सुख डग भरते उसी गली में
जिस मग से दुख धूलि उडाते सुख डग भरते उसी गली से
भानु एक बॅूद नहीं रखता लौटाता फिर से बदली से
समय रात को सुबह बनाने सूरज तेरी ओर करे
काला को अकलंकित करने कोयल में संगीत भरे
भौंरा भी छूने से पहले अगनित पूछे प्रष्न कली से
जिस मग से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
किसका पुण्य चरण धरती के आॅंगन-आॅंगन धूप खिलाती
षब्दों को मंजूर न करती श्रेय सभी वापस लौटाती
होनी बाॅंटे बैठ कर्मफल संवेदन छू छू उंगली से
जिस मग से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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