जग के नता बनत के ताय
जग के नता बनत के ताय ।
पतझड़ के डारी खाँधी मा,
नहीं बसंती फूल खिलाय। जग के नता बनत...
बन के अगन बढ़ा पुरवइया,
तुलसी चौंरा दिया बुताय।। जग के नता बनत..
प्यास बुतइया पानी बिफरै,
सँउहत काल रूप बन जाय। जग के नता बन..
रात अँधेरी बजनी बाजे,
उवत सुरुज वो दीप बुताय।जग के नता बनत..
जड़कल्ला पिछलग्गा किंजरै,
कुहुक घरी जग रबि गरियाय। जग के नता बनत..
चंदा जोहत अरग देवइया,
भादो चउथी चंद्र लुकाय।जग के नता बनत..
गरज परे मा पाँव पखारैं,
पाछू नइ चिन्हय गोठियाय। जग के नता बनत..
शोभामोहन
30/01/2020
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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