सब झन बाटादार
हे (उल्लाला/चंड़िका छंद )
जीव जन्तु
संसार में । रथे ईश के भार में ।।
बैरी नोहय
जानबे । तब तो हितवा मानबे ।।
सुमता भाव
बिगाड़ के ।मया दरद ला छाँड़के।।
भुला गये
सहचार ला ।मनखे के व्यवहार ला ।।
ते सेती दुख
आय हे ।तइसे असन जनाय हे ।।
घर मा मनुख धँधाय
हे ।कोरोना बकवाय हे ।।
मालिक हँव मैं
सोंचके ।बोटी करके नोचके।।
खाये हावस जीव
ला ।भसकाये हस नीव ला ।।
मनखे तोर
बिरोध में ।प्रकृति हर प्रतिशोध में।।
कालरूप बन आय
हे ।सबके ताप नवाय हे ।।
नहीं लुकाये
ठाँव हे ।आफत सब्बो गाँव हे।।
कुच्छु समझ न
आत हे ।मनखे अक्कबकात हे ।।
सबो भूत के
बीज मा ।प्रकृति के सब चीज मा ।।
तोरे भर
अधिकार हे । ये बिचार बेकार हे ।।
भुँइया कहिथे
आव ना।सब्बो बउरौ खाव ना ।।
तुँहरे बर
सिरजाय हौं ।सुख साधन बगराय हौं।।
सब औ अंश
विराट के ।पानी पी इक घाट के।।
खाना हे मिल
बाँट के ।सब पंथी एक बाट के ।।
अपन आप समझाव
रे ।आजे किरिया खाव रे ।।
तानाशाही छोड़
दौ ।मन के धारा मोड़ दौ ।।
जोड़व टूटे आस
ला ।अउ चुटके विश्वास ला ।।
सबके होती एक
हे ।रूप व रंग अनेक हे ।।
सब झन
बाँटादार हे ।अउ अपने परिवार हे ।।
सबला जीयन खान
दौ । हाँसन दौ मुसकान दौ ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
३१/०३/२०२०
उल्लाला छंद)
चेते तेने चेत
हा,
प्रभु में चेत
लगात हे।
अउ बिचेत हा
हाथ में,
दुख बियात पछतात
हे।।
जेन रचे संसार
ला,
जेन करत
किरवार हे।
ओला जेने
जानथे,
तेकर बेड़ा पार
हे।।
कभू अदालत
फैसला,
गलत घलो हो
जाय रे।
अंतस आरो सुन
बने,
कभू फरक नइ
खाय रे।।
थिरा जुड़ा मन
हर कहत,
अउ बेरा
घिरलात हे।
रीता नइ हे
हाथ हर,
तभो तियारत
जात हे।।
जे जेजिनीस
मिलगे उही,
बिरथा लागत
जात हे।
हो मतंग मनखे
तभे,
पाये नवा ललात
हे।।
महतारी अउ बाप
हा,
धरती के भगवान
ए।
दिखय नहीं वो
ईश के,
वो सँउहत
पहिचान ए।।
महतारी अउ बाप
हर,
हाड़ा हपट कमात
हे।
लइका के सुख
साध बर,
सक भर जोर
लगात हे।।
बाट चलत मनखे
कभू,
ठहरय कहूँ
सराय मा।
तइसे जग मा आय
हन,
फेर गुनन का
जाय मा ।।
लराजरा ये जग
सबो,
प्रभु हर
सग्गे लाग ए।
मनखे चोला दे
हवय,
यहू हमर बड़भाग
ए।।
पंँचतंत्री के
टुनटुना,
साँस साँस भज राम
रे।
तँय बटचल्ला
जात अस,
येहर आही काम
रे।।
ये जग अउ ओ
पार के,
सतगुरु देथे
ग्यान ला।
शरण आय के हाथ धर,
काटे जर
अग्यान ला।।
राम नाम छींच
बीजहा उल्लाला 2
1/
जेन रचे संसार
ला,
जेन करत
किरवार हे।
ओला जेने जानथे,
तेकर बेड़ा पार
हे।।
2/
बुध सुख दुख
ला बाँट के,
जीव सबके
भरमात हे।
बुध के बइगुन
देख तो,
दुख मन ला
परघात हे।।
3/
जग में रक्सा
देवता ,
मोर गढ़े दू
जात हे।
तीसर मनखे के
