गाॅंव चुप बैठी रही
षहर बोले गाॅंव चुप बैठी रही
धूप बोले छाॅंव चुप बैठी रही
चलते चलते हासिलों को जोडती
घुंघरू बोले पाॅंव चुप बैठी रही
डोंरियों ने बाॅंधे रक्खा घाट पर
लहर बोले नाव चुप बैठी रही
कौन सी भाशा अबोली सीखकर
दर्द बोले घाव चुप बैठी रही
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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