे अँइठे ।।
चल भक्ति उपकान रे।
सांझर मिंझर जिनगी में तिलरिया के अरझे-ओरमे सुर्रत सुरता ला
अरियावत है-
काँटा खूँटी पाप करम के।
इचनी-बिचनी रकम रकम के ।। अरझे बिकट गठान रे।
तिलरिया तिखारत हे सरेखत हे सरेरत हे अपनेच पूछत हे अउ अपनेच हर बतावत है।
बइठे अलहन पाटी पारे।
मंदमाते तैं कहाँ निहारे।।
फेर परगे पछतान रे।
लिखत हंँव तेमा बड़े-बड़े उठेंवा देवत हौं, इंकर लिखा ला नींद-पुदक के देखे हौं लिखना हे कहिके आधा सीसी नहीं पढ़े हौं पूरा सीसी करे हौं थाह अथाह है-
मन अइसे जइसे तैं मान ले।
मैं नोहौं वो मन ये जान ले।।
मन हर मुरुख सुजान रे।।
05
गंगा-जमुना के पबरित पानी के धार में कमल नहीं फूलै, हर घोंघी में मोती नहीं होवै छत्तीसगढ़ हर ओरी और गंँवावत आवत हे, हम तो पछतानी करत-करत थक गेन। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन हर झन गंँवाय मैं नहीं रहूँ तौ का भइस तिलरिया के लिखा-सीखा घरोघर टंगाय रही, आवत-जावत लोगन पढ़हीं अउ जीव जुड़वाही। तिलरिया हर छत्तीसगढ़ी साहित्य समाज ला कुबेर के कलम दे दिस। अब अंगूठा झन लगाव । बस !
कृष्णा रंजन जी
महाराज राजिम
ब्रम्हचर्य आश्रम (संत)
06पेज
"शुभ कामना"
मानव का मन अद्भुत है वह मन ही मन अन्वेषण करता है, फिर चिंतन-मनन की कसौटी कस कर, अपने विचार प्रकट करना चाहता है। अपनी उपलब्धि को दुनियाँ को बाँटना चाहता और वह अपने विचार को पुस्तक का रूप देता है। प्रत्येक रचनाकार की रचना उसका स्वगत-कथन है।
"चोला भटकत देस बिरान" शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन का स्वगत कथन है। छोटी- सी उम्र में इतनी प्रौढ़ता की मैंने कल्पना नहीं थी, इस पाण्डुलिपि को पढ़कर मैं अचंभित रह गई। एक-एक शब्द को चिंतन मनन की कसौटी में कसकर शब्दों में पिरोया गया है, इसकी खुशबू दूर तक जाएगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है-
जिनगी के सब ताग गठनहा। सबके रीत अलग अनबनहा।।
फेर कइसे पतियान ।
कसने रेंग निहर के तन के।
टिकली मोल नहीं ए तन के।।
काबर गरब गुमान रे ।
मानव-मन बड़ा जटिल है, वह सुख की चाह में, लोभवश, रीति-नीति को बिसार कर ऐसी राह पर भटक जाता है, जहाँ उसे सुख की जगह, दुख दर्शन होते हैं, पर हम सभी जानते हैं कि सुख और दुख के कारण हमारे अपने कर्म ही होते हैं-
दँउड़ावै सुख मिरगा-पानी
परे टकर बेरा धुरधानी ।।
पानी फेर गुनान रे।
07
कबीर को पढ़ कर मैं अभिभूत हो जाती हूँ। बड़ी-बड़ी बातों को कबीर एक दोहे में कह देते हैं। उसी लीक पर चलते हुए शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन बहन ने जो तीन- तीन पंक्तियों के तिलरिया में जो कुछ कहने की चेष्टा की है, इसकी यदि व्याख्या की जाये तो इन तीन-तीन पंक्तियों पर एक सम्पूर्ण आलेख लिखा जा सकता है। कविता इसीलिए दुनियाँ भर में इतनी लोकप्रिय है कि वह वेद-उपनिषद् और दर्शन के सूक्ष्म-संवाद और सार को बहुत कम शब्दों में हमें समझा देती है-
