Thursday, 16 March 2023

जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिये

 

जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिये ।

रहे अबूझे क्यों खुद से जब, जग को छान लिये ।।

आप से बड़ा अरि नहीं कोई

आप से बड़ा न मित्र कोई

आप से बड़ा कहाँ ठग कोई

आपसे कहाँ विचित्र कोई

जगत विरोध तजे है अब तो, खुद से ठान लिये।

जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव जान लिये।।

फिर निद्रा से स्वत्व जगाकर,

जब से खुद को झकझोरा।

वय फल जैसे बिन प्रयत्न के

पाप झड़ा फूटा फोड़ा।।

आप चढ़ा प्रत्यंचा खुद पर, ही धनु तान लिये ।

जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव मान लिये ।।

मृदा महल देहरी लांघकर

जब स्वाग ग्रह के पार चले

जगत नियंता नाव सौंपकर

सागर बिन पतवार चले

कठपुतली के नाच नेति, नायक पहचान लिये।

जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिये ।।

महा शांति का बीज है भीतर

बाहर क्यों माथा फोड़ी ।

गहरा भेद सरल है रे मन

माया राम कहांँ जोड़ी ।।

होश सदा के लिए चिरंतन, से अनुदान लिये ।

जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिये ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

२५/१०/१७

झीट पाटन दुर्ग छ.ग.

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