हरिगुन लहरा
डोल बने *त्रिभंगी छंद*
धनहा डोली मन, जे उपजे घन, दूबी अउ बन, छोल बने।।
सब गोठ सुहाती, पिरित लगाती, अउ पतियाती, बोल बने ।
बिरथा जिनगानी, पी झन मानी, पुरुत कहानी, खोल बने ।
ये कलजुग जहरा, किस्मत सहरा, हरिगुन लहरा, डोल बने ।।
शोभामोहन
भगवती स्त्रोत("त्रिभंगी
छंद")
हे पाप हरइया, दुर्गा मइया, करथस छँइया, महतारी।
हे जग्य रचइया, सुख बरसइया, मन हरसइया,नर नारी।।
हे दुष्ट मरइया, जबर लड़इया, आड़ परइया,दुख सारी।
नव रूप धरइया, पाप नसइया, जीव तोसइया करतारी।।१।।
शोभामोहन
त्रिभंगी छंद
हे क्रूर
कराली, नेत्रविशाली, खप्परवाली, काली माँ।।
हे भक्त
कृपाली, वैभवशाली, जग उजियाली, काली माँ।।
हे
धर्मप्रकाशी, पापविनाशी, दुर्जननाशी, काली माँ।।
हे शैल निवासी, शुभगुणराशी, भाव उदासी, काली माँ ।।
हे जग महतारी, सृष्टि अधारी, सुंदर प्यारी, काली माँ ।
पूजे संसारी, मूर्ति पधारी, कर मनुहारी, काली माँ ।।
जय माता चंडी, बन रणचंड़ी, हने घमंड़ी, काली माँ ।।
शुभ धार
त्रिपुंडी, कर अरिमूंड़ी, शस्त्र भुशुंडी, काली माँ ।।
हे माँ
रिपुघाली, हे बलशाली,हे जयवाली, काली माँ ।।
हे करुणावाली, ममतावाली, समतावाली, काली माँ।।
हे आदि भवानी, जग कल्यानी, शिवपटरानी,काली माँ ।।
प्रिय औघड़दानी, मन हरसानी, परम सयानी, काली माँ ।।
हे सिंह सवारी, मुनि मनहारी, शुभ अविकारी, काली माँ ।।
जय जय जगधारी, गगनविहारी, महिमाभारी, काली माँ ।।
क्रूर कराली, नेत्रविशाली, खप्परवाली, काली माँ।।
हे भक्त
कृपाली, वैभवशाली, जग उजियाली, काली माँ।।
शोभामोहन
२९/११/२०२०
(त्रिभंगी छंद)(जय ब्रह्म पियारी)
जय ब्रह्म
पियारी, जग उजियारी, वीणा धारी, शारद माँ।
जय हंस सवारी, पुस्तक धारी, जग महतारी
शारद माँ ।।
सब लोक बिहारी, सब शुभकारी, सहज उदारी, शारद माँ ।
सुन अरज हमारी, ग्यान अधारी, हे जग न्यारी, शारद माँ ।।1।।
जयकार लगाऊँ, निशदिन ध्याऊँ, सब सुख पाऊँ, शारद माँ ।
मनमहल बसाऊँ, दरशन पाऊँ, भाग जगाऊँ, शारद माँ ।।
दुख ताप
मिटाऊँ, ग्यान गढ़ाऊँ, प्रान लुटाऊँ, शारद माँ ।
शुभ मंगल गाऊँ, अलख जगाऊँ, अरु वर पाऊँ, शारद माँ ।।2।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
(त्रिभंगी छंद)
"सरस्वती वंदना"
(जय ब्रह्म पियारी)
जय
ब्रह्मपियारी, जगउजियारी, वीणाधारी, शारद माँ ।
तैं हंस सवारी, पुस्तकधारी, जगमहतारी,
शारद माँ ।।
सब लोकबिहारी, सब शुभकारी, सहजउदारी, शारद माँ ।
सुन अरज हमारी, ज्ञानअधारी, हे जगन्यारी, शारद माँ ।।1।।
जयकार लगावैं, सुर मुनि
ध्यावैं, सब सुख पावैं, शारद माँ ।
सब लोक मनावै, दरशन पावैं, भाग जगावै,
शारद माँ ।।
दुख ताप
मिटावै, ज्ञान गढ़ावै, नेह बढ़ावै,
शारद माँ ।
जग मंगल गावै, अलख जगावै, अउ वर पावै,
शारद माँ ।।2।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
शंकर सुमरनी
(त्रिभंगी छंद)
बइठे धर संगा, माँ जगदम्बा,
डेरी अंगा, महदेवा।
जयजय जगखंभा, मस्त मलंगा,
पीयत भंगा महदेवा।
सिर ऊपर गंगा, ध्यान अभंगा,
कंठ भुंजगा, महदेवा।
हरि रंग मन
रंगा, बइठ उतंगा,
मगन अखंगा, महदेवा।
तन सरसर सरसर, रेंगत बिखहर,
मुँड़ गंगाधर, महदेवा।
डम डम ममरू कर, जगमंगल बर,
पीयस सब जहर, महदेवा।
आधा नारी नर,भूतजगत घर,
हरहर हरहर, महदेवा ।
जगतीतल के जर, जय जय शंकर,
बइठे गिरिवर, महदेवा।
सब अलहन टारौ, काज सँवारौ,
जीव उबारौ, महदेवा।
मन दियना बारौ, मंत्र उचारौ,
जाला झारौ, महदेवा।
जर कोड़ उखाड़ौ,दोख बिसारौ,
शुभगुन डारौ, महदेवा।
यह चेत पसारौ, बैरी मारौ,
नैन उघारौ, महदेवा।
जग मानुख तन
हे, मूरखपन हे,
सब दुख हन हे, महदेवा।
जग बरत अगन हे, दुख तड़फन हे,
मन अनमन हे, महदेवा।
तन खीरत क्षन
हे, ब्याकुल मन हे,
जग अनबन हे, महदेवा।
शोभामोहन हे, तोर चरन हे,
बड़ अलहन हे
महदेवा।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०५/०८/२०२०
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