गढ़े,
गीता कृष्ण
बतात हे।।
4/
ग्यान देत वो
मूड़ ए,
खाँध ल सैनिक
जान रे।
बैपारी हर पेट
ए,
कमिया गोड़
जहान रे।।
5/
भले अदालत
फैसला,
कभू गलत हो
जाय रे।
अंतस आरो सुन
बने,
कभू फरक नइ
खाय रे।।
6/
गरब भाव के डीह में,
दिया बारथे
लोभ रे।
जाये बर ओ पार
तव,
बने गोड़ ला
खोभ रे।।
7/
भीर कछोरा ला
बने,
जर ला गरब
उखान दे।
पर ला देखे
छोड़ के,
अपने उपर
धियान दे।।
8/
मन हर कहत
थिराय ला,
अउ बेरा
घिसलात हे।
एक काम नइ होय
हे,
अउ तियार के
जात हे।।
9/
जे जिनीस
मिलगे उही,
बिरथा लागत
जात हे।
हो मतंग मनखे
तभे,
पाये नवा ललात
हे।।
10/
ये जग अउ ओ
पार के,
गुरु बिन मिले
न ग्यान रे।
सतगुरु के मिल
जाय ले,
कटय घोर
अग्यान रे।।
11/
हीन कहूँ जग
में नहीं,
जानव मनखे लोग
रे।
एक ईश के सब
रचे,
सब बर करिहव
सोग रे।।
12/
एक सबो के
आतमा,
देह भले हे आन
रे।
सबमें उही
समाय हे,
कर लेवव
पहिचान रे।।
13/
जग के जम्मो
चीज में,
ईश्वर झलक
दिखात हे।
जानत ते मनखे
कभू,
फेर कहे नइ
पात हे।।
14/
पाँच जिनीस के
खेत में,
बों झन गरब
गुमान रे।
राम नाम छिंच
बिजहा,
हो जाही
कल्यान रे।।
15/
पंँचतंत्री के
टुनटुना,
साँस साँस भज
राम रे।
बाट रेंगइया
जात तँय,
आही ए हा काम
रे।।
15/
पंँचतंत्री के
टुनटुना,
साँस साँस भज
राम रे।
तँय बटचल्ला
जात अस,
येहर आही काम
रे।।
16/
जीव देंह के
संग हे,
तोर तभे तक
मोल हे।
बिरथा झन होवय
जनम,
काया बड़ अनमोल
हे।।
17/
आत्मा हाजिर
देंह मा,
सुवना करत
किलोल हे।
अउ छोड़त ए
पिंजरा,
बिरथा काया
खोल हे।।
15/
मनखे प्रकृति
हाथ के,
बने खेलौना
जाँच रे।
जइसे मन नचवात
हे,
बेंदरा बन के
नाच रे।।
16/
सपन तोलगी ला
धरे,
जब मनखे थक
जाय रे।
तब जग बिरथा
जान के,
पाये मोक्ष
ललाय रे।।
17/
बुध के सेती
दुख सबो,
तेकर ले बुध
टार दे।
बुध के बदला
चेत मा,
परम प्रभु ल
पधार दे।।
18/
बने नही गिनहा
नही,
जग में कुछ हे
जान ले।
बुध हर उठ अउ
गिर के,
करय हीनता मान
ले।।
19/
बुध गिरथे अउ
उठथे,
करनी के
अनुसार रे।
कोनो ला झन
दोष दे,
करनी अपन
सुधार रे।।
20/
अंतस मा सुख
दुख नहीं,
नहीं भूख अउ
प्यास रे।
देखत साखी भाव
ले,
जीवगति चुप
हाँस रे।।
21/
गरब गिंजारत
जीव ला,
चौंरासी के
जेल में।
फेंके जेन
गुमान ला,
तरे उही भव
खेल में।।
22/
तन के मालिक
आतमा,
दे दे स ओकर
हाथ मा।
तान झींक के
बुध चला,
ले कलंक झन
माथ मा।।
23/
टिकली लेगन दय
नहीं,
डेरा जब उसलाय
रे।
मोर जेन धन ला
कहे,
दूसर ला बइठाय
रे।।
24/
भाड़ा के खोली
सहीं,
ए चोला के खोल
हे।
रहि पाबे दिन
ओतके,
जतका साँसा
मोल हे।।
25/
भाड़ा के घर बर
कभू,
मन नहीं मया
बढ़ाय रे।
उही बरन तन
लेख ले,
सुख दुख नहीं