"माटी मिलथे राजा-राठी।
माटी ले झन बोल उराठी।
माटीच मीत मितान रे।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन एक भाषा विज्ञानी भी हैं इसलिए उनके तिलरिया चोला भटकत देस बिरान रे में शब्दों से उत्पन्न चमत्कार के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी चारुता और लालित्य भी यत्र-तत्र है। यह पुस्तक उनकी दूसरी प्रकाशित पुस्तक है हर पंक्ति में स्वयं के लिए और समाज के लिए सुंदर सीख है। उनके एक-एक शब्द छत्तीसगढ़ी के भावों की गगरी भर रही है। तिलरिया चोला भटकत देस बिरान रे पुस्तक पाठक के मन को बाँधकर रखने में समर्थ तो है ही, ज्ञान-गठरी, विधि-निषेध को विवेकपूर्वक परोसा गया है मेरी दृष्टि में कवियित्री की यह सब से बड़ी उपलब्धि है कि उसने छत्तीसगढ़ी भाषा में गूढ़ सनातनी परंपरा का निर्वाह किया है मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास में मील का पत्थर सिद्ध होगी और पाठकवर्ग इस कृति का अभिनंदन कर इसे पढ़कर अपनी जीवन सार्थक करेंगे।
शुभकामनाओं सहित जेठ पूर्णिमा-2017
शकुन्तला शर्मा
भिलाई - 490006
288/7 मैत्रीकुँज मो.- 1.- 9302830030
08
बेबाक, फक्कड़ तिलरिया का अंदाज
"चोला भटकत देस बिरान" परमात्मा और जीवात्मा के बीच आच्छादित दुष्चक्रों का बारीक व मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। पुस्तक के शीर्षक के साथ जो निर्गुण भावमय यात्रा शुरू होती है वह सतत् पाठक के मन मस्तिष्क को गतिमान करते हुए अंत में सगुण रूप तक अपने शीर्षक के साथ घोषमय, भावमय, शब्दमय व चित्रमय शैली में पाठकवृंद को यात्रा कराती है। कवयित्री की भाषा कहीं बिंबात्मक तो चित्रात्मक है। सबसे महत्वपूर्ण बात इस पुस्तक में यह है कि प्रत्येक पद में कवियित्री स्वयं अपने उद्घोषणाओं के समानान्तर खड़ी हुई प्रतीत होती है। नाना प्रकार के सांसारिक जंजालों में छटपताते जीवात्मा की व्याकुलता कहीं-कहीं विहल कर देने वाली है।
सुभ सम दया मया बो लेतेन । पाप बकर बोमफार रो लेतेन ।।
होतिस हरू परान रे।
मानवीय दुर्बलताओं की सभी कोटियों को कवियित्री ने स्पर्श करते हुए स्वयं के प्रति निषेधाग्रह किया है ताकि जीवात्मा परम विश्रांति को प्राप्त हो सके। अपने आत्मा से दूर रहने के कारण ही जीवात्मा दुःखी है यदि जीव आत्मस्थ हो जाय तो विकाररहित व पवित्र होता है। कायस्थ (काया में स्थित) रहने पर स्वस्थ रहती है। और मनस्थ रहने पर सदैव दुःखी व रुग्ण रहता है। मन के महीन परतों को खोलकर मन के मालिकपन से निवृति हेतु कवियित्री ने अपनी साहित्यिक दक्षता व छत्तीसगढ़िया आत्मा की अतुल्य अनुभूति को शब्दों में आकार देने का स्तुत्य प्रयास किया है। यथा :-
मन खेवास बन चंँवर डोलातिस ।
चलतिस जइसे चेत चलातिस।। फेर बनगे सुलतान रे ।
09
