मुक्तक
0000000000000000000000000000000000000000
बडे सलीके से जो अपनी बात कहते हैं
सब यकीं करते हैं जो दिन को रात कहते हैं
00000000000000000000000000000000000000000000
ठतनी सी बात सारे जमाने को खल गई
कि दो कदम मैं क्योंकर मर्जी से चल गई
000000000000000000000000000000000000000000000
तेरी सूरत से मिलाती हॅंू जब मेरी सूरत ।
मेरी खो जाती है मिल जाती हैं तेरी सूरत ।।
0000000000000000000000000000000000000000000
तैर के केवल राह मिलेगा डूबोगे तो थाह मिलेगा ।
डूब मरे तो राम मिलगा,
लौट
गये तो वाह मिलेगा ।।
00000000000000000000000000000000000000000000000000000
अलविदा अपमान सहकर जा चुकी सुकुमारियों को ।
क्या करूॅं बेचारगी की घर हुई बिमारियों को ।।
अलविदा ये जगत समझेगा नहीं अब मोल मेरा ।
अलविदा गूॅंजेगा सम्यक् सृष्टि भर अब बोल मेरा ।।
00000000000000000000000000000000000000000000000000000
No comments:
Post a Comment