Sunday, 12 February 2023

बाॅसुरी विराग भरी

 

बाॅसुरी विराग भरी

 

अंतहीन है जिसका सुरलय दो बालिस्त गमन का पथ तय

फकत फूंक से हो जाता क्रय बाॅसुरी का बस इतना परिचय

गीतों में नहीं झरी बाॅंसुरी विराग भरी

 

षिल्पित लेकिन पूर्ण पोंगली गढती रूप फूंक और उंगली

गये पथिक अगणित अलि गली गलबहियों में रीत न बदली

तानों बीच मौन वरी बाॅंसुरी विराग भरी

 

अनजाने अधरों ने छूकर, साधे हैं सुर साॅंस लहू कर

धन्य मनुजता का यह भू कर, अगलित दुखों को आॅंसू कर

फेरों में नहीं परी, बाॅंसुरी विराग भरी

 

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

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