कवयित्री कभी सजग प्रहरी की भाँति आह्वान करती है तो कभी तटस्थ भाव से वस्तुनिष्ठ प्रश्नकर्ता की भाँति प्रश्न करती है।
सौ में सतहा लाख में जतिहा।
थोरिक मनुख अति ननजतिया ।
चिन्ह ले अपन घरान रे।
अर्थात सौ में कोई एक सत्यनिष्ठ होता है, लाखों में कोई एक यति अर्थात् साथक, तपस्वी होता है। बहुत ही अल्पमात्रा में इस धरती में मनुष्य मिलते। हैं और पथभ्रष्ट और निम्नकोटि के लोगों की सबसे ज्यादा संख्या इस संसार में है, तुम किसी घराने से संबंधित हो अपना घराना पहचान लो इन पंक्तियों में कितना बेबाकी व निर्भिकता है।
छत्तीसगढ़ी में मन जीवात्मा और परमात्मा के विषय में इतना विश्लेषणात्मक और गूढ़ रहस्यों को प्रकाशित करने वाला मौलिक सृजन संभवतः अब तक प्रकाश में नहीं आया है। कवयित्री ने एक कुशल मनोवैज्ञानिक की भांति मन, गति मन की चालाकी, मन की चतुरता गूढ़ता को सुघड़ता से अनावृत किया है।
यथा :-
देख कले चुप मन के लहरा।
उठत हवै कइसे बिन दहरा।
मुड़पुरूस बुड़ जान रे ।
अर्थात् शांतचित्त होकर मन के लहरों को देखो। मन की गति इतनी वक्रीय होती है कि मन जो नहीं होता उसकी कल्पना कर लेता है और अपने आनंदित रहने का मिथ्या उद्यम करता है। मन बिना नदी, तालाब या समुद्र के मिथ्या लहर पैदा कर लेता है और भ्रम के लहर में सिर तक डूब भी जाता है। कितनी हास्यास्पद बात है कि आलम्बन के बिना ही उद्दीपन की रचना केवल मन ही कर सकता है। कवयित्री ने किसी मनोवैज्ञानिक की भांति मन का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है। "चोला भटकत देस बिरान" की पंक्तियों को पढ़ते-पढ़ते कभी ऐसी भी प्रतीत होता है कि कहीं यह ग्रंथ अपने ही जीवन व तन-मन पर किये गये प्रयोगों और अनुभवों की टीप प्रतिटीप तो नहीं है।
10
चोला भटकत देस विराम के पुस्तक के तीन पंक्तियों की तिलरिया में प्रत्येक पद में मानव जीवन की विद्रुपताओं संवेदनाओं के जिस भी आयाम को स्पर्श किया गया है उसे पूरी सार्थकता के धरातल पर उतारने का पूरे मनोयोग से प्रयास किया गया है। उक्त ग्रंथ मनोविलास नहीं अपितु चिंतन का ग्रंथ है। भारत देश के आध्यात्मिक वांग्मय चिंतन और हितोपदेश में छत्तीसगढ़ी भाषाशक्ति, भाषा सामर्थ्य, भाषायी सामाजिकता और सात्विकता केन्द्रित छत्तीसगढ़िया आत्मा होने का श्रेष्ठ प्रमाण है। यह सम्पूर्ण प्रबंधकाव्य आत्म प्रबोधन और आत्म संबोधन का ग्रंथ है जो स्वानुशासन आत्मचिंतनपरक छत्तीसगढ़िया आत्मा का उद्गार होने के कारण छत्तीसगढ़ के ग्राम्य जीवन ग्राम्यविम्बों, चित्रों और शिल्पों से अभिसिक्त छत्तीसगढ़ी के सुगंध से सुगंधित " चोला भटकत देस बिरान" को छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रतिनिधि ग्रंथ कहना अतिश्योक्ति नहीं है।