जनाय रे।।
26/
बाट चलत मनखे
कभू,
ठहरय कोनो
सराय रे।
तइसे गिंजरत
जीव हा,
आये सुख दुख
पाय रे।।
27/
बाट चलत मनखे
कभू,
ठहरय कोनो
सराय मा।
तइसे जग मा आय
हन,
फेर गुनन का
जाय मा ।।
27/
करनी के खाता
चलय,
जमराजा के
गाँव में।
मरन घड़ी करनी
दिखय,
जीव जाय निज
ठाँव में।।
28/
भाड़ा के घर बर
कभू,
मोह न पइधे
पाय रे।
तस हाड़ा अउ
मास बर,
मनखे झन बइहाय
रे।।
29/
महतारी अउ बाप
हा,
धरती के भगवान
ए।
जे ईश्वर
अदीरिस हे,
ओकर ही पहिचान
ए।।
31/
महतारी अउ बाप
हर,
हाड़ा हपट कमात
हे।
लइका के सुख
साध बर,
सक भर जोर
लगात हे।।
32/
लराजरा ये जग
सबो,
प्रभु हर
सग्गे लाग ए।
मनखे चोला दे
हवय,
यहू हमर बड़भाग
ए।।
33/
तोर असन हितू
कहूँ,
नइ हे ए संसार
में।
सग बहिनी कस
लागथे,
मोला तोर
दुलार में ।।
शोभामोहन
हँड़िया के कहानी उल्लाला1
गैंती मा खन कोड़ के,लाने मोला खेत ले।
रउँदत हस रे कुम्हरा,ले ले लाहो लेत ले ।।
बने मता गैरी तहाँ,चाक म फेर चढ़ाय रे ।
कोकम अलकरहा कभू,कोंवर हाथ लगाय रे।।
लोंदी धर के हाथ मा,गड़हन देस सम्हार के।
फेर सिरज के रूप ला,रख दे काट उतार के।।
गड़हन देवत जात अउ,बाँटत जावस नाम मा।
फेर सुखाये ला रखे,हस चरचर ले घाम मा।।
माटी के माटी सबो,तब ले अड़बड़ नाम हे।
जतका गोत्रज मोर हे,सबके आने काम हे।।
तन ला आगी में पको,परछो देके आय हँव।
रिंगीचिंगी के हाट मा,सस्ती मोल बिकाय हँव।।
ठोंक बजा ठिन्ना बने, चिन्हारी कर देखथे।
टोर फोर के फेंकथे,दू कउड़ी नइ लेखथे।।
परभल बाना बाँधथौं,सब बर मन शुभ भाव हे।
फेर उझर के बन जथौं, अइसे मोर सुभाव हे।।
मोर सगा अउ गोत मा,सबले बड़का आँव मैं।
पानी भर चूल्हा चढ़ा,माटी हँड़िया ताँव मै।।
गुरु महिमा उल्लाला1
गुरु के महिमा ला कहे,गीता बेद पुरान हा।
अउ गुरु ला बड़का कहे,अपनो ले भगवान हा।
सोना ठुक ठुक मार के,जेवर गढ़े सुनार हा।
कूट पीट लोहा बने,गड़हन देत लुहार हा।।
जम्मो गुन ला सीख के,रचना रच सुख पात हें।
देखव आने हे अपन,आने सिरज मड़ात हे।।
गुरु समर्थ अपने असन, करथे देके ग्यान ला।
गुरु के दरजा नइ मिलय,तेकर सेती आन ला।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
उल्लाला छंद निर्गुण भजन
जेन रचे संसार ला,जेन करत किरवार हे।
ओला जेने जानथे,तेकर बेड़ा पार हे।।
जगती अउ ओ पार के,गुरु बिन मिले न ग्यान रे।
सतगुरु के मिल जाय ले,कटय घोर अग्यान रे।।
बुध सुख दुख ला बाँट के,जीव सबके भरमात हे।
बुध के बइगुन देख तो,दुख मन ला परघात हे।।
जग में रक्सा देवता ,मोर गढ़े दू जात हे।
तीसर मनखे के गढ़े,गीता कृष्ण बतात हे।।
ग्यान देत वो मूड़ ए,खाँध ल सैनिक जान रे।
बैपारी हर पेट ए,कमिया गोड़ जहान रे।।
