आषा जोडे अलि सुवासित
आषा जोडे अलि सुवासित करती रही मोह संचय
कल्पित संसार लिए मन का विहग बनाता रहा वलय
विहसन में करूणा मर्म छुपा करूणा में उपगम आगत
विस्मृत होकर संसृति में ढूढे वन स्त्रोत कनागत
मन सुधि में और तन बेसुध पथ ना करने दे कोई तय
आषासिक्त अलि,,,,,,,,,,,,,
यह विसर्गमय स्वांस निरा नहीं अन्र्त-बर्हिगमन
स्वयं सदैव प्रष्नचिन्ह किसका फिर क्यों अनुगमन
क्षुद्र विषिका अणु-अणु में परमषक्ति आभाकर लय
आषासिक्त अलि,,,,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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