कवयित्री की कथ्य के प्रति निष्ठा, बेबाकी और फक्कड़ तिलरिया को विलक्षण बनाती है।ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रत्येक उद्घोषणा स्वयं के लिए है और स्वयं के प्रति उनका व्यवहार उदारतापूर्ण नहीं है। आत्मपरक शैली में लिखे होने के कारण यह ग्रंथ सबको स्वयं की ही निजानुभूति जान पड़ेगी यह तिलरिया, आत्मपरक शैली में रचित साहित्य को सदैव उत्कृष्ट माना जाता है। मेरे विचार से बिना लागलपेट के फक्कड़पन और जीवन की निःसारता और जीवन जीने के उचित ढ़ग को तिलरिया ग्रंथ के माध्यम से सहज ही उजागर किया गया है। जीवात्मा को चेतावनी देने के लिए छत्तीसगढ़ी में जिन प्रतीकों, बिंबो का लालित्य बिखेरा गया है वह छत्तीसगढ़िया जनमानस की अन्तरात्मा को जोड़ने, झकझोरने और सहज ही संप्रेषित करने की अपूर्व क्षमता से परिपूर्ण है।
चिथरा होही काया गरबिन।
अउ जगरीत लहुटही करबिन।।
जीव रही कोरवान रे।
यह गर्व से फूला हुआ शरीर एक दिन चिंदी की तरह जर्जर हो जायेगा और मानव समाज को निर्देशित करने वाले रीति-रिवाज एक दिन बृहन्नला
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हो जायेगी किंतु जीवात्मा फिर भी नये कपड़े की भाँति परम पवित्र है भले ही शरीरी यात्रा में पराये देश में न जाने कहाँ-कहाँ भटकते रहना पड़ रहा है। कवयित्री का परमसत्ता पर अमोघ विश्वास है। अंत में परमात्मा को
गुहारती हुई कहती है-
मायागढ़ ले पिया बला ले।
आरूग करे अगिन नहवा ले।
अंगिया ले भगवान रे।
चूंकि शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन छत्तीसगढ़ के महान विभूति स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, प्रबंधकाव्य प्रवर्तक पुरोधा पुरूष पण्डित सुन्दर लाल शर्मा जी की चौथी पीढ़ी की वंशज हैं और इन्हें साहित्य विरासत में मिली है इनके साहित्यिक प्रतिभा के विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। मुझे गर्व है कि ये ये सौभाग्य से मेरी अर्धांगिनी हैं।
"चोला भटकत देस बिरान" भक्ति, चिंतन, आत्म विश्लेषण, आत्म शोधन व आत्म प्रबन्धन का छोटा सा किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली, आध्यात्मिक वांग्मय से परिपूर्ण लोकभाषा शैली में लिखित स्वयं के प्रति आग्रही ग्रंथ है। यह सबके के लिए उपयोगी है अतः प्रस्तुत पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा में अब तक रचित उत्कृष्ट ग्रंथों की श्रेणी में स्थान व महत्व रखेगी तथा सदैव प्रासंगिक रहेगी इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
मोहन श्रीवास्तव (कवि )
12
दू टप्पा लिखेरी के गोठ
'चोला भटकत देस बिरान' हर आध्यात्मिक बेड़ा के छत्तीसगढ़िया अंतस के उछींद गुनान आय। भारत के आध्यात्मिक चेतना सदाकाल ले पोठ हे कतको सिद्ध, सुजान, ज्ञानी, ध्यानी, साधू संत के भारत हर जनम भुँइया आय उँकरे भाव गुनान के झीप में मोरो अंतस हर भींजथे, तेकरे उतारा आय ये पुस्तक चोला भटकत देस बिरान रे हर। बुधियार मनखे मन सरेखहीं तौ लिखई फलित पर जाही। मय तो अपन अंतस के जुड़वास खातिर कागद करिया कर डारेंव, बेरा के संग पूरा कस पानी कब उतर जाहूँ नहीं जानव, फेर मोर चुलूक मरत ले झन छूटे, इही मोर भगवान ले अर्जी हे काबर कि मोर ये चुलूक हर मोला मनमाने सुख देथें। गीता, रामायण अउ उपनिषद मन ला ननपन ले पढ़त अउ सुनत बाढ़ेन अउ मति, गति हर असंग बिरंग धीरलगहा होवत गइस तेकर गम नहीं मिलिस।