भले अदालत फैसला,कभू गलत हो जाय रे।
अंतस आरो सुन बने,कभू फरक नइ खाय रे।।
गरब भाव के डीह में,दिया बारथे लोभ रे।
जाये बर ओ पार तव,बने गोड़ ला खोभ रे।।
भीर कछोरा ला बने,जर ला गरब उखान दे।
पर ला देखे छोड़ के,अपने उपर धियान दे।।
मन हर कहत थिराय ला,अउ बेरा घिसलात हे।
एक काम नइ होय हे,अउ तियार के जात हे।।
जे जिनीस मिलगे उही,बिरथा लागत जात हे।
हो मतंग मनखे तभे,पाये नवा ललात हे।।
हीन कहूँ जग में नहीं,जानव मनखे लोग रे।
एक ईश के सब रचे, सब बर करिहव सोग रे।।
एक सबो के आतमा,देह भले हे आन रे।
सबमें उही समाय हे, कर लेवव पहिचान रे।।
जग के जम्मो चीज में,ईश्वर झलक दिखात हे।
जानत ते मनखे कभू,फेर कहे नइ पात हे।।
पाँच जिनीस के खेत में,बों झन गरब गुमान रे।
राम नाम छिंच बिजहा,हो जाही कल्यान रे।।
पंँचतंत्री के टुनटुना,साँस साँस भज राम रे।
बाट रेंगइया जात तँय,आही ए हा काम रे।।
पंँचतंत्री के टुनटुना,साँस साँस भज राम रे।
तँय बटचल्ला जात अस,येहर आही काम रे।।
जीव देंह के संग हे,तोर तभे तक मोल हे।
बिरथा झन होवय जनम,काया बड़ अनमोल हे।।
आत्मा हाजिर देंह मा,सुवना करत किलोल हे।
अउ छोड़त ए पिंजरा,बिरथा काया खोल हे।।
मनखे प्रकृति हाथ के,बने खेलौना जाँच रे।
जइसे मन नचवात हे, बेंदरा बन के नाच रे।।
सपन तोलगी ला धरे,जब मनखे थक जाय रे।
तब जग बिरथा जान के,पाये मोक्ष ललाय रे।।
बुध के सेती दुख सबो,तेकर ले बुध टार दे।
बुध के बदला चेत मा, परम प्रभु ल पधार दे।।
बने नही गिनहा नही, जग में कुछ हे जान ले।
बुध हर उठ अउ गिर के,करय हीनता मान ले।।
बुध गिरथे अउ उठथे,करनी के अनुसार रे।
कोनो ला झन दोष दे,करनी अपन सुधार रे।।
अंतस मा सुख दुख नहीं,नहीं भूख अउ प्यास रे।
देखत साखी भाव ले,जीवगति चुप हाँस रे।।
गरब गिंजारत जीव ला, चौंरासी के जेल में।
फेंके जेन गुमान ला,तरे उही भव खेल में।।
तन के मालिक आतमा,दे दे स ओकर हाथ मा।
तान झींक के बुध चला,ले कलंक झन माथ मा।।
टिकली लेगन दय नहीं,डेरा जब उसलाय रे।
मोर जेन धन ला कहे, दूसर ला बइठाय रे।।
भाड़ा के खोली सहीं, ए चोला के खोल हे।
रहि पाबे दिन ओतके,जतका साँसा मोल हे।।
भाड़ा के घर बर कभू,मन नहीं मया बढ़ाय रे।
उही बरन तन लेख ले,सुख दुख नहीं जनाय रे।।
बाट चलत मनखे कभू,ठहरय कोनो सराय रे।
तइसे गिंजरत जीव हा,आये सुख दुख पाय रे।।
बाट चलत मनखे कभू,ठहरय कोनो सराय मा।
तइसे जग मा आय हन, फेर गुनन का जाय मा ।।
करनी के खाता चलय,जमराजा के गाँव में।
मरन घड़ी करनी दिखय,जीव जाय निज ठाँव में।।
भाड़ा के घर बर कभू,मोह न पइधे पाय रे।
तस हाड़ा अउ मास बर,मनखे झन बइहाय रे।।
