Saturday, 11 February 2023

सुख में मेरे सुखी, दुख में मेरे दुखी

 

माॅं

 सुख में मेरे सुखी दुख में मेरे दुखी

हर एक कोण से जो मुझपर ही रहे झुकी

 

जिसकी परिधि में पीडा विस्तार गगनचुंबी

जिसकी आॅंखों में पानी चिरकाल से हैं अवलंबी

 

चेहरे पर झुर्री झांॅई माथे टीका संग सलवट

चेतनता जिसकी मेरे संग-संग लेती है करवट

 

सपनों में धुॅंआ बिखेरे जिम्मेदारी की बाली

एडिया फटी बिंवाई, हाथों की लालिमा काली

 

वेदना विरह की उसकी सोयी जब जब मैं जागी

समग्र षक्ति ही जिसकी बस मेरे पीछे-पीछे भागी

 

नौ मास फकत ही मुझे गर्भ में नहीं रखी है तो क्या

जीवन भर मुझे संभाला जिसने बस वो है मेरी माॅ

 

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

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