●भीड़ अउ भगदड़ शंकरछंद●
भीड़ भड़क्का धक्का मुक्का,अबड़ दे आनंद।
एक्का दुक्का छटके रहिके,होय सुख हर मंद।।
भीड़ करै जब भड़भड़-भड़भड़,होय हलचल हाट।
सइमो-सइमो गाँव गली घर, होय रद्दा बाट।।
कतको दिन के भूले बिसरे,मेल मेला होय ।
सुरता करके जीव जुड़ावै,जब अकेला खोय।।
कुंभ नहाये कतको मनखे, जाय गंगा घाट।
जुरै करोड़ो मनखे सिगबिग,भरे नदिया पाट ।।
जतके जादा भीड़भाड़ हो,मन ह हरियर होय।
मगन होय सब बड़ सुख लागै,फिकर नहीं बिटोय।।
फेर भीड़ हा भगदड़ होके, करै सत्यानाश।
होय देख तो मनुखबाहिर, दिखै रक्सा रास ।।
भीड़ बिगन गड़हन के होके, मरे मारे जाय।
भोगै जब परिनाम ल पाछू, सोच के पछताय।।
भीड़ उमड़ बइहा पूरा कस, चलत मार मुसेट।
जेन बाट मा भीड़ चलत वो, सबो लेत चपेट।।
शोभामोहन
●फेर बसंती दिन आगे हे शंकर छंद●
फेर बसंती दिन
आगे हे, छाय हे अनुराग।
कोकिल कुहकुह
करत बना मुँह,देख गंध पराग।।
सब मतंग हे
गमक रंग हे, कली लचकत डार।
अउ अमराई के
रुखराई,साज डरिन सिंगार ।।
चमकत आँखी धर
के पाँखी,उड़त जात अगास।
जब गौतरिहा
पिया लहरिया,दिखिस नैन परास।।
भाग ह खुलगे
सपना झुलगे,झनक गे मन तार।।
झूमत गावत रंग
उड़ावत, आय हवय तिहार।।
मंद चढ़ाये असन
जनाथे, सृष्टि के व्यवहार।
जीयत जागत
जइसे लागत,सब डहर संसार।।
रंग सुहावन
संग सुहावन, पधारे हे कंत ।
जोग जगाये
जोगी जाये, मीत गीत बसंत ।।
शोभामोहन
●जात मथुरा हाँस(शंकर छंद)●
छूटत मइया
छूटत गइया, छूटत हवय गाँव ।
छूटत संगी अउ
मनरंगी, कदम रुखवा छाँव।।
छूटत राधा
परगे बाधा, रंगरेली रास ।
छूटत जमुना बन के
पहुना, जात मथुरा हाँस ।।
शोभामोहन
●कोरोना हाहाकार शंकर छंद●
एक करोना पारत
रोना, काँपगे हे चीन ।
आज निकलगे
हावय ओकर, भरे बोतल जीन।।
सड़क गली छाये
सन्नाटा, ठप्प हे बैपार ।
बनन-बनन
गिँजरइया मनखे, लहुटगे घरद्वार।।
अंश जीव के
निच्चट नानुक, करत हाहाकार।
सबो देश ला
लपटत देखौ,मनुख मानत हार ।।
गाँव शहर मनखे
विन सुन्ना, सबो हे गुम खाय।
घर घमंड के
रीता होथे, बात सिरतो आय ।।
जीव जंतु के
हइता थमगे, अउ करुन गोहार।
ये प्रकृति
आगू मा दिखथे,मनुख हर लाचार ।।
छोड़ माँस
मसगिद्धा करथे,साग के आहार।
हाँथ मिलाये हवै
भुलाये, होवत नमस्कार।।
हें रुधाँय सब
घर मा अपने, बचावत हे प्रान ।
सबके बुध हर
परगे पातर, सटकगे अभिमान।।
पल मा परलय
लाने सकथे, प्रभु हे बलवान।
तेकर सेती तज
के छल-बल, नाम लौ भगवान।।
शोभामोहन
●परही आना सुनके गाना शंकर छंद ●
कोनो दिन तो
कोनो छिन तो, सुने परही गोठ।
मोरो कलकुत
पारे अउ हुँत,ए सजन मसमोठ।।
गीत रिझौना
मैं नइ गावौं, थके हवँव बलात ।
काय मंँझनिया काय
बिहनिया, साँझ का अउ रात।।
बेरा काटौं
गड्ढ़ा पाटौं, एक तोला जान ।
प्रान लुटावौं
अउ सपड़ावौं, गुनौं लाभ न हान।।
मग मा काँटा
सुख दुख बाँटा,देख नइ घबराँव।
मन हे बइहा
रद्दा कइहा, अगम सुख के गाँव।।
तोरे सुमरन
तोरे घुमरन, धरे गुरुबर ग्यान ।
गावत साँसा
धरके आसा, तोर मग भगवान।।
छूटत अटकन
छूटत भटकन, होत बाट अबाध।
परही आना
सुनके गाना, मिलन के हे साध ।।
शोभामोहन
मरे ओला
जान(शंकर छंद)
---------------------------------
काम ललाय रहै
दिन राती,मरे ओला जान ।
करै नाश गति
साँसा बाती,मरे ओला जान ।।
साध-सधौरा
पाछू जावै,मरे ओला जान ।
सत-संगत बर जे
न सधावै,मरे ओला जान ।।
उलटा गंगा जेन
बहावै, मरे ओला जान ।
माखी जइसे घाव
सुहावै,मरे ओला जान।।
नेम धरम खटिया
उसलावै,मरे ओला जान ।
सुखदेउक के
चेर बतावै, मरे ओला जान ।।