महतारी अउ बाप हा,धरती के भगवान ए।
जे ईश्वर अदीरिस हे,ओकर ही पहिचान ए।।
महतारी अउ बाप हर,हाड़ा हपट कमात हे।
लइका के सुख साध बर,सक भर जोर लगात हे।।
लराजरा ये जग सबो,प्रभु हर सग्गे लाग ए।
मनखे चोला दे हवय,यहू हमर बड़भाग ए।।
तोर असन हितू कहूँ, नइ हे ए संसार में।
सग बहिनी कस लागथे,मोला तोर दुलार में ।।
शोभामोहन
सबके आँखी छेंकथे उल्लाला 2
मनखे मन हर देखथे,आँखी सबके छेंकथे।
कइसे आवँव गाँव ले,तोर उहू मा नाव ले।।
ओंठ रखँव सिल टोभ के,गोड़ मड़ावँव खोभ के।
घुंँघरू छन ले बोलथे,अउ सब पतिया खोलथे।।
सुरता तोर सतात हे,काँही नहीं सुहात हे।
कतको सग सगियात हे,तोर असन नइ बात हे।।
मया ह छोटे ते बड़े,सबके आँखी ला गड़े।
बइठे चौंरा आँट के,संगी साथी साँट के।।
सब चलात मोर बात हें,चरबत्ता बगरात हें।
हाथ गाल मा टेक के,पूछत हें सब छेंक के।।
मन में तोर खियाल हे,बगरे जग जंजाल हे।
चुन्दी मूड़ी सँवार के,बेनी गजरा डार के।।
नैना काजर डार के,गमकँव अत्तर डार के।
कइसे नहकँव हाट मा, सब ताकत हें बाट मा।।
लोगन लेवत चेर हे,होवत अब्बड़ बेर हे ।।
सब के सब सिसियात हे,आँखी नइ सहि जात हे।।
लुगरा टेसू लाल हे,टिकली के उजियाल हे।
मिलन ल तोर मनात हँव,हाड़ा हपटत आत हँव।
मन हर तोला सोंचथे,जब सब झन हर लोचथे।।
मन में जतका बात हे,सबो जीव करलात हे।।
गरहा फूटे लाग के,उखरा मतलब पाग के ।
गोठ करँव नइ भूल के,तोर बाँह मा झूल के।।
भागीरथी बलाय
हे,
गंगा धरती आय
हे।
जे दिन गंगा
आय हे,
अक्ती वही
कहाय हे।।
सपना
आँखी सपना
देखथे,
मन के भाव
सरेखथे।
फेर नींद जब टूटथे,
सब घरघुंँदिया
छूटथे।।
शोभामोहन
सबके आँखी
छेंकथे उल्लाला चंड़िका
मनखे मन हर
देखथे,
आँखी सबके
छेंकथे।
कइसे आवँव
गाँव ले,
तोर उहू मा नाव
ले।।
ओंठ रखँव सिल
टोभ के,
गोड़ मड़ावँव
खोभ के।
घुंँघरू छन ले
बोलथे,
अउ सब पतिया
खोलथे।।
सुरता तोर
सतात हे,
काँही नहीं
सुहात हे। कतको सग सगियात हे,
तोर असन नइ
बात हे।।
मया ह छोटे ते
बड़े,
सबके आँखी ला
गड़े।
बइठे चौंरा
आँट के,
संगी साथी
साँट के।।
सब चलात मोर
बात हें,
चरबत्ता बगरात
हें।
हाथ गाल मा
टेक के,
पूछत हें सब
छेंक के।।
मन में तोर
खियाल हे,
बगरे जग जंजाल
हे।
चुन्दी मूड़ी
सँवार के,
बेनी गजरा डार
के।।
नैना काजर डार
के,
गमकँव अत्तर
डार के।
कइसे नहकँव
हाट मा,
सब ताकत हें
बाट मा।।
लोगन लेवत चेर
हे,
होवत अब्बड़
बेर हे ।।
सब के सब
सिसियात हे,
आँखी नइ सहि
जात हे।।
लुगरा टेसू
लाल हे,
टिकली के
उजियाल हे।
मिलन ल तोर
मनात हँव,
हाड़ा हपटत आत
हँव।
मन हर तोला
सोंचथे,
जब सब झन हर
लोचथे।।
मन में जतका
बात हे,
सबो जीव करलात
हे।।
गरहा फूटे लाग
