तेरे रहने बसने का तो मंदिर भव्य बना
तेरे रहने बसने का तो मंदिर भव्य बना ।
बाहर से तो मिले बहुत हम अंदर मगर मना ।।
घूरे पतझर कलियाॅं क्ॅंयारी यह तो ठीक नहीं ।
चीखों में बदले किलकारी यह तो ठीक नहीं।।
पत्थर का घर तू भी पत्थर भगवन क्या कहना ।
तुम्हे बनाते तुम्हे मिटाते लेकिने मौन वरे ।
मुझे खटकती रीत तुम्हारी संषय कौन हरे ।
मेरे मनुहारो में क्योंकर ना अनुराग सना ।।
लुटा संपदा षब्द षब्द में तेरा गान करूॅं ।
एक बार तो दर्षन दे दो निर्भय जग विचरूॅं ।।
बिना षोर के छुपा खजाना अब तो मुझे जना ।।
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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