गुल बहुत होंगे मगर बुलबुल न
होगी बाग में ।
सब जले तुम भी जलोगे,एक दिन उस आग में
जोड़ने की रीत तेरी तो धरी रह
जायेगी ।
मुर्खता को रफू की कारीगरी
कह जायेगी।।
एक पल भी ना जुड़ेगा, जिंदगी के ताग में ।
गुल बहुत होंगे मगर बुलबुल न
होगी बाग में ।।
भूख तेरी प्यास तेरी, ना मिटेगी उम्र भर ।
नाप ले चाहे जगत, उस पार है तेरी डगर ।।
छोड़ उसकी बंदगी उलझा है
किसके लाग में ।
गुल बहुत होंगे मगर बुलबुल न
होगी बाग में ।।
होंगे चर्चे चार दिन,गलियों में और चौंपाल भर।
यादें रहेंगीं कौंधती वो भी
महज कुछ साल भर।।
मिट जायेगी ये बानगी,मिल जायेगा सब खाक में।
गुल बहुँत होंगे मगर बुलबुल
न होगी बाग में ।।
तोड़कर सारी हदें जाना है इस
संसार से ।
दूर हो चल आज से ही मतलबी
मनुहार से ।।
बाँध तो मत प्राण पागल जगत
के अनुराग में ।
गुल बहुत होंगे मगर बुलबुल न
होगी बाग में ।।
है विकट यह रास्ता तू जाते
जाते फूल बों दे ।
खुद लिखे अपने करम के
कारनामे भूल धो दे।
कोई कुछ लिखता नहीं रे, मेरे तेरे भाग में ।।
गुल बहुत होंगें मगर बुलबुल
न होगी बाग में ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
२२/१२/२०१३
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