धरम करम बर
गाठँ न छोरै,मरे ओला जान ।
दान करै ना
खावै जोरे, मरे ओला जान ।।
जेन गरीबी मा
दिन काटै, मरे ओला जान ।
बिन धन हिनहर
काय उवाटै,मरे ओला जान ।।
परसुख देखत
ताप बियापै,मरे ओला जान ।
इरखा आगी आँच
ल तापै,मरे ओला जान ।।
पर के
भार-भरोसा जीयै,मरे ओला जान ।
येकर ओकर मानी
पीयै,मरे ओला जान।।
जात-सगा मा
अपजस बगरे,मरे ओला जान ।
देश नगर घर बन
जग झगरे,मरे ओला जान ।।
काया गढ़ मा
रोग जिहावै, मरे ओला जान ।
मन के ड़ोंगा
मलकत जावै,मरे ओला जान ।।
जग समाज अउ देश
न मानै,मरे ओला जान।
खा पी पशु कस
तरुआ तानै,मरे ओला जान।।
दया धरम नइ
जेकर मन मा,मरे ओला जान।
रहै बयाये
अपनेपन मा,मरे ओला जान।।
जेला भावै पर
के चारी,मरे ओला जान।
परपंची पन परै
हजारी,मरे ओला जान।।
बस कुगंध सब
मग बगरावै,मरे ओला जान।
बने बने ला
हीन मड़ावै,मरे ओला जान।।
ईश बिरोधी
खरतर क्रोधी,मरे ओला जान।
बैर भाव पोसक
प्रतिशोधी,मरे ओला जान ।।
मरे ओला
जान(शंकर छंद)
---------------------------------
काम ललाय रहै
दिन राती,मरे ओला जान ।
करै नाश गति
साँसा बाती,मरे ओला जान ।।
साध-सधौरा
पाछू जावै,मरे ओला जान ।
सत-संगत बर जे
न सधावै,मरे ओला जान ।।
उलटा गंगा जेन
बहावै, मरे ओला जान ।
माखी जइसे घाव
सुहावै,मरे ओला जान।।
नेम धरम खटिया
उसलावै,मरे ओला जान ।
सुखदेउक के
चेर बतावै, मरेओला जान ।।
धरम करम बर
गाठँ न छोरै,मरे ओला जान ।
दान करै ना
खावै जोरे, मरे ओला जान ।।
जेन गरीबी मा
दिन काटै, मरे ओला जान ।
बिन धन हिनहर
काय उवाटै,मरे ओला जान ।।
परसुख देखत
ताप बियापै,मरे ओला जान ।
इरखा आगी आँच
ल तापै,मरे ओला जान ।।
पर के
भार-भरोसा जीयै,मरे ओला जान ।
येकर ओकर मानी
पीयै,मरे ओला जान।।
जात-सगा मा
अपजस बगरे,मरे ओला जान ।
देश नगर घर बन
जग झगरे,मरे ओला जान ।।
काया गढ़ मा
रोग जिहावै, मरे ओला जान ।
मन के ड़ोंगा
मलकत जावै,मरे ओला जान ।।
अनहोनी डर मन
पधरावै ।
खटका छाये दुख
परघावै ।। मरे ओला जान
मरनी के दिन
गिनत पहावै।
जिनगी के नइ
रंग सुहावै ।।मरे ओला जान
तन-मन बुध
शक्ती छिन जावै ।
लाग नता मिल
मरन मनावै ।।मरे ओला जान
सरलग मन मा
रीस झपावै ।
रकत माँस
अँउटावत जावै ।। मरे ओला जान ।
रीस बपावै बुध
जेंवावै ।
रीस अगन जर आप
नसावै।।मरे ओला जान
रीस बिया पर
ला दुख देवै ।
नरक भोसाये
अपजस लेवै।।मरे ओला जान
धन जोरै जे
पाप भरोसे ।
पाप कमाई
परिजन पोंसै।।मरे ओला जान
ठलहा हाथ न
गोड़ हलावै ।
बिन सोचे समझे
अँटियावै।।मरे ओला जान
अपने स्वारथ
भर ला देखै ।
पर के दुख सुख
ला नइ लेखै।।मरे ओला जान
जग समाज अउ
देश न मानै,मरे ओला जान।
खा पी पशु कस
जानै तानै,मरे ओला जान।।
दया धरम नइ
जेकर मन मा,मरे ओला जान।
रहै बयाये
अपनेपन मा,मरे ओला जान।।
जेला भावै पर
के चारी,मरे ओला जान।
परपंची पन परै
हजारी,मरे ओला जान।।
बस कुगंध सब
मग बगरावै,मरे ओला जान।
बने बने ला
हीन मड़ावै,मरे ओला जान।।
ईश बिरोधी
खरतर क्रोधी,मरे ओला जान।
बैर भाव पोसक
प्रतिशोधी,मरे ओला जान ।।
●तोरे नत्ता तैरे सैना शंकर छंद ●
तोरे नत्ता
तोरे सैना, जीव तोरे लाग ।
तोरे बाजा
तोरे नाचा , गीत तोरे राग ।।
तोरे शासन
तोरे आसन, दिये राशन तोर।
तोरे आखर मन के
सागर, भाव भँवर हिलोर।।
तोरे माली
पिंवरी लाली, रंग गंध पराग ।
माटी पानी
सूरज दानी, अउ बगइचा बाग।।
देत गवाही
आँही-बाँही, जिनिस तोर बनाय ।
मुश्किल भारी
तभो चिन्हारी,रहिथँस तँय लुकाय ।।
शोभामोहन
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