Saturday, 11 February 2023

तेरे रहने बसने का तो मंदिर भव्य बना

 

तेरे रहने बसने का तो मंदिर भव्य बना


तेरे रहने बसने का तो मंदिर भव्य बना ।

बाहर से तो मिले बहुत हम अंदर मगर मना ।।  

 

घूरे पतझर कलियाॅं क्ॅंयारी यह तो ठीक नहीं ।

चीखों में बदले किलकारी यह तो ठीक नहीं।।

पत्थर का घर तू भी पत्थर भगवन क्या कहना ।

 

तुम्हे बनाते तुम्हे मिटाते लेकिने मौन वरे ।

मुझे खटकती रीत तुम्हारी संषय कौन हरे ।

मेरे मनुहारो में क्योंकर ना अनुराग सना ।।

 

लुटा संपदा षब्द षब्द में तेरा गान करूॅं ।

एक बार तो दर्षन दे दो निर्भय जग विचरूॅं ।।

बिना षोर के छुपा खजाना अब तो मुझे जना ।।

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

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