बाॅसुरी विराग भरी
अंतहीन है जिसका सुरलय दो बालिस्त गमन का पथ तय
फकत फूंक से हो जाता क्रय बाॅसुरी का बस इतना परिचय
गीतों में नहीं झरी बाॅंसुरी विराग भरी
षिल्पित लेकिन पूर्ण पोंगली गढती रूप फूंक और उंगली
गये पथिक अगणित अलि गली गलबहियों में रीत न बदली
तानों बीच मौन वरी बाॅंसुरी विराग भरी
अनजाने अधरों ने छूकर,
साधे
हैं सुर साॅंस लहू कर
धन्य मनुजता का यह भू कर, अगलित दुखों को आॅंसू कर
फेरों में नहीं परी,
बाॅंसुरी
विराग भरी
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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