नारी सिंगार
(शशिवदनाछंद ।।। ।ऽऽ)
पहिरत मोती ।
बगरत जोती।।
जुगजुग माला।।
करत उजाला।।
लकलक टीका ।
ठउर सटीका।।
लटकत बेनी ।
लगत
त्रिबेनी।।
करधन सोहे ।
जग मन मोहे।।
छुमछुम साँटी
।
उपकत घाँठी।।
लटकन बाली ।
सज मतवाली।।
हरियर सारी।
पहिर कुँवारी।
कर बड़ स्वाँगा।
अउ धर बाँगा।।
जल भर लाये।
मटकत जाये।।
सतरँग बोली।
करत ठिठोली ।।
मन हरसाथे ।
अउ तरसाथे।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
१६/०४/२०२१
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