के,
उखरा मतलब पाग
के ।
गोठ करँव नइ
भूल के,
तोर बाँह मा
झूल के।।
भागीरथी बलाय हे
1/
भागीरथी बलाय हे,गंगा धरती आय हे।
जे दिन गंगा आय हे,अक्ती वही कहाय हे।।
2/
आँखी सपना देखथे,मन के भाव सरेखथे।
फेर नींद जब टूटथे,सब घरघुंँदिया छूटथे।।
शोभामोहन
सुखधाम धरके नाम हरि उल्लाला3
सुखधाम धर के नाम हरि,धरनी करत निहाल हे।
सब लोक राउ उही सदा,नंद यशोदा लाल हे।।
प्रभु माथ मउर मुकुट तो,लकलक बरत सुहात हे ।
वह रुप के वर्णन करौं,भाखा नइ मुख आत हे।।
बनफूल पान सुगंध मन,भागी बड़ा कहलात हे
प्रभु देह नेह छुए तहाँ,प्रान देह लुटात हें।।
प्रभु ओंठ बाँसुरी ला धरे,पागा पिंवरा खाप के ।
अउ खोंचें पीकमँजूर ला,आवत हे मधुबन नाप के।।
जब पाँव पैजनी बाँधके,चलत संग में ग्वाल के।
कर चोरी गोकुल गाँव मा,करके लीला बाल के।।
गुन सेती अनगिन नाम हे,सब गुन नाम अँजोरथे।
सब जीव ह ओकर भार हे,भव के बंधन छोरथे।।
सब चूम चाँट मया करत,कोनो गाल गिंधोल के।
कोनो सुल्हारत हे बिठा,कोरा गुरतुर बोल के।।
प्रभु ला बलावत हे सखी,सींका माखन टाँग के।
मन मा हे सबके चाहना,आय खाय वो माँग के।।
घर होय फेर सुन्ना जभेसंग धरे लगवार के।
अउ फोर दोहनी ठेकली,जावय पटक कचार के।।
ब्रजलाल मइरसा फोर के,मही-दही ल
गिराय हो।
अउ मुँह के पोंछत लेवना,ड़ाड़ खइरखा जाय हो।।
भिनसरहा उठ के राधिका,पनिया ओखी जात हे।
रसिया के रंग चढ़े हवय,मन मा मया न समात हे।।
बड़ फभत मउर मुकुट हा, करधन अउ बनमाल हे ।
सबला सुहावत हे अबड़ ,वह जगपति नंदलाल हे ।।
शोभामोहन
(उल्लाला छंद)
1/
चेते तेने चेत हा,प्रभु में चेत लगात हे।
अउ बिचेत हा हाथ
में,दुख बियात पछतात हे।।
(2)
गुरु के महिमा ला
कहे,गीता बेद पुरान हा।
गुरु ला बड़का हे
कहे,अपनो ले भगवान हा।।
(3)
सोना ठुक ठुक मार
के,जेवर गढ़त सुनार हा।
कूट पीट लोहा बने,गड़हन देत लुहार हा।।
(4)
सब झन गुन ला सीख
के,रचना रच सुख पात हे।
देखव आने हे अपन,आने सिरज मड़ात हे।।
(5)
गुरु करथे अपने
असन,सबला दे के ग्यान ला।
गुरु के दरजा नइ
मिलय, तेकर सेती आन ला।।
(6)
जेन रचे संसार ला,जेन करत किरवार हे।
ओला जेने जानथे,तेकर बेड़ा पार हे।।
(7)
कभू अदालत फैसला, गलत घलो हो जाय रे
अंतस आरो सुन बने,कभू फरक नइ खाय
रे।।
(8)
थिरा जुड़ा मन हर
कहत,अउ बेरा घिरलात
हे।
रीता नइ हे हाथ हर,तभो तियारत जात
हे।।
(9)
जे जेजिनीस मिलगे
उही,बिरथा लागत जात
हे।
हो मतंग मनखे तभे,पाये नवा ललात
हे।।
10/
महतारी अउ बाप हा,धरती के भगवान ए।
दिखय नहीं वो ईश
के,वो सँउहत पहिचान
ए।।
11/
महतारी अउ बाप हर,हाड़ा हपट कमात हे।
लइका के सुख साध
बर,सक भर जोर लगात
हे।।
12/