पटपटहा जिनगी म बैराग उपकथे कहै हमर बबा हर तेन ठउकाच कहै
आय। 'चोला भटकत देस बिरान' कोनो ला सिखोना दे बर सकेले गंँठरी नोहै भलुक अपने भरमाये मन ला संँवागे के दिये चेतौना सिखौना आय। बारा बिपत के जिनगीबाठ में रेंगत कोनो पयडगरी कोनो धरसा, कोनो अरकट्टा में अभराय जनास मन ला ओलियाय हौं, मोर कोनो जनास उढूँवा नोहै एक्के धरसा में रेंगत-रेंगत घलोक सबके जनासा आनेच आने होथे सबके रामकहिनी आने आने हे गुनान के बोझा रचरचात ले होथे तब बेरा के सगुन- असगुन ला भंजाय बिगन कागद कलम के थेमा में अपन अंतस के गरूआपा ला हरू करत- करत मन हर बिरंग असन होथे तब "चोला भतकत देस बिरान" के मूड़वार धराथे।
13
मोर उथली गुनान में न तो सर हे न सेवाद हे फेर एक धुन हे जेन भाव हर डंगनी में नहीं में अमरत बनै तेला अँगरी म छुवे के साध। देख के तो कतको झन हाँसहीं कही तब मैं राम नहीं बोलौं।
कोनो बाठ रेंगे ले जीव के संताप कमती नइ होय अउ जीव हर
जइसे ही चेतत हे कहिके लागथे मन फेर खेल-खेल देथे। पीरा थकासी ले जीव गरूआवत जतके रेंगत हे ततके कुकरी असन थकत हे अउ एक दिन निथोथिया बीचबाठ में देह थक जाथे, अउ बेरा कहिनी पूर जाथे फेर चवरासी के मूड़ी-पूछी दिखबे नइ करै। ये घुमरन गिंजरन हर अबड़ बियापने वाला है-
माटी बरतिया माटी घरतिया।
माटी संग सुते सुख रतिया।।
माटीच फेर बियान रे
चोला भटकत देस बिरान रे
ये फेर ले न तो जीव उबरत है, न थकत हे, न थिरात हे, भले जीव जात हे फेर साध-सधवरा मन नइ छूटत हे। निरबुद्धि जनम घर के निबुद्धि माटी में पटा जथन अउ अनचिन्हार बाठ के बठचल्लापन ला संँवास लेवन। ये मानूस तन पाँच जिनिस के तमूरा हे, ये तमूरा ला बजाय के मरम ला जाने बिगन पंचतन गुन (रूप, रस, परस, दरस गमक) के भांग धधूरा के नसा में मताय अबूझहा के अबूझहा रही जाथन। जीव के कभू नहीं सिराने वाला रामकहिनी ला अपन बोली- भाखा में निभाय के ये डउल हर मन के लपकत धार के बोहाय उतारा धरसा आय छत्तीसगढ़ी बोली हर मोर मन के भाव ला समोखे सकथे अउ किरवार कर सकथे मोर साध सधौरा हर चिटरा उदिम ले जादा नोहे छत्तीसगढ़ महतारी के कतको झन चाकरी करैया हें उही पाँत म महूँ अपन महतारी भाखा में पोथी लिखे-लिख के मन ला भूलवारत हौं अउ बोलीभाखा के अपार सक समरथ ला अपन नानुक अँजरी म झोंक झोंक के झलकत हौं मोला एकर ले सरस, नीक अऊ गुरतुर भाखा खोजे ले नइ मिलै। अड़हा के गोठ ला बुधियार मन तउलहू।
जय छत्तीसगढ़, जय छत्तीसगढ़ी
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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