Saturday, 11 February 2023

आषा जोडे अलि सुवासित

 

आषा जोडे अलि सुवासित

 

आषा जोडे अलि सुवासित करती रही मोह संचय

कल्पित संसार लिए मन का विहग बनाता रहा वलय

 

विहसन में करूणा मर्म छुपा करूणा में उपगम आगत

विस्मृत होकर संसृति में ढूढे वन स्त्रोत कनागत

मन सुधि में और तन बेसुध पथ ना करने दे कोई तय

आषासिक्त अलि,,,,,,,,,,,,,

 

यह विसर्गमय स्वांस निरा नहीं अन्र्त-बर्हिगमन

स्वयं सदैव प्रष्नचिन्ह किसका फिर क्यों अनुगमन

क्षुद्र विषिका अणु-अणु में परमषक्ति आभाकर लय

आषासिक्त अलि,,,,,,,,,,,,

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

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