बाट चलत मनखे कभू,ठहरय कहूँ सराय
मा।
तइसे जग मा आय हन, फेर गुनन का जाय
मा ।।
13/
लराजरा ये जग सबो,प्रभु हर सग्गे
लाग ए।
मनखे चोला दे हवय,यहू हमर बड़भाग ए।।
14/
पंँचतंत्री के
टुनटुना,साँस साँस भज राम
रे।
तँय बटचल्ला जात
अस,येहर आही काम रे।।
15/
ये जग अउ ओ पार के,सतगुरु देथे ग्यान
ला।
शरण आय के हाथ धर,काटे जर अग्यान
ला।।
उल्लाला छंद
निर्गुण भजन
जेन रचे संसार
ला,जेन करत किरवार हे। ओला जेने जानथे,तेकर बेड़ा पार
हे।।
जगती अउ ओ पार
के,गुरु बिन मिले न ग्यान रे।
सतगुरु के मिल
जाय ले,कटय घोर अग्यान रे।।
बुध सुख दुख
ला बाँट के,जीव सबके भरमात हे।
बुध के बइगुन
देख तो,दुख मन ला परघात हे।।
जग में रक्सा
देवता ,मोर गढ़े दू जात हे।
तीसर मनखे के
गढ़े,गीता कृष्ण बतात हे।।
ग्यान देत वो
मूड़ ए,खाँध ल सैनिक जान रे।
बैपारी हर पेट
ए,कमिया गोड़
जहान रे।।
भले अदालत
फैसला,कभू गलत हो जाय रे।
अंतस आरो सुन
बने,कभू फरक नइ खाय रे।।
गरब भाव के डीह में,दिया बारथे
लोभ रे।
जाये बर ओ पार
तव,बने गोड़ ला खोभ रे।।
भीर कछोरा ला
बने,जर ला गरब उखान दे।
पर ला देखे
छोड़ के,अपने उपर धियान दे।।
मन हर कहत
थिराय ला,अउ बेरा घिसलात हे।
एक काम नइ होय
हे,अउ तियार के जात हे।।
जे जिनीस
मिलगे उही,बिरथा लागत जात हे।
हो मतंग मनखे
तभे,पाये नवा ललात हे।।
हीन कहूँ जग
में नहीं,जानव मनखे लोग रे।
एक ईश के सब
रचे, सब बर करिहव सोग रे।।
एक सबो के
आतमा,देह भले हे आन रे।
सबमें उही
समाय हे, कर लेवव पहिचान रे।।
जग के जम्मो
चीज में,ईश्वर झलक दिखात हे।
जानत ते मनखे
कभू,फेर कहे नइ पात हे।।
पाँच जिनीस के
खेत में,बों झन गरब गुमान रे।
राम नाम छिंच
बिजहा,हो जाही कल्यान रे।।
पंँचतंत्री के
टुनटुना,साँस साँस भज राम रे।
बाट रेंगइया
जात तँय,आही ए हा काम रे।।
पंँचतंत्री के
टुनटुना,साँस साँस भज राम रे।
तँय बटचल्ला
जात अस,येहर आही काम रे।।
जीव देंह के
संग हे,तोर तभे तक मोल हे।
बिरथा झन होवय
जनम,काया बड़ अनमोल हे।।
आत्मा हाजिर
देंह मा,सुवना करत किलोल हे।
अउ छोड़त ए
पिंजरा,बिरथा काया खोल हे।।
मनखे प्रकृति
हाथ के,बने खेलौना जाँच रे।
जइसे मन नचवात
हे, बेंदरा बन के नाच रे।।
सपन तोलगी ला
धरे,जब मनखे थक जाय रे।
तब जग बिरथा
जान के,पाये मोक्ष ललाय रे।।
बुध के सेती
दुख सबो,तेकर ले बुध टार दे।
बुध के बदला
चेत मा, परम प्रभु ल पधार दे।।
बने नही गिनहा
नही, जग में कुछ हे जान ले।
बुध हर उठ अउ
गिर के,करय हीनता मान ले।।
बुध गिरथे अउ
उठथे,करनी के अनुसार रे।
कोनो ला झन
दोष दे,करनी अपन सुधार रे।।
अंतस मा सुख
दुख नहीं,नहीं भूख अउ प्यास रे।
देखत साखी भाव
ले,जीवगति चुप हाँस रे।।
