सब बंध तोड़व
(सुखी सवैया)
जय राम रमा
पति मोर ददा जग मा भटकावनहाथ न छोड़व।
अब होवत हे बड़
बेर दया करके भटके मन के गति मोड़व।
तन प्रान रखौ
अपने छँइहा अपने संग नेह नता बस जोड़व ।
रखि गोड़ करा
हम ला अपने अरजी सुनके सब बंधन तोड़व।
शोभामोहन
कृष्ण स्तुति
(सुखी सवैया)
पलना म सुते
मणि रत्न जड़े, मुच ले मइया संँग हे मुसकावत ।
सखि नैन ललाय
लला निरखे, दिनरात मने मन हूँत करावत ।
तन कोंवर फूल
सरीख सबो, अउ नील मणि कस तेज जनावत।
छबि वो छपगे हिरदे
तल मा, चिटको नइ चेत सरूप भुलावत।
मुखमंडल नीरज
के जइसे, तन मंद व नीक सुगंध लुटावत।
घपटे घुँघराल
घटा करिया, घन केश घिरे घहराय सुहावत।
जस टूट परे
मधु झोर पिये, भँवरा बउराय सरीख जनावत।
मुनि खोज करै
मन के बन में, सब साधक जेकर ध्यान लगावत।
जग कारन धारन
तारन के, सत शारद नारद पार न पावत।
अउ गोकुल गाँव
गुवालिन तो, पुन के बल हे घर मा सपड़ावत।
भठहा भव भोग
भुले भटके, भव भार भरोस रहै गुन गावत ।
जग मा बड़का
सुख वो मन तो, खटके भटके बिन खच्चित पावत।
शोभामोहन
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