गरब गिंजारत
जीव ला, चौंरासी के जेल में।
फेंके जेन
गुमान ला,तरे उही भव खेल में।।
तन के मालिक
आतमा,दे दे स ओकर हाथ मा।
तान झींक के
बुध चला,ले कलंक झन माथ मा।।
टिकली लेगन दय
नहीं,डेरा जब उसलाय रे।
मोर जेन धन ला
कहे, दूसर ला बइठाय रे।।
भाड़ा के खोली
सहीं, ए चोला के खोल हे।
रहि पाबे दिन
ओतके,जतका साँसा मोल हे।।
भाड़ा के घर बर
कभू,मन नहीं मया बढ़ाय रे।
उही बरन तन
लेख ले,सुख दुख नहीं जनाय रे।।
बाट चलत मनखे
कभू,ठहरय कोनो सराय रे।
तइसे गिंजरत
जीव हा,आये सुख दुख पाय रे।।
बाट चलत मनखे
कभू,ठहरय कोनो सराय मा।
तइसे जग मा आय
हन, फेर गुनन का जाय मा ।।
करनी के खाता
चलय,जमराजा के गाँव में।
मरन घड़ी करनी
दिखय,जीव जाय निज ठाँव में।।
भाड़ा के घर बर
कभू,मोह न पइधे पाय रे।
तस हाड़ा अउ
मास बर,मनखे झन बइहाय रे।।
महतारी अउ बाप
हा,धरती के भगवान ए।
जे ईश्वर
अदीरिस हे,ओकर ही पहिचान ए।।
महतारी अउ बाप
हर,हाड़ा हपट कमात हे।
लइका के सुख
साध बर,सक भर जोर लगात हे।।
लराजरा ये जग
सबो,प्रभु हर सग्गे लाग ए।
मनखे चोला दे
हवय,यहू हमर बड़भाग ए।।
तोर असन हितू
कहूँ, नइ हे ए संसार में।
सग बहिनी कस
लागथे,मोला तोर दुलार में ।।
सुखधाम धरके
नाम हरि उल्लाला3
सुखधाम धर के
नाम हरि,धरनी करत निहाल हे।
सब लोक राउ
उही सदा,नंद यशोदा लाल हे।।
प्रभु माथ मउर
मुकुट तो,लकलक बरत सुहात हे ।
वह रुप के
वर्णन करौं,भाखा नइ मुख आत हे।।
बनफूल पान
सुगंध मन,भागी बड़ा कहलात हे
प्रभु देह नेह
छुए तहाँ,प्रान देह लुटात हें।।
प्रभु ओंठ
बाँसुरी ला धरे,पागा पिंवरा खाप के ।
अउ खोंचें
पीकमँजूर ला,आवत हे मधुबन नाप के।।
जब पाँव पैजनी
बाँधके,चलत संग में ग्वाल के।
कर चोरी गोकुल
गाँव मा,करके लीला बाल के।।
गुन सेती
अनगिन नाम हे,सब गुन नाम अँजोरथे।
सब जीव ह ओकर
भार हे,भव के बंधन छोरथे।।
सब चूम चाँट
मया करत,कोनो गाल गिंधोल के।
कोनो सुल्हारत
हे बिठा,कोरा गुरतुर बोल के।।
प्रभु ला
बलावत हे सखी,सींका माखन टाँग के।
मन मा हे सबके
चाहना,आय खाय वो माँग के।।
घर होय फेर
सुन्ना जभेसंग धरे लगवार के।
अउ फोर दोहनी
ठेकली,जावय पटक कचार के।।
ब्रजलाल मइरसा
फोर के,मही-दही ल गिराय हो।
अउ मुँह के
पोंछत लेवना,ड़ाड़ खइरखा जाय हो।।
भिनसरहा उठ के
राधिका,पनिया ओखी जात हे।
रसिया के रंग
चढ़े हवय,मन मा मया न समात हे।।
बड़ फभत मउर
मुकुट हा, करधन अउ बनमाल हे ।
सबला सुहावत
हे अबड़ ,वह जगपति नंदलाल हे ।।
शोभामोहन
उल्लाला 3
बड़ दिन ले
गिंजरे गाँव हँव,जाये घर मन होत हे।।
सब सपना उसलिस हाट के,आँखी आँसू धोत
हे।।
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